Indian Army Day: ऐसे शूरवीर, जिनकी हिम्मत को दुश्मन ने भी किया सलाम

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आज हमारा देश अपना 70वां सेना दिवस (Indian Army Day) मना रहा है। Field Marshal KM Cariappa 15 जनवरी 1949 को आजाद भारत के पहले सेना प्रमुख बने थे और उनके सम्मान में हर साल 15 जनवरी को सेना दिवस (Indian Army Day) मनाया जाता है। सेना एक ऐसी संस्था है, जिसके प्रति हर भारतीय के मन में सम्मान कूट-कूटकर भरा हुआ है। सेना के जवान अपने घर परिवार से दूर कड़कड़ाती ठंड और चिलचिलाती धूप में भी सीमा की रक्षा के लिए पूरे जी-जान से जुटे होते हैं। मातृभूमि के लिए इन जवानों के मन में इतनी श्रद्धा होती है कि ये जवान अपनी जान की बाजी लगाकर भी अपनी सीमा की रक्षा करते हैं। सेना के जवानों का यही जज्बा हम भारतीयों को अपने घरों में सुरक्षित रखता है। हर साल 15 जनवरी को मनाया जाने वाला सेना दिवस (Indian Army Day) हमें याद दिलाता है कि हम भारतीय, हमेशा अपनी सेना और जवानों के ऋृणी रहेंगे।

सेना का हर जवान हमारे लिए हीरो (Heroes of Indian Army) है, लेकिन कुछ जवान ऐसे भी हैं, जिनकी कहानियां हमें जोश और गर्व से भर देती हैं। इन शूरवीरों की कहानियां हमें बताती हैं कि मातृभूमि के प्रति प्रेम क्या होता है ! यही वजह है कि आज सेना दिवस (Indian Army Day) के उपलक्ष्य में हमनें ऐसे ही कुछ शूरवीरों की कहानियां बताने की कोशिश की है।

कैप्टन विक्रम बत्रा

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हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में जन्में कैप्टन विक्रम बत्रा (Captain Vikram Batra) कारगिल युद्ध के हीरोज में से एक हैं। 13 J&K राइफल्स के जवान कैप्टन विक्रम बत्रा की हिम्मत का लोहा दुश्मन भी मानता था। पाकिस्तानी सेना के एक मैसेज को इंटरसेप्ट करने पर पता चला कि दुश्मनों ने कैप्टन विक्रम बत्रा को “शेरशाह” उपनाम दिया था। कारगिल युद्ध में 17000 फीट की ऊंचाई पर स्थित Peak 5140 को जीतना भारतीय सेना की बहुत बड़ी जीत है। बता दें कि इस जीत में कैप्टन विक्रम बत्रा का बड़ा योगदान था। इस लड़ाई में कैप्टन विक्रम बत्रा बुरी तरह से घायल हुए थे, लेकिन इसके बावजूद वह एक और चोटी 4875 को जीतने के लिए गए और यहां अपने एक साथी को बचाते हुए शहीद हो गए। लेकिन अपने अदम्य साहस से कैप्टन विक्रम बत्रा ने चोटी 4875 पर भी कब्जा कर लिया।

Peak 5140 को जीतने के बाद जब कैप्टन विक्रम बत्रा (Captain Vikram Batra) ने कहा कि “ये दिल मांग मोर…” तो ये वाक्य बेहद प्रसिद्ध हुआ था। कैप्टन विक्रम बत्रा को उनकी बहादुरी के लिए मरणोपरांत सेना के सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र (Param Vir Chakra) से नवाजा गया।

मेजर जनरल इयान कोरडोजो

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मेजर जनरल इयान कोरडोजो (Major General Ian Cardozo) को 1971 की भारत-पाक लड़ाई में अदम्य साहस के लिए जाना जाता है। 5 गोरखा राइफल्स में मेजर इयान कोरडोजो 1971 की लड़ाई में बारुदी सुरंग फटने से घायल हो गए थे। इस पर उन्होंने डॉक्टरी मदद ना मिलने पर खुद ही अपनी टांग को खुकरी से काट दिया था, ताकि पूरे शरीर में इनफेक्शन ना फैल सके।

