कमल हासन की HATE HINDI पॉलिटिक्स, डायपर वाले बच्चे से की तुलना

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* काश ! कनियन पुंगुंद्रनार से सीखी होती ‘विशालता’

विशेष टिप्पणी : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 4 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। कमल एक ऐसा पुष्प है, जो जलयुक्त कीचड़ में ही उगता है, पनपता और खिलता है, परंतु उसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह जल और कीचड़ के बीच रह कर भी उन्हें स्वयं को स्पर्श नहीं करने देता है। अध्यात्म में अक्सर सद्गुरु या उपदेशक अपने शिष्यों-श्रोताओं को संसार में ‘जल कलमवत्’ रहने का उपदेश देते हैं यानी जल के बीच जिस तरह कमल शुद्ध स्वरूप नहीं छोड़ता, उसी तरह मनुष्य को भी संसार रूपी सागर में मोह-माया रूपी जल का स्पर्श नहीं होने देकर निर्लेप रहते हुए नि:स्वार्थ व निष्काम भाव से सारे कर्तव्यों का निर्वहन करना चाहिए।

जलकलमवत् की परिभाषा देने के पीछे कारण है कमल हासन। दक्षिण भारतीय फिल्मों के सुपर स्टार और ‘एक-दूजे के लिए’ से लेकर अनेक हिन्दी फिल्मों यानी बॉलीवुड फिल्मों में काम कर करोड़ों रुपए की कमाई करने वाले कमल हासन एक अभिनेता के रूप में तो जल कमलवत् ही थे, परंतु जैसे ही वे अभिनेता से नेता बने, उनके लिए दर्शकों की भीड़ अब जनता बन गई और इतना ही नहीं, कमल को भारत और तमिलनाडु की जनता अलग-अलग नज़र आने लगी। अक्सर लोग संकीर्णता से व्यापकता की ओर जाते हैं, परंतु राजनीति और वोट बैंक का लालच नेताओं को व्यापकता से संकीर्णता की ओर ले जाता है। यही कारण है कि कमल हासन आज भाषा की राजनीति करते हुए एक मानव के रूप में नहीं, अपितु जड़ के रूप में व्यवहार कर रहे हैं। इसीलिए हमने उन्हें जड़ कमल कह कर संबोधित किया है, क्योंकि वोट बैंक की गंदी राजनीति करने पर उतारू मक्कल निधि मय्यम (MNM) के संस्थापक अध्यक्ष कमल हासन तमिल राजनीति से इतर तमिल भाषा पर राजनीति कर रहे हैं और इस डर्टी पॉलिटिक्स ने उन्हें डायपर तक गिरा दिया है।

सहिष्णु है हिन्दी, यह अभद्र दुस्साहस भी सह जाएगी

आश्चर्य ! कितना बदल गए कमल हासन !

वास्तव में दक्षिण भारत की राजनीति मूलत: स्थानीय संस्कृति पर निर्भर है। यही कारण है कि दक्षिण भारत के अधिकांश राज्यों में हिन्दी को न केवल स्वीकार नहीं किया जाता, अपितु कमल हासन जैसे कुत्सित राजनेताओं के कारण हिन्दी का तिरस्कार तक किया जाता है। पिछले महीने यानी 14 सितंबर को हिन्दी दिवस के अवसर पर गृह मंत्री अमित शाह ने ‘एक राष्ट्र-एक भाषा’ वाला बयान क्या दे दिया, कमल हासन उसी दिन से तमिल राजनीति में तमिल भाषा संरक्षक का चेहरा बन कर उभरने की कोशिश में जुट गए। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2021 की तैयारी में जुटे कमल ने शाह के बयान को अपने राजनीतिक स्वार्थ के वश होकर तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करना शुरू किया और अब तो वे डायपर तक गिर गए। गत 14 सितंबर के बाद से ही भाषा के नाम पर गंदी राजनीति कर रहे कमल हासन ने हिन्दी पर एक और हमला करते हुए कहा, ‘भाषाओं के परिवार में हिंदी सबसे छोटी है। यह डायपर वाले बच्चे की तरह है। हमें इसका उसी तरह से ध्यान रखने की जरूरत है, जैसे बच्चों का ध्यान रखा जाता है। तमिल, संस्कृत और तेलुगू की तुलना में हिंदी भाषा अभी भी सबसे छोटी ही है।’ ख़ैर, कमल हासन जैसे किसी व्यक्ति के कुछ कह देने से हिन्दी को कोई अंतर नहीं पड़ने वाला। हिन्दी-हिन्दू (सनातन धर्म)-हिन्दुस्तान अनादिकाल से थे, हैं और रहेंगे। यहाँ हिन्दी से तात्पर्य कोई संकीर्ण भाषा नहीं, अपितु भारत की तमिल सहित सभी भाषाओं से है। यहाँ हिन्दू का अर्थ अनादि-अनंत सनातन धर्म से है, जिसकी न किसी ने स्थापना की है और न ही उसका कोई अंत होने वाला है। हिन्दुस्तान भी सदियों से लाखों-करोड़ों अपनों-परायों के आवागमन के बीच ज़िंदाबाद था, ज़िंदाबाद है और ज़िंदाबाद रहेगा, जिसमें तमिलनाडु भी शामिल है। जहाँ तक प्रश्न हिन्दी का है, तो विश्व की सबसे सहिष्णु भाषा में हिन्दी शिखर पर है। पौराणिक संस्कृत से शुद्ध हिन्दी की उत्पत्ति के बाद इस भाषा ने पहले उर्दू और फिर अंग्रेजी भाषाओं के संक्रमण झेले। इसके बावजूद हिन्दी डटी हुई है और कमल हासन का यह अभद्र दुस्साहस भी अपनी सहिष्णुता के बल पर हिन्दी सह जाएगी।

