कहीं आप भी तो नहीं ‘स्लिप डिस्क (PIVD)’ के शिकार ? जानिए कारण और निवारण

WRITTEN BY BINAY KUMAR SHUKLA

अहमदाबाद, 17 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। भागदौड़ वाली जीवन शैली में सड़कों पर गाड़ी चलाना और गैजेट्स के बढ़ते चलन के कारण देर तक एक ही मुद्रा में बैठे रहने से रीढ़ की सेहत पर काफी बुरा असर पड़ रहा है। आधुनिक जीवनशैली के दुष्परिणाम यह हैं कि हर 5 में से 3 व्यक्ति किसी न किसी स्वास्थ्य संबंधी तकलीफ का सामना कर रहे हैं। आज के समय में युवा हो या वृद्ध, अधिकांश लोगों को इस बीमारी से पीड़ित देखा जाता है। ऐसे में कमर दर्द भी एक आम समस्या हो गई है, परंतु कमर दर्द को लेकर लापरवाही बरतना बिल्कुल भी ठीक नहीं, आइए जानते हैं इसके कारण और निवारण।

साधारण कमर दर्द स्लिप डिस्क तो नहीं ?

हमारे शरीर की हड्डियों की श्रृंखला में रीढ़ की हड्डी एक मुख्य भूमिका निभाती है। गर्दन से लेकर पीठ के निचले हिस्से तक 31 हड्डियों की श्रृंखला है, जो आपस में एक-दूसरे से जुड़ी है। इस श्रृंखला के बीच में एक खोखला पाइप नुमा छेद-सा बनता है। इस छेद से होकर स्पाइनल नर्व की श्रृंखला मस्तिष्क से लेकर कमर के निचले हिस्से तक जाती है। आगे चल कर यह स्पाइनल नर्व शरीर के विभिन्न हिस्सों को कंट्रोल करती हैं। इनका मुख्य कार्य ब्रेन से भेजे जाने वाले न्यूरल सिग्नल को ब्रेन से शरीर के विभिन्न हिस्सों में ले जाना होता है। इसकी लम्बाई पुरुषों में 45 सेंटी मीटर एवं महिलाओं में 43 सेंटी मीटर होती है। रीढ़ की हड्डियों की सुराख के बीच में स्पाइनल नर्व होता है। स्पाइनल नर्व को घेरे हुए एक तरल पदार्थ “स्पाइनल- फ्लूड” होता है। स्पाइनल फ्लूड एवं स्पाइनल कॉर्ड (रीढ़ की हड्डी) का मुख्य प्रयोजन इन स्पाइनल नर्व को सुरक्षा प्रदान करना, शरीर के ढाँचे को मजबूती से संभाले रखना होता है।

इन 31 हड्डियों की श्रृंखला में सबसे पहला सर्वाइकल है, जो हमारी गर्दन के पास से होकर निकलती है। इनकी संख्या 8 है। इसके बाद नंबर आता है थोरेसिक का, जो 12 की संख्या में हैं। हमारी छाती के पास पीठ के हिस्से में इसका स्थान होता है। इसके बाद 5 हड्डियों की श्रृंखला आती है, जिसे लम्बर कहते हैं। इनकी संख्या भी 5 है। ये हड्डियाँ कमर के हिस्से की सहायता करती हैं। इसके साथ ही सैक्रल की श्रृंखला में 5 हड्डियाँ हैं। अंतिम श्रृंखला है कोक्सिजील (coccygeal) की, जो एक संयुक्त हड्डी है। इन हड्डियों के बीच में हर एक के बीच एक सॉफ्ट पैड होता है।

(दिए गए चित्र में हड्डियों के बीच नीले रंग के अवयव ही पैड हैं।) यह पैड दो हड्डियों के बीच कुशन-सा कार्य करती हैं और इनको आपस में घिसने से बचाती हैं। कभी-कभी किसी प्रकार के आघात अथवा अन्य कारणों से हड्डियों के बीच की यह पैड अपने स्थान से आगे-पीछे खिसक जाती है। इस विस्थापन के कारण हड्डियों के बीच से गुजर रही स्पाइनल नर्व पर दबाव पड़ता है। इस दबाव के कारण दबाव के स्थान से लेकर आगे तक चुभता हुआ दर्द होने लगता है। अधिकांशतः यह समस्या या तो गर्दन की हड्डियों में (सर्विकल) अथवा कमर की हड्डियों (लम्बर अथवा सैक्रल) में देखा जाता है। यदि सर्विकल में है तो गर्दन अथवा कंधे एवं बाजुओं में तकलीफ होती है। यदि कमर के हिस्से में है तो कमर अथवा पैरों में यह तकलीफ देखी जाती है।

