अब अदालती लड़ाई में भी भारत से हार गया पाकिस्तान : भारत को मिलेगा 308 करोड़ का खज़ाना

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रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 2 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। एक तरफ पाकिस्तान कंगाली के कगार पर खड़ा है, वहीं उसे एक और झटके ने झकझोर कर रख दिया है। अब पाकिस्तान कानूनी लड़ाई में भी भारत से हार गया है। इस हार का परिणाम यह हुआ कि उसे 308 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। वस्तुतः यह रकम उसकी थी भी नहीं, इसीलिये उसे यह रकम मिली भी नहीं। यह रकम हैदराबाद के 7वें निजाम मीर उस्मान अली खान सिद्दिकी की थी, जो उनके वारिसों को यानी भारत को मिलेगी। यह रकम ब्रिटेन के एक बैंक में है। ब्रिटेन की अदालत के ऐतिहासिक फैसले के बाद अब यह रकम भारत को मिलेगी।

क्या है 308 करोड़ का मामला ?

दरअसल भारत के विभाजन के बाद 1948 में हैदराबाद के तत्कालीन निजाम मीर उस्मान अली खान ने ब्रिटेन के लंदन स्थित नेशनल वेस्टमिनस्टर (नेटवेस्ट) बैंक में 1,007,940 पाउण्ड (लगभग 8 करोड़ 87 लाख रुपये) जमा करवाये थे। दरअसल निजाम के वित्त मंत्री ने पैसों को सुरक्षित रखने के इरादे से यह रकम पाक उच्चायुक्त के लंदन वाले बैंक खाते में रखा था। भारत और पाकिस्तान दोनों ही इस रकम पर अपना-अपना अधिकार जता रहे थे। यह रकम बैंक में पड़ी रही और अब 70 साल में बढ़ कर यह रकम 35 मिलियन पाउण्ड यानी लगभग 3 अरब 8 करोड़ 40 लाख रुपये हो चुकी है।

भारत का समर्थन करने वाले निजाम के वंशज प्रिंस मुकर्रम जाह और उनके छोटे भाई मुफ्फखम जाह ने इस रकम पर दावा किया था, तो दूसरी ओर  पाकिस्तान भी इस भारी भरकम संपत्ति पर दावा कर रहा था। हालाँकि पाकिस्तान को इस मामले में झटका तब लगा जब लंदन के रॉयल कोर्ट ऑफ जस्टिस के जज मार्कस स्मिथ ने फैसला सुनाया। उन्होंने 70 साल पुराने दस्तावेजों का गहन अध्ययन करके पाकिस्तान के तर्कों को खारिज किया और अपने फैसले में कहा कि हैदराबाद के 7वें निजाम उस्मान अली खान इस फंड के मालिक थे, इसलिये उनके बाद उनके वंशज (दो पोते) और भारत ही इस संपत्ति के सही हक़दार हैं। हैदराबाद के निजाम की ओर से मुकदमा लड़ने वाले पॉल हेविट ने कहा कि हैदराबाद के सातवें निजाम की संपत्ति के लिये उनके वंशजों के उत्तराधिकार को स्वीकार किया है। यह विवाद 1948 से ही चल रहा था, जिसका 70 साल बाद फैसला आने से हम खुश हैं। अदालत के इस फैसले के बाद अब लंदन के नेटवेस्ट बैंक में जमा लगभग 35 मिलियन पाउण्ड की यह रकम निजाम के वंशज प्रिंस मुकर्रम जाह और उनके छोटे भाई मुफ्फखम जाह को मिलेंगे। दूसरी तरफ पाकिस्तान को इस फैसले से भारी झटका लगा है, जो अभी कंगाली के कगार पर खड़ा है।

1948 में सरदार पटेल ने चलाया था ‘ऑपरेशन पोलो’

भारत के लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल ने ऑपरेशन पोलो के तहत हैदराबाद का भारत में विलय कराया था। इसी दौरान निजाम के वित्त मंत्री नवाब मोइन नवाज़ जंग ने उपरोक्त रकम ब्रिटेन में पाकिस्तान के उच्चायुक्त हबीब इब्राहिम रहीमतुल्लाह के खाते में भेज दिये थे। जब निजाम को इस रकम के बारे में पता चला तो उन्होंने इसे वापस देने की माँग की, परंतु पाकिस्तान ने इस रकम को लौटाने से इनकार कर दिया था। यह मामला ब्रिटेन के उच्चतम न्यायालय (हाउस ऑफ लॉर्ड्स) में भी जा चुका है। कोर्ट ने इस खाते को फ्रीज़ कर दिया था। बाद में उच्चतम न्यायालय के आदेश से मामले को पुनः हाई कोर्ट ले जाया गया था, जहाँ जस्टिस मार्कस स्मिथ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनी थी। निजाम के वंशजों की ओर से कोर्ट में कहा गया कि ये पैसा ऑपरेशन पोलो के दौरान सुरक्षित रखने के लिये भेजा गया था। जबकि पाकिस्तान की दलील थी कि हैदराबाद के भारत में विलय के दौरान पाकिस्तान ने निजाम की काफी मदद की थी, जिसके बदले में ये पैसे उसे दिये गये थे। बाद में पाकिस्तान की ओर से यह भी दलील दी गई थी कि उसने हैदराबाद को हथियार सप्लाई किये थे, जिसके बदले में उसे यह रकम दी गई थी, हालाँकि पाकिस्तान अपनी दलील के पक्ष में कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर पाया था।

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