TEACHERS DAY SPECIAL : गुजरात के ऐसे 3 खास गाँव, जहाँ विद्यार्थी पसंद करते हैं शिक्षक बनना

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रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 5 सितंबर, 2019 (युवाPRESS)। भारत की संस्कृति गुरु-शिष्य तथा भगवान और भक्त की परंपरा पर आधारित है। यहाँ तक कि माता को भी बालक का प्रथम गुरु कहा गया है, क्योंकि वह उसे बोलना सिखाती है और पिता को दूसरा गुरु कहा गया है, जो उसे अंगुली पकड़ कर चलना सिखाता है। इसके बाद बालक की शिक्षा-दीक्षा और संस्करण का उत्तर दायित्व गुरु सँभालते थे। प्राचीन गुरुकुल परंपरा में बालक को गुरु के सुपुर्द कर दिया जाता था, जहाँ से वह शिक्षा पूरी करके घर लौटता था। इसके बाद उसका विवाह संस्कार किया जाता था और वह नौकरी या व्यवसाय प्रारंभ करता था। अब वह परंपरा वर्तमान में स्कूल और कॉलेजों के रूप में परिवर्तित हो गई है, परंतु आज भी हमारे देश में शिक्षकों को गुरु की उपाधि और सम्मान दिया जाता है। क्योंकि शिक्षक देश का भविष्य कहे जाने वाले बालकों को सुशिक्षित कर उनका भविष्य निर्माण करते हैं। शिक्षित होकर ही युवा पसंदीदा क्षेत्र में डॉक्टर, इंजीनियर, चार्टर्ड एकाउंटेंट, आईएएस, आईपीएस आदि बनकर देश के निर्माण में अपना योगदान देते हैं। हालाँकि गुजरात में तीन गाँव ऐसे भी हैं, जहाँ के युवा पढ़-लिखकर डॉक्टर या इंजीनियर बनने की बजाय शिक्षक बनना ही पसंद करते हैं। यही कारण है कि मात्र इन तीन गाँवों में ही शिक्षकों की संख्या लगभग 1,400 है और सरकार के खजाने से 4 करोड़ रुपये वेतन के रूप में इन गाँवों में ही आते हैं। शिक्षकों की भरमार के कारण इन गाँवों को भी ‘शिक्षकों का गाँव’ और ‘TEACHERS VILLAGE’ का टैग मिल गया है। आपको यह जानकर भी अचंभा होगा कि राज्य का कोई ऐसा जिला और तहसील नहीं है, जहाँ इन 3 गाँवों में से किसी गाँव का शिक्षक न पढ़ाता हो।

त्रिवेणी संगम सरीखे हैं तीनों गाँव

यह तीनों गाँव राज्य के अलग-अलग हिस्सों में नहीं हैं, बल्कि यह तीनों गाँव त्रिवेणी संगम के रूप में एक-दूसरे से सटे हुए हैं और राज्य के मुख्य शहर अहमदाबाद से लगभग 90 कि.मी. तथा उत्तरी गुजरात में साबरकांठा के जिला मुख्यालय हिम्मतनगर से मात्र 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं। इन गाँवों का नाम है हडियोल, गढोड़ा और आकोदरा। इन गाँवों की यह विशेषता है कि आप इनमें से किसी भी गाँव के किसी भी घर में जाएँ तो आपको हर घर में 3 से 4 शिक्षक आसानी से मिल जाते हैं। अकेले हडियोल गाँव के 700 शिक्षक राज्य के कोने-कोने में बिखरे हुए हैं और बालकों को शिक्षित कर रहे हैं। इसी प्रकार गढोड़ा गाँव के 400 से अधिक और आकोदरा गाँव के 300 से अधिक शिक्षक राज्य में अशिक्षा के अंधकार को दूर करके शिक्षा की ज्योति से उज्जवल भविष्य का प्रकाश फैला रहे हैं। इस प्रकार शिक्षा प्राप्त करके शिक्षक बनना और अन्य को शिक्षित करके राज्य और देश का भविष्य सँवारना ही इन गाँवों की विशेषता और परंपरा है।

1959 से ही पड़ चुकी कन्या शिक्षा की नींव

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ का नारा बुलंद किया था, जो अब पूरे देश में एक अभियान बन चुका है, परंतु जब उपरोक्त 3 गाँवों की बात आती है, तो कहना पड़ेगा कि इन गाँवों में बेटी पढ़ाओ की नींव वर्ष 1959 में ही पड़ चुकी थी। विश्व मंगलम्-अनेरा नामक गांधीवादी संस्था को इन गाँवों में इतने सारे शिक्षक तैयार करने का श्रेय दिया जाता है। जब 1950-60 के दशक कन्याओं को पढ़ाने का प्रचलन ना के बराबर था, तब अनेरा संस्था के संस्थापक गोविंद रावल और सुमतिबेन रावल ने इन गाँवों में घर-घर जाकर लोगों को अपने बच्चों को खास कर बेटियों को भी पढ़ाने के लिये जागृत किया था। उन्होंने बालकों के साथ-साथ बालिकाओं को भी शिक्षित करने के लिये अपने स्तर से भी विशेष प्रयास किये थे। उनके ही प्रयासों का यह परिणाम है कि इन 3 गाँवों के लगभग 1,400 शिक्षकों में 300 से अधिक शिक्षिकाएँ भी हैं, जो राज्य के विभिन्न हिस्सों में शिक्षा की अलख जगा रही हैं। इसके साथ-साथ यह गाँव गांधीजी के विचारों तथा शिक्षा के सिद्धांतों को भी प्रचारित कर रहे हैं।

वेतन के रूप में 4 करोड़ से अधिक रकम आती है इन गाँवों में

इन गाँवों में सेवा निवृत्त शिक्षकों की संख्या भी कम नहीं है। अकेले हडियोल गाँव में रिटायर्ड टीचर्स की संख्या लगभग 200 है। इस गाँव की पाठशाला में ही शिक्षक की सेवाएँ देकर सेवा निवृत्त हुए 3 शिक्षकों को तो राष्ट्रपति के हाथों से श्रेष्ठ शिक्षक का अवॉर्ड भी मिल चुका है। राज्य सरकार के शिक्षा विभाग से प्राप्त जानकारी के अनुसार इन 3 गाँवों में ही शिक्षकों के वेतन और सेवा निवृत्त शिक्षकों की पेंशन के रूप में 4 करोड़ रुपये से अधिक की रकम हर महीने आबंटित होती है। खुद शिक्षित होकर शिक्षक बनना तथा अन्यों को शिक्षित करना इन गाँवों की पीढ़ी दर पीढ़ी परंपरा बन गई है। यही कारण है कि इस गाँव के अधिकांश युवा पढ़-लिखकर डॉक्टर या इंजीनियर बनने की बजाय पी.टी.सी. अथवा बी.एड करके शिक्षक की नौकरी करना ही पसंद करते हैं।

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