लापरवाही न बरतें, एक्सरे या एमआरआई से करवाएँ जाँच

समस्या की पहचान चुभन के साथ रहने वाले दर्द से होती है। पुष्टि स्वरूप एक्स-रे और एमआरआई से जाँच होती है। सबसे सटीक जाँच एमआरआई की होती है, जिसमें हड्डी की अंतिम सतह, नर्व की स्थिति का सही आँकलन किया जा सकता है। प्रारम्भ में तो समस्या सिर्फ दर्द तक ही सीमित रहती है, परंतु धीरे-धीरे समस्या बढ़ती जाती है और इसके दुष्प्रभाव के रूप में अन्य तकलीफें शुरू हो जाती हैं। इन तकलीफों में सायटिका, फुट ड्राप (इसमें पैर पर व्यक्ति का कंट्रोल लगभग ख़त्म-सा हो जाता है। इसे आंशिक पक्षाघात अथवा Paralysis. भी कह सकते हैं।), प्रभावित नर्व के कारण सुन्नता अथवा आगे चल कर पक्षाघात का ख़तरा बढ़ जाता है। स्लिप डिस्क के कारण नर्व पर लगातार दबाव पड़ता रहता है। यदि यह दबाव अपेक्षाकृत बढ़ जाए तो नर्व के कट जाने का ख़तरा बढ़ जाता है। एक बार नर्व कट गयी तो सम्बद्ध समस्या स्थायी हो जाती है। नर्व शरीर के जिस हिस्से को कंट्रोल करती है, उसमें विकार उत्पन्न हो जाता है एवं इसका इलाज लगभग असंभव हो जाता है।

शुरुआत में योग, फिज़ियोथेरपी या दवा से हो सकता है ठीक

प्रारंभिक तकलीफ में योग, फिजियोथेरपी एवं दवा के प्रयोग से काबू पाया जा सकता है, परंतु यदि तकलीफ बढ़ जाए तो डॉक्टर ऑपरेशन की सलाह देते हैं। ऑपरेशन के दौरान सर्जन इस खिसकी हुई डिस्क को काट कर निकाल देते हैं। डिस्क के निकल जाने से नर्व पर पड़ने वाला दबाव ख़त्म हो जाता है तथा मरीज को आराम मिल जाता है।

समस्या बढ़ने पर ऑपरेशन ही अंतिम उपाय

ऑपरेशन ऐसी चीज है, जिसका नाम सुन कर बड़े-बड़े हिल जाते हैं। खास कर जब कमर के ऑपरेशन की बात हो। यह है भी जोखिम की बात। इस ऑपरेशन की तीन तरह की विधियाँ प्रचलित हैं। पहली विधि है पारम्परिक ऑपरेशन की, जिसमें सम्बद्ध स्थान कमर अथवा गर्दन के पीछे के हिस्से में चीरा लगाया जाता है एवं डिस्क को काट कर निकाला जाता है। डिस्क को काट कर निकालने की प्रक्रिया को डिसक्टोमी कहा जाता है। इस प्रक्रिया में मरीज को स्पाइनल एनेस्थीसिया दिया जाता है। यानी कि मरीज के स्पाइनल नर्व में सुन्न करने वाली सुई लगाई जाती है और ऑपरेशन किया जाता है। इस ऑपरेशन से एक और उन्नत ऑपरेशन की प्रक्रिया चली, जिसे माइक्रो सर्जरी का नाम दिया गया है। इस ऑपरेशन में भी परम्परागत ऑपरेशन जैसा ही सब कुछ होता है। इन दोनों ऑपरेशन में प्रभावित अंग के आसपास बेहोशी की दवा का असर होने के कारण किसी सूक्ष्म नर्व के प्रभावित होने का ख़तरा रहता है। तीसरे प्रकार का एक ऑपरेशन है Transforaminal Endoscopic Discectomy(Stitchless)। इस विधि में की-होल जैसे एक चीरे के द्वारा सर्जन इंडोस्कोप से प्रभावित डिस्क अथवा उसके हिस्से को निकाल देते हैं। इस प्रक्रिया के दौरान मरीज पूर्णतया होश में रहता है तथा डॉक्टर उससे बातचीत करता रहता है। यदि ऑपरेशन के दौरान किसी सूक्ष्म नर्व में ज़रा-सी भी तकलीफ हो जाती है, तो मरीज को इसका अहसास हो जाता है तथा सर्जन इसका ध्यान रखता है। इस ऑपरेशन की खास बात यह है कि ऑपरेशन के एक घंटे बाद मरीज घर जा सकता है। यह ऑपरेशन लोकल एनेस्थेसिया देकर किया जाता है। इन तीनों ऑपरेशन का अपने-अपने स्थान पर अलग-अलग महत्व है।

