2 V/S 22 : इतनी कवायद के बावजूद सत्ता तो दूर, विपक्ष के नेता का पद भी नहीं मिल सका मोदी विरोधियों को

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आवश्यक 54 सीटों से 2 अंक दूर रह गए मोदी विरोधी टोली के ‘सरदार’ राहुल गांधी

मोदी विरोध के उन्माद में ममता ने खोई बंगाल की ज़मीन

दिल्ली फतह को आतुर नायडू ने गँवाया हैदराबादी किला

राजा बनने-बनाने का सपना देखने वाले माया-मुलायम-अखिलेश बने रंक

मोदी विरोधी एजेंडा के विरुद्ध केसीआर की जनता ने कर दी किरकिरी

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 25 मई, 2019। लोकसभा चुनाव 2019 सम्पन्न हो गया। पिछले छह महीनों से दिल्ली के जिस सिंहासन को लेकर राजनीतिक दलों में प्रतिस्पर्धा लगी हुई थी, वह भी पूरी हो गई। देश ने प्रधानमंत्री पद के लिए नरेन्द्र मोदी को ही दोबारा चुना, परंतु पिछले तीन वर्षों से मोदी विरोधी राजनीतिक एजेंडा लेकर चल रहे 22 राजनीतिक दल मिल कर भी नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की घातक-मारक रणनीति के सामने टिक नहीं पाए। यहाँ तक तो फिर भी ठीक रहा, परंतु इन राजनीतिक दलों की दुर्गति की पराकाष्ठा तो तब हो गई, जब देश की जनता ने भारतीय जनता पार्टी (बीजेजी-BJP) नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग-NDA) के विरुद्ध एकजुट का दिखावा करने वाले बड़े-बड़े धुरंधर नेताओं के राजनीतिक दलों को लोकसभा में विपक्ष का नेता बनने योग्य सीटें देने के योग्य भी नहीं समझा।

जी हाँ। हम बात कर रहे हैं लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष (LOO) पद की, जो गत 20 मई, 2014 से रिक्त पड़ा है। सुषमा स्वराज लोकसभा में विपक्ष की अंतिम विपक्ष की नेता थीं। उनके बाद से यह कुर्सी खाली पड़ी है। इस कुर्सी पर वही नेता बैठ सकता है, जिसके दल ने लोकसभा सदस्यों की कुल संख्या 543 की 10 प्रतिशत यानी न्यूनतम् 54 सीटें हासिल की हों। लोकसभा चुनाव 2014 में तो तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, तत्कालीन कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह जैसे नेता देश में चली नरेन्द्र मोदी की लहर को रोक नहीं पाए, परंतु सबसे बड़ा आश्चर्य तब हुआ, जब 13 वर्षों तक गुजरात में काम करने वाले और केन्द्र की राजनीति में नए-नए आए नरेन्द्र मोदी की इस आंधी ने देश की सबसे पुरानी और ऐतिहासिक पार्टी कांग्रेस को ऐतिहासिक 44 सीटों पर समेट दिया। इसके साथ ही 17 वर्षों बाद ऐसा चौथी बार हुआ, जब लोकसभा में विपक्ष के नेता का पद किसी को नहीं मिला और अगले पाँच वर्षों तक यानी 2019 तक LOO पद रिक्त पड़ा रहा।

मोदी फिर लील गए LOO पद

नरेन्द्र मोदी ने आज से ठीक 4 वर्ष 11 महीने और 29 दिन पहले यानी 26 मई, 2014 को पहली बार देश के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। मोदी लहर में भाजपा-एनडीए के विरुद्ध खड़ी कांग्रेस सहित कोई भी पार्टी विपक्ष के नेता पद के लिए अनिवार्य 54 सीटों का जुगाड़ नहीं कर सकी। यह तो पाँच वर्ष पुरानी बात हुई। सत्ता पाने के बाद नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह तो 2019 में दोबारा सत्ता में आने के पुरुषार्थ में जुट गए, परंतु भाजपा-एनडीए विरोधी दलों ने सरकार को मुद्दा बनाने की बजाए मोदी को ही मुद्दा बना डाला और विपक्ष की मूल भावना को नष्ट कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि नरेन्द्र मोदी की सुनामी फिर एक बार विपक्ष के नेता (LOO) का पद लील गई। एक तरफ केन्द्र में भाजपा-एनडीए सरकार की वापसी के लिए 2 नेता (नरेन्द्र मोदी और अमित शाह) जुटे हुए थे, तो दूसरी तरफ भाजपा-एनडीए सरकार की बजाए मोदी को हटाने के लिए कांग्रेस सहित 22 दलों के नेताओं की फौज़ पूरे देश में धूम मचा रही थी, परंतु मोदी विरोधी टोली की यह हवाई कवायद सतह पर फुस्स हो गई और मोदी के पक्ष में लोगों ने ऐसा जनादेश दिया कि भाजपा-एनडीए विरोधी 22 दलों में से किसी भी दल को विपक्ष के नेता का पद हासिल करने के लिए अनिवार्य 54 सीटें नहीं मिल सकीं।

