लौह पुरुष के चरणों में इस दिन ‘जम्मू-कश्मीर और लद्दाख’ धरेगी मोदी सरकार !

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सरदार पटेल के साथ भाजपा का भी सपना होगा पूरा

रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 10 अगस्त, 2019 (युवाPRESS)। मोदी सरकार ने धारा 370 हटाने के बाद जम्मू कश्मीर का पुनर्गठन करने की अधिसूचना जारी कर दी है। राष्ट्रपति से जम्मू कश्मीर के पुनर्गठन बिल को मंजूरी मिलने के बाद सरकार ने यह अधिसूचना जारी की है। हालाँकि सरकार ने जम्मू कश्मीर और लद्दाख को केन्द्र शासित प्रदेश बनाने की तारीख दो महीने बाद की तय की है। अधिसूचना के अनुसार मोदी सरकार 31 अक्टूबर-2019 को जम्मू कश्मीर का पुनर्गठन करेगी और उसे दो अलग-अलग केन्द्र शासित प्रदेश घोषित करेगी। सरकार ने यह दिन इसलिये चुना है, क्योंकि इसी दिन देश के प्रथम गृह मंत्री लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की जन्म जयंती है। सरकार का मानना है कि उसने जम्मू कश्मीर को धारा 370 की ज़द से बाहर निकालकर सरदार पटेल के स्वप्न को साकार किया है।

क्या था सरदार पटेल का स्वप्न ?

देश के प्रथम गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल धारा 370 के विरुद्ध थे। सरदार पटेल ही नहीं, कांग्रेस कार्य समिति के सभी सदस्य और संविधान सभा की अनिच्छा के बावजूद इस धारा को स्वीकार किया गया और संविधान का हिस्सा बनाया गया था। सरदार पटेल की ओर से विरोध किये जाने पर पंडित नेहरू ने संसद में कहा था कि यह एक अस्थाई प्रावधान है, जो आगे जाकर समाप्त हो जाएगा, जबकि ऐसा हुआ नहीं। सरदार पटेल ने अपने विश्वसनीय निजी सचिव वी. शंकर से भी कहा था कि अगर कश्मीर मामला उन्हें सौंप दिया जाए तो वह छह महीने में हल ला सकते हैं। इससे साफ है कि सरदार पटेल धारा 370 के पक्ष में नहीं थे और वह जूनागढ़ तथा हैदराबाद की तरह ही कश्मीर का भी भारत में संपूर्ण विलय चाहते थे। जबकि इस धारा के कारण कश्मीर अब तक भारत के साथ जुड़ा होने के बावजूद भारतीय संघ से अलग था, जहाँ अपना संविधान, अपना झंडा और अपनी नागरिकता थी। अब जब 70 साल बाद इस धारा का अंत हुआ है तो मोदी सरकार का मानना है कि उसने सरदार पटेल का स्वप्न पूरा कर दिया है। यही कारण है कि वह जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन को लेकर कोई जल्दबाजी नहीं करना चाहती है और सरदार पटेल की जयंती के दिन ही जम्मू कश्मीर और लद्दाख का पुनर्गठन लागू करना चाहती है। ताकि हर साल इन राज्यों के पुनर्गठन के साथ-साथ सरदार पटेल को भी उनकी जयंती पर याद किया जाए।

भाजपा का भी पूरा होगा एक सपना

भारतीय चुनाव आयोग ने जून महीने में घोषणा की थी कि वह जम्मू-कश्मीर में 15 अगस्त और अमरनाथ यात्रा पूरी होने के बाद चुनाव कराने पर विचार करेगा। इसी बीच संसद में केन्द्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाने का संकल्प और राज्य के पुनर्गठन का बिल पास करवा लिया तो अब दोनों अलग केन्द्र शासित प्रदेशों के पुनर्गठन के बाद ही नये सिरे से चुनाव प्रक्रिया शुरू की जा सकेगी। दोनों प्रदेशों का चुनावी परिसीमन भी किया जाएगा, इसमें जम्मू में कुछ और सीटें बढ़ सकती हैं। चूँकि भाजपा दशकों से जम्मू में विधानसभा सीटें बढ़ाने की माँग करती आ रही है, इसलिये उसका यह सपना पूरा हो सकता है। कश्मीर के पहले प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला के समय में कश्मीर के लिये 43, जम्मू के लिये 30 और लद्दाख के लिये 2 सीटें सुनिश्चित की गई थी। 2011 की जनगणना के अनुसार जम्मू की आबादी 53.78 लाख और कश्मीर की आबादी 68.9 लाख है। चुनाव आयोग ने अभी तक औपचारिक रूप से सीटों के परिसीमन को लेकर सरकार के साथ कोई बातचीत नहीं की है। हालाँकि सूत्रों का कहना है कि राज्य के मुख्य चुनाव आयुक्त जल्दी ही चुनाव आयोग से राज्य को लेकर पारित हुए विधेयकों और परिसीमन के प्रस्ताव की जानकारी साझा करेंगे। इसके बाद ही चुनाव आयोग आगे की प्रक्रिया शुरू करेगा। सूत्रों का यह भी कहना है कि केन्द्र सरकार अक्टूबर-नवंबर में इन प्रदेशों में चुनाव कराने के पक्ष में नहीं है। जम्मू कश्मीर की सुरक्षा व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए चुनाव होने में कुछ देरी हो सकती है।

कश्मीर विधानसभा में घट सकती हैं सीटें

उल्लेखनीय है कि केन्द्र शासित प्रदेश बनने वाले जम्मू कश्मीर में अब विधानसभा की सीटों का नये सिरे से परिसीमन होगा, इसके बाद ही चुनाव प्रक्रिया होगी। इस नये परिसीमन में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिये भी कुछ सीटें आरक्षित की जा सकती हैं। इसके साथ ही दोनों नवगठित प्रदेशों में सीटों का आँकड़ा भी बदल जाएगा और जम्मू कश्मीर विधानसभा में अभी मौजूद कुल 111 सीटें घटकर 107 हो सकती हैं। इनमें से 24 सीटें जो पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर () में पड़ती हैं, उन्हें खाली रखा जाता था। यह सीटें आगे भी इसी तरह रिक्त रखी जाएँगी। अर्थात् केन्द्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर में विधानसभा की सीटों की संख्या 83 हो सकती है।

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