ऐसी ही कुछ तकलीफ मैंने देखी है, जिसमें दुर्भाग्यवश मरीज को पारम्परिक ऑपरेशन एवं Transforaminal Endoscopic Discectomy(Stitchless) दोनों प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ा। स्लिप डिस्क (PIVD) के कारण पहले मरीज को फुट ड्राप हुआ। सभी न्यूरो सर्जन ने ऑपरेशन की सलाह दी। अंततः मरीज का ऑपरेशन करवाया गया। यह ऑपरेशन पारम्परिक ऑपरेशन जैसा ही था। ऑपरेशन के बाद मरीज हफ्ता भर ठीक रहा, परंतु हफ्ते भर के बाद उसकी तकलीफ बढ़ गयी। उसका उठना-बैठना भी मुश्किल हो गया। पता चला कि ऑपरेशन के स्थान पर आंतरिक इन्फेक्शन (Post operative discitis) के कारण मवाद जम गया है। जब तक यह मवाद ठीक नहीं हो जाता, शारीरिक तकलीफ में परिवर्तन की आशा नहीं की जा सकती। लगभग सात-आठ माह तक तकलीफ चली, परंतु सुई एवं दवा का कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था। रीढ़ की हड्डी के इस भाग तक दवा का असर लगभग 0.2% ही होता है, क्योंकि इस स्थान पर पहुँचते-पहुँचते उसका अधिकांश भाग या तो शरीर में अवशोषित हो जाता है या फिर शरीर उसे बाहर निकाल देता है। एक मात्र यदि किसी प्रकार से उस स्थान पर सुई द्वारा पहुँच कर दवा डाली जाए तो कुछ होने की संभावना रहती है, परंतु उस स्थान के स्पाइनल नर्व की नाजुकता को देखते हुए कोई भी चिकित्सक ऐसी प्रक्रिया करने की सलाह नहीं देता है। कई डॉकटरों की सलाह ली गयी। सबने एक सुर में कहा कि पुनः ऑपरेशन करना होगा। इसके बाद यदि मवाद (puss) रुक गया, तब तो ठीक है, वरना स्थिति बद से बदतर होने की संभावना है। ठीक होने की संभावना का आश्वासन किसी ने नहीं दिया। सौभाग्यवश एक सहृदय न्यूरो सर्जन डॉ. अजय शर्मा मिले, जिन्होंने एक डॉक्टर को Transforaminal Endoscopic Discectomy(Stitchless) करते हुए देखा था। उन्होंने बताया कि करने को तो मै भी ऑपरेशन करता हूँ, परंतु इस बार भी वही पारम्परिक विधि होगी। इसमें कहा नहीं जा सकता कि इन्फेक्शन कितना जाएगा अथवा निदान कितना हो सकता है। यदि हम लोग चाहें तो Transforaminal Endoscopic Discectomy(Stitchless) से ऑपरेशन करवा सकते हैं। इसमें Post operative infection होने की संभावना अपेक्षाकृत नगण्य है। इसके लिए उन्होंने मुझे उस विशेषज्ञ का फोन नंबर दिया, जो इस प्रकार का ऑपरेशन करते हैं। उनकी सलाह पर हम इस प्रक्रिया के लिए तैयार हो गये। लगभग दो घंटे ऑपरेशन चला। ऑपरेशन के दौरान ऑपरेशन थियेटर में लगे बड़े आकार के T.V. के परदे पर रीढ़ की हड्डी के प्रभावित हिस्से में चल रही समस्त हलचल एवं प्रक्रिया को चिकित्सा दल एवं मरीज देख रहे थे। इस दौरान डॉक्टर मरीज को उसके इन्फेक्शन और उसकी हड्डी की दशा एवं आकार को स्क्रीन पर ही बता रहे थे। ऑपरेशन पूर्णतः सफल रहा। ऑपरेशन के कुछ दिन बाद दवा एवं फिज़ियोथेरपी से मरीज पूर्णतः स्वस्थ हो गया और अब ठीक से चल-फिर सकता है।

ऑपरेशन की प्रक्रिया एक जटिल प्रक्रिया है, जिसमें कहीं ना कहीं कुछ और असुविधाएँ होने की संभावना रहती ही है, परंतु यदि कोई और उपाय ना हो और ऑपरेशन करवाना ही पड़े, तो मेरी सलाह है कि इस नयी प्रक्रिया के बारे में अपने डॉक्टर एवं इस प्रक्रिया के विशेषज्ञ से एक बार अवश्य राय ले लेनी चाहिये। अंततः प्रकृति ने मनुष्य जीवन को सुचारू रूप से चलायमान रखने के लिये एक मूल मंत्र दिया है, वह है अपनी दिनचर्या एवं नियम का पालन करना। इससे बीमारी पास आ ही नहीं सकती है।

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