‘संवैधानिक कसौटियों’ का कुरुक्षेत्र बन गया कर्नाटक का नाटक !

Written by

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 20 जुलाई, 2019 (युवाPRESS)। कर्नाटक में पिछले एक सप्ताह से अधिक समय से राजनीतिक उठापटक चल रही है। जनता दल सेकुलर (जेडीएस-JDS) और कांग्रेस (CONGRESS) की गठबंधन सरकार बहुमत के संकट से जूझ रही है। जेडीएस नेता एवं मुख्यमंत्री एच. डी. कुमारस्वामी का विधानसभा सदन में बहुमत परीक्षण एक-एक दिन करके टलता जा रहा है या टाला जा रहा है। यह स्थिति उत्पन्न हुई है जेडीएस और कांग्रेस के 15 विधायकों के त्यागपत्र देने के कारण। इन त्यागपत्रों ने 225 सदस्यीय विधानसभा में कुमारस्वामी सरकार को अल्पमत में ला खड़ा किया है।

कर्नाटक के राजनीतिक नाटक का पटाक्षेप कब होगा, यह कहना अभी भी शीघ्रता होगा, क्योंकि भले ही मुख्यमंत्री कुमारस्वामी ने विश्वास मत पर मतदान 22 जुलाई सोमवार को कराने की बात कही हो, परंतु इस पूरे घटनाक्रम में एक से अधिक संवैधानिक सत्ताएँ जुड़ी हुई हैं और सबकी अपनी-अपनी शक्तियाँ और सीमाएँ हैं। यही कारण है कि सदन में उपस्थित विधायकों के मतदान मात्र से बहुमत का परीक्षण आसानी से हो सकता है, वही बहुमत परीक्षण निरंतर उलझता जा रहा है।

वास्तव में कर्नाटक की राजनीतिक उठापटक में कई संवैधानिक कसौटियों की प्रतिष्ठा, अधिकार, मर्यादा, शक्तियाँ और सीमाएँ दाँव पर लगी हुई हैं। यही कारण है कि कर्नाटक का नाटक संवैधानिक कसौटियों का कुरुक्षेत्र बन गया है। इन संवैधानिक सत्ताओं में एक तरफ न्यायपालिका है, तो दूसरी तरफ विधायिका है। न्यायपालिका की बात करें, तो विद्रोही विधायकों के त्यागपत्रों को स्वीकार करने या न करने का मामला उच्चतम् न्यायालय (SC) तक पहुँच गया, तो दूसरी तरफ विधायिका की बात करें, तो राज्यपाल वजूभाई वाळा और विधानसभा अध्यक्ष के. आर. रमेश कुमार हैं।

इन सभी संवैधानिक सत्ताओं के बीच देश या किसी भी राज्य की सरकार के बहुमत का निर्णय केवल और केवल सदन में होता है और भारतीय संविधान में सदन के अध्यक्ष को ही किसी भी सरकार के बहुमत का निर्णय करने के लिए सर्वोच्च सत्ताधीश माना गया है। इसीलिए मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी-BJP) और उसके नेता बी. एस. येदियुरप्पा के लाख प्रयासों, राज्यपाल वजूभाई वाळा की ओर से निरंतर दिए जा रहे आदेशों-निर्देशों के बावजूद सदन में कुमारस्वामी सरकार का बहुमत परीक्षण शुक्रवार को भी नहीं ही हो सका, क्योंकि विधानसभा में अध्यक्ष ही किंग होता है।

संवैधानिक सत्ता के बावजूद निष्पक्षता का इतिहास

225 सदस्यीय विधानसभा में यदि कांग्रेस-जेडीएस के 15 विधायक त्यागपत्र दे चुके हैं और सुप्रीम कोर्ट यह आदेश भी दे चुका है कि विधायकों का त्यागपत्र स्वीकार करना या न करना यह अध्यक्ष का विशेषाधिकार है, परंतु उन्हें सदन में उपस्थित रहने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। ऐसे में यह तो निश्चित है कि कुमारस्वामी सरकार अल्पमत में आ चुकी है। ऐसे में यदि सदन के अध्यक्ष वास्तव में अपनी संवैधानिक शपथ के अनुसार निष्पक्षतापूर्ण व्यवहार करें, तो कुमारस्वामी सरकार का कब से पतन हो चुका होता, परंतु भारतीय राजनीतिक इतिहास राज्यपालों से लेकर विधानसभा अध्यक्षों का पक्षपातपूर्ण रहा है। यही कारण है कि कर्नाटक विधानसभा अध्यक्ष के. आर. रमेश कुमार भी अध्यक्ष की भूमिका में कम, कांग्रेस नेता की भूमिका में अधिक नज़र आ रहे हैं और शक्ति परीक्षण को टालते जा रहे हैं। यही स्थिति राज्यपाल वजूभाई वाळा को लेकर भी है। सभी जानते हैं कि वजूभाई वाळा भाजपा के दिग्गज नेता हैं, गुजरात सरकार में वरिष्ठ मंत्री रह चुके हैं। यही कारण है कि सदन की कार्यवाही को लेकर वे निर्देश-आदेश जारी कर रहे हैं, जो कई संवैधानिक जानकारों के अनुसार राज्यपाल के अधिकार क्षेत्र से बाहर की बात है। कर्नाटक के कुरुक्षेत्र में दिल्ली में विराज़ित देश के दो सर्वोच्च संवैधानिक पदों को भी कसौटी में डाल दिया है। केन्द्र में भाजपा सरकार है। वैसे भाजपा और स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी धारा 356 के दुरुपयोग को लेकर कांग्रेस को सदैव कोसते रहते हैं। ऐसे में मोदी सरकार कर्नाटक के कुरुक्षेत्र में जान-बूझ कर विशेष दिलचस्पी नहीं ले रही है। यदि राज्यपाल कोई अनुशंसा करेंगे, तो उसे स्वीकृति मोदी सरकार देगी और मुहर लगानी होगी राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को। कोविंद भी भाजपा के ही नेता रहे हैं। इस तरह कर्नाटक का कुरुक्षेत्र संवैधानिक सत्ताओं के लिए कसौटी का कुरुक्षेत्र बन गया है।

Article Categories:
News

Comments are closed.

Shares