भारत के राष्ट्रीय पशु को ‘पशुओं’ से यूँ बचा रही है मोदी सरकार !

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2022 से पहले ही हासिल किया टार्गेट टाइगर

भारत में बाघों की संख्या हो गई दुगुनी

रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 29 जुलाई 2019 (युवाPRESS)। विकास के नाम पर शहरीकरण, औद्योगिकीकरण के विनाश ने पूरे विश्व में जल, जंगल और जमीन को भारी और व्यापक नुकसान पहुँचाया है। इससे पर्यावरणीय चुनौतियाँ पैदा हुई, जिनका अब खुद मानव समुदाय सामना कर रहा है। सर्वाधिक हानि पर्यावरणीय संतुलन बनाये रखने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले पशु-पक्षियों और जीव-जंतुओं को हुई। जंगलों में जबरन घुसे विकास ने जानवरों के अस्तित्व को ही मिटाना शुरू कर दिया। परिणामस्वरूप कई वन्य प्राणियों की प्रजातियाँ समाप्त हो गईं और कुछ प्रजातियाँ विलुप्त होने की कगार पर पहुँच गई हैं। ऐसा ही कुछ होनेवाला था बाघ (TIGER) के साथ। लेकिन आज की पीढ़ी कहती कि ‘एक था टाइगर !’ उससे पहले ही सरकार की आँख खुल गई और सरकार के टाइगर को बचाने के प्रयासों का ही परिणाम है कि हम सब आज कह रहे हैं कि ‘टाइगर जिंदा है।’

अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस

हर साल 29 जुलाई को अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस मनाया जाता है, जिसकी शुरुआत वर्ष 2010 से हुई है। रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में 2010 में एक सम्मेलन हुआ था, जिसमें अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस मनाने का फैसला किया गया था। तब से हर वर्ष 29 जुलाई को अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस मनाया जाता है। उस समय 2022 तक बाघ की आबादी दुगुनी करने का लक्ष्य भी निर्धारित किया गया था। क्योंकि पिछले लगभग 1,000 साल से बाघों का शिकार हो रहा था, जिससे दुनिया में बाघ भी विलुप्तप्राय होने की कगार पर आ गया था। 20वीं सदी के शुरुआती 7 दशकों तक विश्व के विभिन्न जंगलों में बाघों की संख्या लगभग 1,00,000 आँकी गई थी। इस संख्या ने विभिन्न देशों की आँखें खोल दी और फिर शुरू हुई बाघों को बचाने की मुहिम। 20वीं सदी के अंत तक तो स्थिति ऐसी हो गई थी कि विश्व में लगभग 5,000 से 7,000 बाघ ही बचे थे। तब 1970 के दशक में अधिकांश देशों ने शौक के लिये बाघों के शिकार पर प्रतिबंध लगाया और बाघ की खाल का व्यापार ग़ैर कानूनी ठहराया। इसके बाद 1980 के दशक में बाघों की गणना किये जाने पर पता चला कि उनकी संख्या बढ़ रही है तो ऐसा प्रतीत हुआ कि बाघों के संरक्षण के प्रयास सफल हो रहे हैं।

भारत में बाघ संरक्षित अभयारण्यों की संख्या 9 से बढ़कर 50 हुई

जब पूरे विश्व में बाघों की संख्या लगभग एक लाख पाई गई थी, तब अकेले भारत में उनकी संख्या 40,000 से अधिक थी, परंतु बाघों के अंधाधुंध शिकार और जंगलों के सिमटने से 1972 तक इनकी संख्या घटकर मात्र 1,872 रह गई थी। इसलिये केन्द्र सरकार ने 1973 में ‘बाघ बचाओ योजना’ शुरू की और देश के 9 अभयारण्यों को जिनमें बाघों का वास था, उन्हें बाघ संरक्षित अभयारण्य घोषित किया। अब 2019 तक इन बाघ संरक्षित अभयारण्यों की संख्या बढ़कर 50 तक पहुँच गई है। बाघों को बचाने के लिये 1973 में ही सरकार ने बाघ को ‘राष्ट्रीय पशु’ भी घोषित किया। सरकार ने जिन 9 अभयारण्यों को बाघ संरक्षित अभयारण्य घोषित किया था, उनमें उत्तर प्रदेश का वह जिम कार्बेट वन क्षेत्र भी शामिल था, जो अब उत्तराखंड में है। उत्तर प्रदेश की बात करें तो राज्य में 26 हजार हेक्टेयर से भी अधिक वन इलाके पर अतिक्रमण हो चुका है। राज्य में बाघों के रहने के एक मात्र स्थान ‘दुधवा टाइगर रिज़र्व’ में भी 827 हेक्टेयर जमीन पर अवैध अतिक्रमण हो गया है।

