करवा चौथ 2019 : छलनी से ‘छल’ नहीं, ‘गुण’ ग्रहण करने का अवसर

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रिपोर्ट : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 16 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। करवा चौथ यानी देश के कई पश्चिमोत्तर भारतीय राज्यों का विशेष व्रतोत्सव, जो 17 अक्टूबर गुरुवार को है। करवा चौथ के दिन रात्रि में महिलाएँ छलनी से चंद्र की पूजा करती हैं, परंतु क्या आप जानते हैं कि इस छलनी के पीछे एक बहुत ही सरल, परंतु गंभीर तथ्य छिपा है। चंद्रमा को छलनी से आर-पार देखने का विधान इस बात की ओर इंगित करता है कि पति-पत्नी एक-दसरे के दोष को छान कार सिर्फ सद्गुणों को देखेंगे, जिससे उनका दाम्पत्य जीवन प्रेम और विश्वास की सुदृढ़ डोर के साथ सदा-सदा के लिए बंधा रहे। हिन्दू मान्यताओं के मुताबिक चंद्रमा को भगवान ब्रह्मा का रूप माना जाता है और चंद्र्र को लंबी आयु का वरदान मिला हुआ है। चंद्र में सुंदरता, शीतलता, प्रेम, प्रसिद्धि और लंबी आयु जैसे गुण पाए जाते हैं, इसीलिए सभी महिलाएँ चंद्र को देख कर ये कामना करती हैं कि ये सभी गुण उनके पति में आ जाएँ, वहीं छलनी के विषय में एक और पौराणिक कथा के अनुसार एक साहूकार के सात पुत्र और एक पुत्री थे। पुत्री का नाम करवा था। करवा ने अपने पति की लंबी आयु के लिए करवा चौथ का व्रत रखा था। रात के समय जब सभी भाई भोजन करने लगे, तो उन्होंने अपनी बहन को भी खाने के लिए कहा, परंतु बहन ने कहा, ‘भाई ! अभी चंद्र नहीं निकला है, उसके निकलने पर अर्घ्‍य देकर भोजन करूंगी।’ बहन की यह बात सुन कर और बहन को चंद्रोदय की प्रतीक्षा में व्याकुल देख कर भाइयों ने बहन को खाना खिलाने की योजना बनाई। भाइयों ने दूर कहीं एक दिया रखा और बहन के पास छलनी ले जाकर उसे प्रकाश दिखाते हुए कहा, ‘बहन ! चंद्र निकल आया है, अर्घ्‍य देकर भोजन कर लो।’ इस प्रकार छल से उसका व्रत भंग हुआ और पति बहुत बीमार हो गए। ऐसा छल किसी और विवाहित महिला के साथ ना हो, इसीलिए छलनी में ही दिया रख चंद्र को देखने की प्रथा शुरू हुई।

क्या है करवा चौथ का अर्थ ?

करवा (Karwa) यानी पानी भरने का मिट्टी का बर्तन और चौथ (Chauth) का अर्थ है चतुर्थी अर्थात करवा चौथ आश्विन महीने के अंधियारे पक्ष यानी कृष्ण पक्ष के चौथे दिन मनाया जाने वाला त्योहार है। भारत में सुहागिन महिलाओं के लिए यह दिवस अत्यंत महत्वपूर्ण है। कहते हैं कि पुराने समय में जब सैनिक युद्ध पर जाते थे, तब उनकी पत्नियाँ उनकी सुरक्षा और सकुशल घर वापसी के लिए प्रार्थना करती थीं। इसलिए ये त्योहार मनाया जाता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार रबी फसल चक्र के आरंभ काल यानी गेहूँ की बुवाई के साथ ही इस त्योहार को मनाने की शुरुआत हुई और तब से प्रतिवर्ष रबी फसल की शुरुआत होते ही करवा चौथ मनाया जाता है। इस त्योहार की उत्पत्ति के पीछे एक कहानी ये भी है कि कोई भी युवती जब विवाह कर अपने ससुराल जाती है, तो वहाँ उसके लिए सभी अनजान लोग होते हैं। इस नवोढा को ससुराल में परायापन न लगे और वह नए लोगों के साथ घुल-मिल सके, इसके लिए एक प्रथा यह भी शुरू हुई कि विवाहित महिला अपने ससुराल वाले गाँव की ही एक अन्य महिला को अपना कंगन देकर उसे अपनी धर्म बहन बना लेती, ताकि उसे अकेलापन न महसूस हो और इस रिवाज को करवा चौथ के रूप में मनाने की रीत चल पढ़ी।

70 वर्षों बाद करवा चौथ पर शुभ संयोग

वर्तमान समय में करवा चौथ का व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए विशेष महत्‍व रखता है। मान्‍यता है कि इस व्रत के प्रभाव से पति की आयु लंबी होती है और सभी मनोकामनाएँ भी पूर्ण होती हैं। सुहागिन महिलाओं के अलावा कुँवारी लड़कियाँ भी इस व्रत को रखती हैं, ताकि उन्हें एक मनवांछित जीवन साथी मिल सके। इस दिन महिलाएँ निर्जला (बिना कुछ खाए-पिए) व्रत रखती हैं और रात में चंद्र को अर्घ्‍य यानी चंद्र की पूजा करने के बाद पति के हाथों पानी पीकर अपना उपवास तोड़ती हैं। इस वर्ष 17 अक्टूबर, 2019 को पड़ रहा करवा चौथ त्योहा बहुत ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि 70 वर्षों बाद इस करवा चौथ पर एक शुभ संयोग बन रहा है। पंचांग विशेषज्ञों के अनुसारगुरुवार को रोहिणी नक्षत्र के साथ मंगल का योग होने वाला है, जो करवा चौथ को और भी अधिक मंगलकारी बना देगा। ज्योतिषियों के अनुसार रोहिणी नक्षत्र और चंद्रमा में रोहिणी का योग होने से मार्कण्डेय और सत्याभामा योग इस करवा चौथ पर बन रहे हैं। चंद्रमा की 27 पत्नियों में से उन्हें रोहिणी सबसे ज्यादा प्रिय है। यही कारण है कि यह संयोग करवा चौथ को और विशेष बना रहा है। इसका सबसे अधिक लाभ उन महिलाओं को मिलेगा, ​जो इस वर्ष पहली बार करवा चौथ का व्रत रखने वाली हैं।

