विश्व की सबसे बड़ी पदयात्रा, जो कराती है अद्भुत भारतीय संस्कृति का दर्शन

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* 5 करोड़ श्रद्धालुओं को बिना सरकार मिलती है हर सुविधा

* भोजन से लेकर दवाइयाँ तक सब कुछ नि:शुल्क

रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 29 जुलाई 2019 (युवाPRESS)। भारत में सदियों से काँवड़ यात्रा का आयोजन होता आ रहा है। यह विश्व की सबसे विशाल पदयात्रा कहलाती है। यह यात्रा धार्मिक उद्देश्य से की जाती है, परंतु यह पदयात्रा भारत की गौरवपूर्ण संस्कृति का विश्व को दर्शन कराती है। क्या आपने विश्व में कहीं पर भी ऐसा दृश्य देखा है, जहाँ सरकारी स्तर पर कोई पूर्व आयोजन न किया गया हो, फिर भी लगभग 5 करोड़ राहगीरों को भोजन और दवाइयों सहित विश्राम और चाय-नास्ते तक की सभी आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध हो जाएँ। ऐसा सिर्फ इसी देश में संभव है। इसीलिये यह देश महान है।

श्रावण माह में आयोजित होती है काँवड़ यात्रा

भारत में हर वर्ष श्रावण माह में भगवान शिव के भक्तजन काँवड़ यात्रा करते हैं। इस यात्रा के दौरान शिव भक्त कंधे पर काँवड़ लेकर गंगा नदी तक जाते हैं और काँवड़ में नदी का पवित्र जलकर भरकर पदयात्रा करते हुए ही वापस अपने घर लौटते हैं तथा अपने घर-मोहल्ले या गाँव में स्थित शिव मंदिर में स्थित भगवान की शिवलिंग का उस पवित्र जल से अभिषेक करते हैं। यह अभिषेक श्रावण माह की चतुर्दशी को किया जाता है।

आसान नहीं काँवड़ यात्रा, नियमों का पालन होता है जरूरी

यह यात्रा आसान नहीं होती है। अपने घर-गाँव से लेकर गंगा तट तक जाना और काँवड़ में गंगाजल लेने के बाद काँवड़ को घर तक लाने के दौरान काँवड़ियों को कई कड़े नियमों का पालन करना होता है। वह काँवड़ को कंधे से उतारकर जमीन पर नहीं रख सकते। बिना स्नान किये काँवड़ को नहीं छू सकते। काँवड़ियों के लिये शरीर पर चप्पल और चमड़े के कमरपट्टे (बेल्ट) जैसी अपवित्र वस्तुएँ धारण करना वर्जित है। लघुशंका या दीर्घशंका के दौरान काँवड़ को किसी पेड़ या ऊँचे स्थान पर लटकाना आवश्यक है, परंतु काँवड़िया स्वयं किसी पेड़ की छाँव में विश्राम नहीं कर सकता। काँवड़ यात्रा के दौरान काँवड़िये माँस-मदिरापान जैसी अपवित्र वस्तुओं का खान-पान भी नहीं कर सकते हैं।

विविध संगठनों और समूहों की ओर से दी जाती हैं सुविधाएँ

उत्तर भारत में उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के अलावा बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, दिल्ली हरियाणा, पंजाब और हिमाचल प्रदेश के विविध गाँवों तथा छोटे-बड़े शहरों से काँवड़ यात्रा निकलती है। यह यात्रा सामूहिक होती है, इसलिये गाँव या शहर से लोग समूह बनाकर काँवड़ यात्रा पर निकलते हैं, यदि किसी गाँव या शहर से कोई अकेला व्यक्ति भी काँवड़ यात्रा पर निकलता है, तो मार्ग में उसे किसी समूह का हिस्सा बनकर उससे जुड़ जाना होता है। इस बीच मार्ग में काँवड़ियों को विविध सामाजिक, स्वैच्छिक और सेवाभावी संगठनों तथा सेवा भावी युवक मंडलों की ओर से चाय, नास्ता, शीतल पेय छाछ-शरबत आदि, शुद्ध व सात्विक भोजन, स्वास्थ्यरक्षक दवाइयाँ तथा पीने का पानी और विश्राम के लिये तंबुओं आदि की सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं। इस यात्रा में पूरे उत्तर भारत से लगभग 5 करोड़ लोग भाग लेते हैं, इतनी बड़ी तादाद में लोगों के लिये यह सभी सुविधाएँ केवल स्वैच्छिक और सेवाकीय संगठनों के भरोसे ही उपलब्ध होती हैं। इसके लिये सरकारों की ओर से कोई सहायता या आयोजन नहीं किया जाता है। इसके बावजूद हर साल यह यात्रा सफलतापूर्वक सम्पन्न होती है। सरकारों की ओर से केवल गंगा घाटों पर सुरक्षा बंदोबस्त की जिम्मेदारी निभाई जाती है। बाकी सारे आयोजन स्थानीय स्तर पर छोटे-छोटे समूह और संगठनों की ओर से ही किये जाते हैं। विभिन्न शहरों से गंगा की ओर जाने वाले मार्गों पर काँवड़ियों की सेवा के लिये जगह-जगह सेवा शिविर सजे दिखाई देते हैं। इन मार्गों पर भोलेनाथ के भजन और नारे गूँजते हैं और पूरे वातावरण को भक्तिमय बना देते हैं।

इस बीच काँवड़ियों की व्यक्तिगत पहचान समाप्त हो जाती है। सब भगवान भोलेनाथ के भक्त कहलाते हैं। इसके अलावा उनकी कोई जाति या सामुदायिक पहचान नहीं होती है। कोई आर्थिक रूप से भी छोटा या बड़ा नहीं होता है। सेवा शिविरों के सेवक विनम्रतापूर्वक काँवड़ियों की सेवा का यज्ञ करके भगवान का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

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