स्मृति ईरानी से राहुल गांधी को लगा ‘भय’ सरकारी खज़ाने को लगाएगा 21,38,12,154 रुपए का चूना !

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भारतीय लोकतंत्र में अच्छाइयों की भरमार है, परंतु कुछ अच्छाइयाँ समय की कसौटी पर महंगी भी सिद्ध होती हैं। ऐसी ही एक अच्छाई है किसी भी व्यक्ति को 1 से अधिक सीटों से चुनाव लड़ने की दी गई स्वतंत्रता और इस स्वतंत्रता का समय-समय पर भारत के सभी राजनीतिक दलों ने अपने हित में (देश हित में नहीं) फायदा उठाया है।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी भारतीय संविधान और लोकतंत्र में मिली इसी स्वतंत्रता का अपने राजनीतिक हितों (देश हित को नहीं) को ऊपर मानते हुए लोकसभा चुनाव 2019 में लाभ उठाने का निर्णय किया है। राहुल गांधी इस चुनाव में 2 लोकसभा सीटों से चुनाव लड़ने जा रहे हैं। इनमें 1 सीट है अमेठी, जो जहाँ से 15 वर्षों से यानी 3 बार लगातार सांसद चुने जा चुके हैं, परंतु कदाचित उन्हें लगा कि अमेठी की जनता उन्हें 4थी बार धोखा दे सकती है। इसलिए उन्होंने अपनी दादी इंदिरा गांधी और माँ सोनिया गांधी की तरह दक्षिण का रुख किया और वे केरल की वायनाड लोकसभा सीट से भी चुनाव लड़ने जा रहे हैं।

वैसे राहुल गांधी ऐसे पहले नेता नहीं हैं, जो 2 लोकसभा सीटों से चुनाव लड़ रहे हैं। उनसे पहले इंदिरा गांधी से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मुलायम सिंह और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सहित अनेक नेताओं की लम्बी सूची है, जिन्हें यहाँ लिखने बैठा जाए, तो मूल मुद्दे से भटकना पड़ेगा।

स्मृति ईरानी से राहुल को को क्यों लगा भय ?

सबसे पहले इस बात का विश्लेषण करते हैं कि अंततः राहुल को अमेठी के अलावा कांग्रेस के मजबूत गढ़ केरल में वायनाड जैसी सुरक्षित सीट से भी चुनाव लड़ने को क्यों विवश होना पड़ा और राहुल गांधी का 2 सीटों से लड़ना से देश को कितना महंगा पड़ सकता है ? तो इन दोनों प्रश्न के उत्तर वास्तविक आँकड़े बहुत ही अच्छी तरह से दे रहे हैं। तो पहले प्रश्न का उत्तर यह है कि अमेठी में कांग्रेस की विरासत संभालने वाले राहुल गांधी और पार्टी की लोकप्रियता का ग्राफ नीचे गिरा है। राहुल 2004 में पहली बार 2009 में दूसरी बार अमेठी से जीते थे, परंतु 2014 में उनका सामना भाजपा की तेजतर्रार नेता स्मृति ईरानी से हुआ। स्मृति ने राहुल को हराने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाया। उन्हें सफलता नहीं मिली, लेकिन उनके प्रयत्न से राहुल और कांग्रेस को ऐसा झटका लगा कि 2019 में राहुल को एक सुरक्षित सीट का रुख करना पड़ा। वास्तव में लोकसभा चुनाव 2014 में कांग्रेस के गढ़ अमेठी में कांग्रेस को प्राप्त हुए मतों में 2009 के मुकाबले 25 प्रतिशत की भारी गिरावट आई। 2004 में 66 प्रतिशत तथा 2009 में 71 प्रतिशत वोट पाने वाले राहुल को 2014 में स्मृति के मुकाबले में आने के कारण सिर्फ 46 प्रतिशत वोट ही मिले। इतना ही नहीं, उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2017 में अमेठी संसदीय क्षेत्र में शामिल विधानसभा की 5 में से 4 सीटों पर कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा, क्योंकि अमेठी से चुने जाने के बाद राहुल भले ही राष्ट्रीय राजनीति में व्यस्त रहे, परंतु स्मृति ने राहुल के विरुद्ध अमेठी में मोर्चा डट कर संभाले रखा और इतना ही नहीं भाजपा ने 2019 में यानी इस चुनाव में भी स्मृति ईरानी को ही राहुल के विरुद्ध अमेठी से चुनाव मैदान में उतार दिया। इसके अतिरिक्त कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी मानना है कि राहुल अमेठी के सांसद के रूप में पर्याप्त समय नहीं दे सके और सांसद के रूप में उनके कार्यों से वहाँ की जनता में असंतोष भी है। इन्हीं तमाम भयों के चलते राहुल को वायनाड जैसे सुरक्षित किले का रुख करना पड़ा।

देश को कितना महंगा पड़ेगा राहुल का भय ?

अब यह समझाते हैं कि राहुल के इस भय से देश को अनुमानित कितने रुपए का चूना लगेगा ? इसका अनुमान कुछ आँकड़ों से लगाया जा सकता है। देश में लोकसभा चुनाव 2009 पर चुनाव आयोग ने सरकार के कुल 1,483 करोड़ रुपए खर्च किए थे। पाँच वर्ष बाद 2014 में यह चुनावी खर्च 3 गुना बढ़ कर 3,870 करोड़ रुपए हो गया। इन्हीं आँकड़ों को आधार बना कर यदि यह अनुमान लगाया जाए, तो निष्कर्ष निकलता है कि 5 वर्ष बाद फिर हो रहे लोकसभा चुनाव 2019 में चुनाव आयोग (सरकार का) खर्च लगभग 11,610 करोड़ रुपए पर पहुँच सकता है। 543 सीटों पर चुनाव का खर्च यदि 11,610 करोड़ रुपए होगा, तो एक सीट के चुनाव का खर्च होगा लगभग 21,38,12,154 (21 करोड़ 38 लाख 12 हजार 154 रुपए)। अब राहुल गांधी यदि अमेठी और वायनाड दोनों सीटों से चुनाव जीते, तो निश्चित रूप से वे वायनाड से ही त्यागपत्र देंगे, जैसा कि पूर्व में सभी नेताओं ने अपनी परम्परागत सीट का सांसद बने रहना ही उचित समझा। इसका अर्थ यह हुआ कि 6 महीने के भीतर वायनाड सीट के लिए उप चुनाव कराना पड़ेगा और चुनाव आयोग को इस 1 सीट के उप चुनाव पर लगभग 21,38,12,154 (21 करोड़ 38 लाख 12 हजार 154 रुपए)। रुपए खर्च करने पड़ेंगे।

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