लेकिन एक टांग गंवाने के बाद मेजर इयान कोरडोजो (Captain Vikram Batra) को सेना ने प्रमोशन देने से इंकार कर दिया। इसके बाद मेजर इयान कोरडोजो ने अपने साहस और समर्पण के दम पर लकड़ी की टांग से सेना की अपनी सारी जिम्मेदारियों को बखूबी पूरा किया। मेजर जनरल इयान कोरडोजो की इस इच्छाशक्ति को देखते हुए सेना ने आखिरकार मेजर इयान कोरडोजो को प्रमोशन दिया। इस तरह इयान कोरडोजो ऐसे पहले विकलांग अफसर बने, जो मेजर जनरल की रैंक तक पहुंचे।

ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान

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उत्तर प्रदेश के बीबीपुर में जन्में इस “नौशेरा के शेर” ने आजादी से पहले साल 1934 में भारतीय सेना ज्वाइन की। लेकिन इसी बीच 1947 में देश का बंटवारा हो गया। कहा जाता है कि पाकिस्तान ने ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान (Brigadier Mohammad Usman) को पाकिस्तानी सेना का चीफ बनाने की पेशकश की थी, जिसे उन्होंने अपनी जन्मभूमि की खातिर ठुकरा दिया और भारत के साथ रहने का फैसला किया। इसी दौरान साल 1947/48 में पाकिस्तानी सेना ने कश्मीर पर हमला कर दिया। तब कश्मीर के नौशेरा और जहानगढ़ रणनीतिक तौर पर बेहद अहम जगह थी। इस वजह से पाकिस्तानी सेना ने यहां बड़ा हमला किया। लेकिन ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान  (Brigadier Mohammad Usman) के आगे उनकी एक नहीं चली और पाकिस्तानी सेना को मुंह की खानी पड़ी। लेकिन इस लड़ाई में नौशेरा का यह शेर शहीद हो गया। ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान को मरणोपरांत महावीर चक्र  (Maha Vir Chakra) से सम्मानित किया गया।

सूबेदार योगेन्द्र सिंह यादव

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उत्तर प्रदेश के औरंगाबाद के अहीर गांव में पैदा हुए योगेन्द्र यादव (Subedar Yogendra Singh Yadav) देश के सबसे युवा परमवीर चक्र विजेता (Youngest Param Vir Chakra Vijeta) हैं। सिर्फ 19 साल की कम उम्र में योगेन्द्र यादव को देश के सर्वोच्च वीरता सम्मान से नवाजा गया था। यह सम्मान सूबेदार योगेन्द्र यादव को 1999 की कारगिल लड़ाई के दौरान अदम्य साहस के लिए दिया गया था। बता दें कि कारगिल युद्ध के दौरान टाइगर हिल (Tiger Hill) जीतने के लिए हमारी सेना का एक दल 16500 फीट ऊंचाई तक चढ़ाई की। इसी दल में सूबेदार योगेन्द्र सिंह भी शामिल थे। अपनी पराक्रम के दम पर सूबेदार योगेन्द्र सिंह ने कई गोलियां लगने के बावजूद 8-10 पाकिस्तानी सैनिकों को ढेर किया। सूबेदार योगेन्द्र सिंह (Subedar Yogendra Singh Yadav) के इस पराक्रम के कारण ही हमारी सेना टाइगर हिल पर तिरंगा फहरा सकी। सूबेदार योगेन्द्र सिंह को उनकी वीरता के लिए परमवीर चक्र (Param Vir Chakra) से सम्मानित किया गया है।

राइफलमैन जसवंत सिंह रावत

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इस परमवीर की वीरता के बखान के लिए तो शायद शब्द ही कम पड़ जाए। राइफलमैन जसवंत सिंह  (Rifleman Jaswant Singh Rawat) 1962 की भारत-चीन लड़ाई में अपनी वीरता के कारण इतने प्रसिद्ध हैं कि उनकी मौत के 40 साल बाद उन्हें “मेजर जनरल” की रैंक पर प्रमोट किया गया। 4th गढ़वाल राइफल्स रेजीमेंट के जवान जसवंत सिंह ने 1962 की लड़ाई में अपनी पोस्ट छोड़ने से इंकार कर दिया था।