धुर-विरोधी धुरंधर हुए ध्वस्त

दिल्ली में कांग्रेस की दिग्गज नेता सोनिया गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में मोदी विरोधी भोज से लेकर सोच तक सीमित 22 राजनीतिक दलों के नेताओं ने बेंगलुरू, कोलकाता, जयपुर, भोपाल और रायपुर में भी सार्वजनिक मंचों पर राहुल के हाथों में हाथ डाल कर दिखावे की एकजुटता दिखाई। मोदी के धुर-विरोधियों के रूप में उभरे मुख्य नेताओं में राहुल गांधी, ममता बैनर्जी, चंद्रबाबू नायडू, के. चंद्रशेखर राव (केसीआर), मायावती, अखिलेश यादव, अरविंद केजरीवाल, सीताराम येचुरी, एच. डी. देवेगौड़ा, एच. डी. कुमारस्वामी और न जाने कितने नेता उभरे, परंतु 16 मई, 2019 को इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVM) से निकले जनादेश ने इन सारे मोदी के धुर-विरोधी धुरंधरों को ऐसा ध्वस्त किया कि इन नेताओं की किसी भी पार्टी को लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद पाने योग्य 54 सीटों के लिए तरस जाना पड़ा। इतना ही नहीं कई धुरंधरों को तो अपनी सीट बचाने के लाले पड़ गए, जिनमें राहुल, देवगौड़ा और शिबू सोरेन, ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे बड़े दिग्गज चुनाव हार गए। यद्यपि कांग्रेस के अलावा इनमें से अधिकांश मोदी विरोधी नेता और दल LOO पद पाने के योग्य 54 सीटों पर भी चुनाव नहीं लड़ रहे थे, परंतु आश्चर्य इस बात का हुआ कि प्रियंका गांधी वाड्रा रूपी ट्रम्प कार्ड राजनीति में उतारने के बावजूद जहाँ एक तरफ कांग्रेस की सीटें 44 से केवल 8 बढ़ कर 52 तक ही पहुँच पाई, वहीं जिस उत्तर प्रदेश के लिए राहुल गांधी ने प्रियंका और ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे धुरंधरों को बागडोर सौंपी थी, उस उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सीटें 2014 की 2 से घट कर 2019 में 1 रह गई। यूपी के साथ दिल्ली फतह पर निकलीं प्रियंका कांग्रेस की जहाँ सिर्फ 8 सीटें बढ़वा सकीं और विपक्ष के नेता पद के लिए जरूरी 54 सीट तक भी न ले जा सकीं, वहीं यूपी फतह पर निकले सिंधिया मध्य प्रदेश में अपने किले गुना के गुनहगार बन गए। कांग्रेस ही नहीं, मोदी विरोधी टोली में शामिल अन्य दलों में जहाँ नायडू की टीडीपी को 3, ममता की टीएमसी को 22, अखिलेश की सपा को 5, मायावती की बसपा को 10, सीताराम येचुरी के वामदलों को 5, केजरीवाल की AAP को 1, एम. के. स्टालिन की डीएमके के 23, उमर अब्दुल्ला की एनसी को 3, शरद पवार की एनसीपी को 5, देवगौड़ा-कुमारस्वामी के जेडीएस को 1, शिबू सोरेन के जेएमएम को 1, केसीआर की टीआरएस को 9, असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम को 2 सीटें मिलीं।

मोदी के शासन में बनेगा-टूटेगा यह रिकॉर्ड भी

लोकसभा चुनाव 2019 में दोबारा जीत कर नरेन्द्र मोदी ने कई नए रिकॉर्ड बनाए, तो कई पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त किए। ऐसे में लोकसभा में विपक्ष के नेता पद के रिक्त रहने के मामले में भी मोदी के शासन में नया रिकॉर्ड बनेगा और पुराना रिकॉर्ड टूटेगा। दरअसल LOO का पद सर्वाधिक 17 वर्षों तक रिक्त रहने का रिकॉर्ड जवाहरलाल नेहरू के शासन में स्थापित हुआ था। 26 जनवरी, 1952 को अस्तित्व में आई प्रथम लोकसभा में विपक्ष के नेता का पद रिक्त था, जो 17 सितम्बर, 1969 यानी 17 वर्ष से अधिक समय तक रिक्त रहा। इसके बाद एलओओपी का पद 27 दिसम्बर, 1970 से 30 जून, 1977 तक यानी 3 वर्ष से अधिक समय तक रिक्त रहा। इंदिरा के शासन काल में 22 अगस्त, 1979 से 18 दिसम्बर, 1989 यानी 10 वर्ष से अधिक समय तक लोकसभा में विपक्ष का कोई नेता नहीं था। अब जबसे मोदी सत्ता में आए हैं यानी 26 मई, 2014 से लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष (LOO) का पद रिक्त है, जो 2019 में भी नहीं भरा। इसका सीधा अर्थ है कि मोदी अपने शासन काल में नेता प्रतिपक्ष का पद रिक्त रखने के इंदिरा गांधी के 30 वर्ष पुराने रिकॉर्ड की 2024 में बराबरी कर लेंगे।

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