और कश्मीरियों के साथ 87 वर्षों से अन्याय कर रही रणबीर दंड संहिता भी हुई समाप्त

Written by

रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 9 अगस्त, 2019 (युवाPRESS) मोदी सरकार ने जम्मू कश्मीर में लागू धारा 370 को खत्म कर दिया, जो उसे विशेष राज्य का दर्जा देती थी और जिसकी वजह से भारत के कानून जम्मू कश्मीर में पूरी तरह से लागू नहीं हो पाते थे, परंतु यह धारा हटने के साथ ही जम्मू कश्मीर भारत के अन्य राज्यों की श्रेणी में आ गया और अब भारतीय संविधान की जो धाराएँ पूरे देश में लागू होती हैं, वहीं धाराएँ अब जम्मू कश्मीर में भी लागू होंगी। इन्हीं में से एक है भारतीय दंड संहिता यानी इंडियन पीनल कोड (IPC)। इसके स्थान पर जम्मू कश्मीर में अभी तक रणबीर दंड संहिता यानी रनबीर पीनल कोड (RPC) लागू था, जो पिछले 87 वर्षों से कश्मीरियों के साथ अन्याय कर रहा था। हालांकि अब कश्मीरियों को इससे निजात मिल जाएगी।

क्या है रणबीर दंड संहिता (RPC) ?

जैसे भारत में अपराधों और उनकी सजा के लिये भारतीय दंड संहिता यानी इंडियन पीनल कोड (IPC) लागू है। वैसे ही जम्मू कश्मीर में अपराधों और उनकी सजा के लिये रणबीर दंड संहिता या रणबीर आचार संहिता यानी रनबीर पीनल कोड (RPC) लागू था। जम्मू कश्मीर में यह संहिता ब्रिटिश काल से लागू थी, जब जम्मू कश्मीर एक स्वतंत्र रियासत थी, तब 1932 में यह संहिता लागू हुई थी। उस समय जम्मू कश्मीर में डोंगरा राजवंश का शासन था और महाराज रणबीर सिंह शासक थे। ब्रिटिश थॉमस बैबिंटन मैकाले ने रणबीर आचार संहिता की रचना की थी। इस कानून में व्यभिचार को भी अपराध की श्रेणी में रखा जाता था और कड़ी सजा दी जाती थी।

सुप्रीम कोर्ट ने आरपीसी की एक धारा को ठहराया था असंवैधानिक

सुप्रीम कोर्ट भी आरपीसी की धारा 497 को असंवैधानिक ठहरा चुकी है। जस्टिस आर. एफ. नरीमन और जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने गत 2 अगस्त को दिये अपने आदेश में कहा है कि ‘पूर्ण धारा (आरपीसी की 497) को असंवैधानिक घोषित किया जाता है।’ सुप्रीम कोर्ट की इस पीठ ने पिछले वर्ष 27 सितंबर को पाँच जजों की संविधान पीठ द्वारा दिये गये एक फैसले को आधार बना कर यह आदेश दिया है। संविधान पीठ ने व्यभिचार के अपराध से निपटने वाली आरपीसी की औपनिवेशिक काल की धारा 497 को खत्म कर दिया था। संविधान पीठ ने कहा था कि यह धारा आईपीसी के भाग 3 के प्रावधानों का उल्लंघन करती है। क्योंकि यह धारा महिलाओं के व्यक्तित्व को खत्म करने वाली और महिलाओं को उनके पतियों की संपत्ति बनाती है।

क्या प्रावधान नहीं हैं आरपीसी में ?

  • आरपीसी में कई ऐसे प्रावधान नहीं हैं, जो आईपीसी में मौजूद हैं।
  • आईपीसी की धारा 4 कंप्यूटर से किये गये अपराधों को भी पारिभाषित और संबोधित करती है, जबकि आरपीसी में इसके बारे में कोई उल्लेख ही नहीं है।
  • आईपीसी की धारा 153 CAA सार्वजनिक सभाओं या जमावड़ों के दौरान जान-बूझकर शस्त्र लाने को दण्डनीय अपराध मानती है, जबकि आरपीसी में यह विषय ही शामिल नहीं है।
  • आईपीसी की धारा 195 ए में यदि कोई किसी को झूठी गवाही या बयान देने के लिये प्रताड़ित करता है, तो वह दण्ड का अधिकारी है, आरपीसी में ऐसा कोई निर्देश नहीं है।
  • आईपीसी की धारा 304 बी दहेज के कारण होने वाली मृत्यु से जुड़ी है, परंतु आरपीसी में इसका उल्लेख तक नहीं है।
  • आरपीसी की धारा 190 के तहत सरकार किसी भी ऐसे व्यक्ति को सजा दे सकती है, जो ऐसी सामग्री प्रकाशित या वितरित करे, जिसे सरकार द्वारा अमान्य घोषित किया गया है या जब्त किया गया है। इस मामले में मुख्यमंत्री को अपराध निर्धारित करने और सजा देने का प्रावधान है। इस विशेष धारा से पत्रकारिता, सोच, विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित होती है।

आरपीसी के वह प्रावधान, जो आईपीसी में नहीं हैं

  • आरपीसी की धारा 167 ए के अनुसार जो सरकारी कर्मचारी किसी ठेकेदार को उसके नाकरदा काम के लिये भुगतान स्वीकार करता है, वह कानूनी तौर पर सजा का हकदार है। यानी रिश्वतखोरी से जुड़ी यह महत्वपूर्ण धारा आईपीसी में नहीं है।
  • आरपीसी की धारा 420 ए सरकार और सक्षम अधिकारी अथवा प्राधिकरण की ओर से किसी भी समझौते में छल अथवा धोखाधड़ी की सजा का निर्धारण करती है। आईपीसी में ऐसी स्पष्ट व्याख्या नहीं है।
  • आरपीसी की धारा 204 ए सबूत मिटाने या बिगाड़ने की सजा का स्पष्ट निर्धारण करती है। जबकि आईपीसी में इस विषय पर ऐसा स्पष्टीकरण नहीं है।
  • आरपीसी की धारा 21 सार्वजनिक नौकरी का दायरा सुनिश्चित करती है, जबकि आईपीसी में इसका दायरा सीमित है।
Article Categories:
News

Comments are closed.

Shares