दरअसल चीनी सेना के हमले के बाद सेना के उच्च अधिकारियों ने जवानों को सीमा पर स्थित पोस्ट छोड़ने के ऑर्डर दिए। जहां एक तरफ सभी सैनिक अपनी पोस्ट छोड़कर पीछे हट गए, वहीं राइफलमैन जसवंत सिंह रावत (Rifleman Jaswant Singh Rawat) ने अपनी पोस्ट छोड़ने से इंकार कर दिया। इसके बाद जसवंत सिंह ने दो स्थानीय लड़कियों सेला और नूरा की मदद से अपनी पोस्ट पर अपने जीते जी चीन का कब्जा नहीं होने दिया। कहा जाता है कि जसवंत सिंह ने इस तरह से चीनी सेना का मुकाबला किया कि चीनी सेना को लगा ही नहीं कि पोस्ट पर सिर्फ एक जवान मौजूद है। लेकिन अपने आखिरी दम तक अपनी मातृभूमि की रक्षा करने वाले इस परमवीर योद्धा के शहीद होने के बाद चीन ने इस पोस्ट पर कब्जा कर लिया। लेकिन आज इस पोस्ट को जसवंतगढ़ के नाम से जाना जाता है और आज भी उस जगह पर जसवंत सिंह की समाधि बनी हुई है, जिस पर वहां जाने वाला हर जवान माथा टेकना नहीं भूलता। राइफलमैन जसवंत सिंह (Rifleman Jaswant Singh Rawat) को मरणोपरांत महावीर चक्र (Maha Vir Chakra) से सम्मानित किया गया था।

सेकेंड लेफ्टीनेंट अरुण खेत्रपाल

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पुणे में पैदा हुए और 17 पूना होर्स रेजीमेंट (17 Poona Horse Regiment) के जवान अरुण खेत्रपाल (Arun Khetarpal) भी मातृभूमि की रक्षा करते हुए काफी कम उम्र में शहीद हो गए थे। 1971 की भारत-पाक लड़ाई में अपनी बहादुरी से सेकेंड लेफ्टीनेंट अरुण खेत्रपाल (Second Lieutenent Arun Khetarpal) ने दुश्मन के दांत खट्टे कर दिए थे। 1971 की शाकरगढ़ की लड़ाई में अरुण खेत्रपाल ने तकनीकी तौर पर मजबूत पाकिस्तानी सेना के कई टैंकों को ध्वस्त कर दुश्मनों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था। हालांकि इस लड़ाई में देश का यह वीर सपूत भी वीरगति को प्राप्त हुआ। सेकेंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल (Second Lieutenent Arun Khetarpal) को उनकी बहादुरी के लिए सेना का सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र  (Param Vir Chakra) प्रदान किया गया।

मेजर सोमनाथ शर्मा

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4th कुमाऊं रेजीमेंट के इस बहादुर जवान ने सिर्फ 24 साल की कम उम्र में देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। 1947 की भारत-पाक लड़ाई में चोटिल होने के बावजूद मेजर सोमनाथ शर्मा (Major Somnath Sharma) ने भाग लिया। 3 नवंबर 1947 को बडगाम में उनकी पैट्रोलिंग टीम पर 700 के करीब पाकिस्तानी सैनिकों ने हमला कर दिया। चारों ओर से घिरने के बावजूद मेजर सोमनाथ शर्मा (Major Somnath Sharma) और उनकी टीम ने बड़ी ही बहादुरी से दुश्मनों का सामना किया। कहा जाता है कि उनकी टीम का एक-एक जवान दुश्मनों के 7-7 जवानों पर भी भारी पड़ा था। चोटिल होने के बावजूद मेजर सोमनाथ शर्मा ने बड़ी ही वीरता के साथ दुश्मन का सामना किया और अंत में लड़ते-लड़ते शहीद हुए। मेजर सोमनाथ शर्मा देश के पहले सैनिक थे, जिन्हें परमवीर चक्र (Param Vir Chakra) से नवाजा गया।