करवा चौथ के दिन नहीं करना चाहिए ये काम

वैसे तो किसी भी व्रत के कुछ आधारभूत नियम होते हैं, जैसे कि क्रोध न करना, किसी की बुराई न करना, मुख से अपशब्‍द न निकालना आदि। ठीक उसी प्रकार करवा चौथ के व्रत के दिन भी यह नियम लागू होता है। यदि आप व्रत रखने जा रही हैं, तो ध्यान रखना चाहिए कि आप को क्रोध न आए अन्यथा आपको व्रत का कोई भी लाभ नहीं मिल पाएगा। व्रत रखने वाली महिलाओं अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखना चाहिए। व्रती विवाहिताओं को कैंची का प्रयोग नहीं करना चाहिए। कहा जाता है कि इस दिन व्रती महिलाओं को सुई-धागे और कढ़ाई, सिलाई या बटन टाकने के काम को करने से भी करें परहेज करना चाहिए। करवा चौथ के दिन महिलाओं को चंद्रमा की प्रतीक किसी भी सफेद चीज का दान करने से बचना चाहिए। उदाहरण के लिए सफेद फूल, सफेद कपड़े, दूध, दही चावल, सफेद मिठाई और नारियल का दान नहीं करना चाहिए। सुबह करवा चौथ के व्रत का संकल्प लेते समय काले, सफेद या नीले रंग के कपड़े न पहने। इस व्रत में पूरे दिन चटख रंगों के कपड़े पहनना शुभ माना जाता है। लाल और चटख कपड़े महिला के सुहाग और सौभाग्य का प्रतीक होते हैं। अक्सर लोग सुबह उठते ही आइना देखते हैं। अगर आप भी ऐसा ही कुछ करती हैं, तो करवा चौथ के दिन ऐसा करने से बचें। सुबह उठते ही सबसे पहले अपनी हथेलियों को देखकर अपने ईष्ट देव का ध्यान करना चाहिए। इतना ही नहीं सुहाग से जुड़ी अपनी कोई वस्तु घर के बाहर भी नहीं फेंकनी चाहिए।

इस प्रकार करें पूजा-अनुष्ठान

व्रत की शुरुआत सूर्योदय से पहले सरगी यानी दूध और फेनिया, नारियल पानी, ड्राई फूट्स और फूट्स, सेवईयां, मिठाई या हल्का खाना खाकर करें। सरगी खाते समय अपना मुख दक्षिण पूर्व दिशा की ओर रखना चाहिए। करवा चौथ के दिन निर्जला व्रत करें यानी कि अन्‍न के अतिरिक्त पानी भी न पिएं, परंतु यदि आप पानी पीकर व्रत करना चाहें तो कर सकती हैं, वैसे तो गर्भवती और बीमार महिलाओं को करवा चौथ का व्रत नहीं करना चाहिए। परंतु कई गर्भवती महिलाएँ फल और पानी पीकर भी यह व्रत कर सकती हैं। रात्री में महिलाएँ सोलह श्रृंगार कर सकती हैं। सुहाग के रंग यानी लाल, पीले और हरे रंग की साड़ी, सलवार सूट और लहंगे का सर्वाधिक चलन है। करवाचौथ के व्रत की पूजा में कथा सुनते समय और पूजा करते समय सींक जरूर रखना चाहिए। ये सींक माँ करवा की उस शक्ति का प्रतीक हैं, जिसके बल पर उन्होंने यमराज के सहयोगी भगवान चित्रगुप्त के खाते के पन्नों को उड़ा दिया था। साथ ही माँ करवा की तस्वीर अन्य देवियों के साथ अवश्य रखना चाहिए। उनकी तस्वीर में भारतीय पुरातन संस्कृति और जीवन की झलक मिलती है। चंद्रमा और सूरज की उपस्थिति उनके महत्व का वर्णन करती है। पूजा में घी का दीपक अवश्य जलाएँ, क्योंकि यह हमारे ध्यान को केंद्रित कर एकाग्रता बढ़ाता है साथ ही दीपक की लौ, जीवन ज्योति का प्रतीक भी होती है। पूजा के दौरान लोटे में जल भरकर रखना चाहिए और उसी से चंद्रमा को अर्ध्य देना चाहिए, क्योंकि कलश गणेशजी का प्रतीक माना जाता है। करवा चौथ के व्रत के दिन चंद्र को अर्घ्‍य देना बेहद जरूरी और शुभ माना गया है। इस दिन महिलाएँ सबसे पहले छलनी पर दीपक रखना चाहिए और छलनी से पहले चंद्र को और फिर अपने पति को देखें, इसके बाद चंद्र को अर्घ्‍य देकर पूजा पूर्ण करें। वहीं कुँवारी लड़कियाँ तारों के दर्शन करने के बाद पानी पी सकती हैं। अंत में महिलाएँ पति के हाथ से पानी पीकर और मिठाई खाकर अपना व्रत खोलना चाहिए।

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