भारत ने किया बाघों को बचाने का संगठित प्रयास

1990 के दशक में संरक्षणकर्ताओं का मानना था कि बाघ के अंगों, खोपड़ी, हड्डियों, गल-मुच्छ, स्नायुतंत्र और खून को लंबे समय से एशियाई लोग विशेष रूप से चीनी लोग औषधि और शक्तिवर्धक पेय बनाने के लिये इस्तेमाल करते हैं, जिनका गठिया, मूषक दंश और विभिन्न बीमारियों को ठीक करने के लिये तथा ताकत और कामोत्तेजना बढ़ाने के लिये इस्तेमाल करते हैं। इसलिये जब तक बाघों के शिकार पर प्रतिबंध नहीं लगेगा तब तक बाघों को संरक्षित कर पाना संभव नहीं होगा। इसलिये संरक्षणकर्ताओं का यह भी मानना था कि विभिन्न देशों की सरकारों पर दबाव बनाने के लिये दुनिया के सुपर पावर अमेरिका को दंडात्मक कार्यवाही की धमकी देनी चाहिये। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के प्रशासन ने अप्रैल 1994 में ऐसा किया भी। ताइवान से लगभग 2 करोड़ 50 लाख डॉलर वार्षिक मूल्य के वन्य जीव उत्पादों के आयात पर प्रतिबंध लगाया। इससे एक महीने पहले मार्च 1994 में भारत ने बाघों को बचाने के लिये एक संगठित प्रयास के रूप में 10 देशों के विश्व बाघ मंच की बैठक बुलाई थी। इसके बाद 2005 में केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने नेशनल टाइगर कंजर्वेशन ऑथोरिटी (NTCA) का गठन किया, जिसे प्रोजेक्ट टाइगर के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी सौंपी।

भारत में 3,000 टाइगर्स जिंदा हैं

ऐसा माना जाता है कि बाघों की उत्पत्ति उत्तरी यूरेशिया में हुई और यह दक्षिण की ओर आये। वर्तमान में इनकी आबादी रूस के सुदूर पूर्वी इलाके से लेकर चीन, भारत, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, म्यांमार और दक्षिण पूर्वी एशिया तक है। बाघों की 8 प्रजातियाँ बताई जाती हैं, जिनमें से जावा बाघ, बाली बाघ और कैरेबियाई बाघ विलुप्त हो चुके हैं। अब विश्व में 5 प्रजातियाँ ही बची हैं। अभी सबसे ज्यादा आबादी शाही बंगाल टाइगर या रॉयल बंगाल टाइगर की है। अन्य प्रजातियों में मेघश्याम तेंदुआ या मेघश्याम बाघ, प्यूमा या हिरन बाघ तथा असिदंत विडाल भी बाघों की श्रेणी में आते हैं। भारत और बांग्लादेश में बंगाल टाइगर प्रजाति के बाघ पाए जाते हैं और दोनों ही देशों में इसे राष्ट्रीय पशु का दर्जा हासिल है। वर्तमान की बात करें तो वर्ष 2010 में वर्ल्ड वाइड फंड फोर नेचर ने बाघों की आबादी 3,500 बताई थी, जबकि इससे पहले डब्ल्यू-डब्ल्यू एफ ने दुनिया में बाघों की कुल आबादी 4,000 के आसपास बताई थी। भारत की बात करें तो वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड एण्ड ग्लोबल टाइगर फॉरम के आँकड़ों के अनुसार दुनिया के 70 फीसदी बाघ भारत में रहते हैं, जिनमें 80 प्रतिशत आबादी बंगाल टाइगर प्रजाति की है। देश में अभी लगभग 3,000 टाइगर जिंदा हैं, इनमें 1,700 बंगाल टाइगर्स हैं।

पीएम मोदी ने पेश की बाघों की संख्या

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस पर अखिल भारतीय बाघ अनुमान-2018 की रिपोर्ट प्रस्तुत की है। इस रिपोर्ट के अनुसार 2018 में हुई पिछली बाघ गणना के समय बाघों की संख्या 2,967 तक पहुँच चुकी है। 2006 से हर 4 साल में बाघों की गणना की जाती है। 2006 में भारत में बाघों की संख्या 1,411 थी, जो 2010 में बढ़कर 1,706, 2014 में बढ़कर 2,226 और 2018 में बढ़कर 2,967 हो गई है। इस प्रकार भारत ने अंतर्राष्ट्रीय फॉरम के 2022 तक बाघों की संख्या दुगुनी करने के लक्ष्य को 2018-19 में ही हासिल कर लिया है।

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