कमल के मुँह पर क़रारा तमाचा हैं ये आँकड़े

अब बात करते हैं कमल हासन द्वारा हिन्दी की तुलना डायपर वाले बच्चे से किए जाने की। वास्तव में राजनीतिक स्वार्थ इंसान को इतना अंधा बना देता है कि वह कुर्सी के लिए कभी-कभी घर के लोगों तक को भूल जाता है। कुछ ऐसा ही कमल हासन कर रहे हैं। अपनी कई तमिल फिल्मों को हिन्दी संस्करण में रिलीज़ कर करोड़ों रुपए कमाने वाले कमल को तहेदिल से हिन्दी से नफरत नहीं होगी। यह तो उनकी राजनीतिक विवशता है, परंतु विवशता में विवेक नहीं खोना चाहिए। अब जबकि कमल ने विवेक खो ही दिया है, तो उन्हें ये आँकड़े भी पढ़ लेने चाहिए, जो उनके मुँह पर क़रारे तमाचे के समान होगा। भारत की कुल 136 करोड़ लोगों की जनसंख्या में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा हिन्दी है। देश के 50 प्रतिशत लोग यानी 55 करोड़ 14 लाख 16 हजार 518 लोग हिन्दी भाषा बोलते हैं, जबकि कमल हासन जिस तमिल, तेलुगू और संस्कृत को हथियार बना कर हिन्दी पर हमला कर रहे हैं, वह तमिल भाषा केवल 6.68 करोड़ लोग जानते-बोलते हैं और देश में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में तमिल छठे स्थान पर है, तो 8.50 करोड़ लोगों की भाषा तेलुगू है और देश में यह चौथे स्थान पर है। रही बात संस्कृत की, तो यह कुछ सौ सालों के बाद स्वत: ही ‘लुप्त’ हो जाएगी। जिस देश के सभी महान ग्रंथ संस्कृत भाषा में लिखे हों, उस देश में केवल 5 करोड़ लोगों की भाषा बन कर 18वें स्थान पर जा पहुँचने वाली संस्कृत का भविष्य और क्या कहा जा सकता है ?

मोदी से नहीं, तो कनियन से सीख लेते कमल

भारत यदि विविधताओं के बीच एक है, तो उसकी विशाल-व्यापक विचारधारा के कारण है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गत 27 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र संघ की साधारण महासभा (UNGA) में अपने भाषण में तमिल कवि कनियन पुरुंगदर का उल्लेख किया था। मोदी बोल रहे थे हिन्दी में और बता रहे थे तमिल कवि के बारे में। मोदी ने तो हिन्दी और तमिल भाषियों के बीच कोई भेद नहीं किया। कमल हासन राजनीतिक विवशता के कारण मोदी से यदि कुछ नहीं सीख सकते, तो कम से कम 3000 वर्ष पूर्व अपने ही राज्य तमिलनाडु में हुए आदि कवि कनियन पुरुंगदर से तो कुछ सीख सकते हैं। यूएनजीएम में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब वैश्विक समस्याओं का उल्लेख करते हुए उनके समाधान के लिए एकजुट होकर काम करने की बात कही, तो उन्हें तमिल दार्शनिक याद पुंगुंद्रनार आए। उन्होंने कवि पुंगुंद्रनार की विख्यात कविता ‘याधुम उरे यावरम केलिर’ का उल्लेख किया। तमिल में लिखी इस कविता का हिन्दी में अर्थ होता है, ‘हम सभी जगहों से संबंधित हैं और हर किसी से जुड़े हुए हैं।’ काश ! कमल हासन तमिल दार्शनिक कनियन से व्यापकता, विशालता और विराटता के कुछ गुण ले लेते, तो उनमें विवेक जागृत होता और डर्टी पॉलिटिक्स उन्हें डायपर तक नहीं गिराती।

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