नायक जदुनाथ सिंह

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नायक जदुनाथ सिंह (Naik Jadu Nath Singh) देश के चौथे सैनिक थे, जिन्हें परमवीर चक्र (Param Vir Chakra) से सम्मानित किया गया। 1947/48 की भारत-पाकिस्तान लड़ाई के दौरान नायक जदुनाथ (Naik Jadu Nath Singh) ने अपनी बुद्धिमानी और बहादुरी के दम पर 3 बार दुश्मन को छकाकर अपनी पोस्ट की रक्षा की। 6 फरवरी 1948 को सीमा से लगती तेंधार पोस्ट पर पाकिस्तानी सेना ने हमला किया। लेकिन अपने 9 जवानों के साथ नायक जदुनाथ ने पाकिस्तानी सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।

इसके बाद दुश्मनों ने दूसरी बार फिर से इस पोस्ट पर हमला किया, लेकिन नायक जदुनाथ के नेतृत्व में हमारे जवानों ने फिर से दुश्मनों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। हालांकि इस बार हमारे सभी जवान घायल हो गए, जिनमें से कुछ शहीद हो गए। कुछ समय बाद पाकिस्तानी सेना ने फिर से पोस्ट पर हमला किया। बुरे हालातों के बावजूद नायक जदुनाथ (Naik Jadu Nath Singh) ने फिर से मोर्चा संभाला और अंत तक अकेले मशीनगन से दुश्मनों को ढेर करते रहे। आखिर में 2 गोलियां नायक जदुनाथ को आकर लगी और ये महान योद्धा हमेशा के लिए सो गया।

सूबेदार करम सिंह

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पंजाब के संगरुर जिले के सेहना गांव में जन्में सूबेदार करम सिंह (Subedar Karam Singh) देश के पहले ऐसे परमवीर चक्र  (Param Vir Chakra) विजेता हैं, जिन्होंने जीवत रहते हुए यह सम्मान हासिल किया। सूबेदार करम सिंह पहले ऐसे सैनिक थे, जिन्हें ब्रिटिश काल और आजाद भारत के सर्वोच्च सम्मानों से नवाजा गया।

13 अक्टूबर 1948 को कश्मीर की रिच्छमार गली की लड़ाई में पाकिस्तान के भीषण अटैक के कारण भारतीय सेना को काफी नुकसान हुआ था। वहीं पाकिस्तानी हमले के कारण भारतीय सैनिकों का अपने उच्च अधिकारियों के साथ संपर्क भी टूट गया था। ऐसे हालातों में भी सूबेदार करम सिंह (Subedar Karam Singh) और उनके साथियों ने अपना हौंसला नहीं खोया और संख्या में कम होने के बावजूद जवानों ने अपना हौंसला नहीं खोया और डटकर दुश्मनों का मुकाबला किया। इसका नतीजा ये हुआ कि पाकिस्तान की सेना को मजबूत स्थिति के बावजूद पीछे हटना पड़ा। इस लड़ाई में सूबेदार करम सिंह (Subedar Karam Singh) ने आगे बढ़कर भारतीय सेना का नेतृत्व किया था, जिसके लिए उन्हें परमवीर चक्र (Param Vir Chakra) से सम्मानित किया गया।

मेजर रामास्वामी परमेश्वरन

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महाराष्ट्र के मुंबई में जन्में मेजर रामास्वामी परमेश्वरन (Major Ramaswamy Parameswaran)1987 में श्रीलंका में हुए भारतीय सेना के ऑपरेशन के दौरान शहीद हुए थे। परमेश्वरन और उनकी टीम के जवान एक सर्च ऑपरेशन से लौट रहे थे, जब उन पर आतंकियों ने हमला कर दिया। आमने-सामने की इस लड़ाई में मेजर रामास्वामी परमेश्वरन (Major Ramaswamy Parameswaran) ने कमाल की बहादुरी का परिचय देते हुए दुश्मनों को ललकारा और गोली लगने के बावजूद अपने हाथों से एक आतंकी को मौत के घाट उतार दिया। मेजर रामास्वामी परमेश्वरन की वीरता के कारण ही आतंकियों के पैर उखड़ गए और इस तरह भारतीय सैनिकों ने 5 आतंकियों को मौके पर ही ढेर कर दिया और बड़ी मात्रा में हथियार और गोला-बारूद बरामद किया। हालांकि इस लड़ाई में मेजर रामास्वामी परमेश्वरन (Major Ramaswamy Parameswaran) शहीद हो गए। उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र (Param Vir Chakra) से सम्मानित किया गया।

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