जानिए गुमनाम गेंदालाल को, जिनके हथकंडों के आगे अंग्रेज़ों की हथकड़ी भी हार जाती थी…

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आलेख : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 21 दिसंबर, 2019 (युवाPRESS)। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में वर्ष 1905 एक ऐसा निर्णायक वर्ष सिद्ध हुआ, जिसने अनेक क्रांतिकारियों को जन्म दिया। ब्रिटिश साम्राज्य ने 1905 में बंगाल के विभाजन का निर्णय किया और 200 वर्षों की अंग्रेज़ी दासता से पहले ही परेशान भारत में ब्रिटिश सरकार के इस निर्णय के विरुद्ध क्रांति का बिगुल फूँक दिया गया। बंगाल के विभाजन के विरुद्ध जो आंदोलन आरंभ हुआ, वह इतिहास में बंगभंग विरोधी आंदोलन के नाम से विख्यात है, जिसने सहस्त्रों युवाओं को क्रांतिकारी बनने पर विवश कर दिया। इनमें से कई क्रांतिकारियों के नाम आज भी इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों से अंकित हैं, परंतु कुछ क्रांतिकारी ऐसे भी हैं, जिन पर कदाचित इतिहासविदों की दृष्टि नहीं पड़ी और वे गुमनाम ही रह गए। आज हम आपको ऐसे ही एक क्रांतिकारी गुमनाम गेंदालाल से परिचित कराने जा रहे हैं।

हम जिस गेंदालाल की बात कर रहे हैं, वे जन्म से तो उत्तर प्रदेश के थे, परंतु बंगभंग आंदोलन में उन्होंने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था। इनका पूरा नाम है पंडित गेंदालाल दीक्षित और आज इनकी 99वीं जयंती है। 21 दिसंबर, 1920 को गेंदालाल ने गुमनामी के अंधेरों के बीच अपने नश्वर शरीर को त्यागा था। भारतीय स्वतंत्रता के लिए समर्पित एक महानक्रांतिकारी के रूप में गेंदालाल इस दुनिया से इस प्रकार उठ गए कि कोई यह जान भी न सका कि वे कौन थे ? पंडित गेंदालाल दीक्षित का जन्म 30 नवंबर, 1888 को आगरा में बाह तहसील के मई नामक गाँव में पिता पंडित भोलानाथ दीक्षित के घर हुआ था। गेंदालाल अभी 3 वर्ष के थे कि उनकी माता का निधन हो गया। माता की ममता के अभाव में गेंदालाल का बचपन निरंकुश अवस्था में बीता, परंतु बालक गेंदालाल के भीतर प्राकृतिक रूप से अप्रतिम वीरता का भाव प्रगाढ़ होता चला गया। गाँव के विद्यालय से हिन्दी में प्राथमिक शिक्षा पूर्ण कर इटावा से माध्यमिक व आगरा से मैट्रिक की शिक्षा पूर्ण करने के बाद गेंदालाल आगे पढ़ना चाहते थे, परंतु आर्थिक स्थिति स्वीकृति नहीं दे रही थी। इसीलिए गेंदालाल ने ओरैया जिले की डीएवी पाठशाला में अध्यापक के रूप में नौकरी कर ली।

अंग्रेज़ों से युद्ध के लिए डाकुओं को तैयार किया

वर्ष 1905 में जब अंग्रेज़ों ने बंगाल के विभाजन का दमनकारी निर्णय किया, तब गेंदालाल की आयु मात्र 17 वर्ष की थी। बंगभंग विरोधी आंदोलन ने गेंदालाल के मन को भी झकझोरा और उन्होंने उत्तर प्रदेश से स्वतंत्रता आंदोलन में छलांग लगा दी। गेंदालाल ने शिवाजी समिति के नाम से डाकुओं का संगठन बनाया और शिवाजी की भाँति अंग्रेज़ों के विरुद्ध छापामार युद्ध छेड़ दिया, परंतु दल के एक सदस्य दलपत सिंह अंग्रेज़ों का मुखबिर बन गया और गेंदालाल को ग़िरफ़्तार कर लिया गया। उन्हें पहले ग्वालियर लाया गया, फिर आगरा के क़िले में कैद करके सेना की निगरानी में रख दिया गया। तत्कालीन चर्चित क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल ने यहाँ गेंदालाल से मुलाक़ात की और पूरा वार्तालाप संस्कृत में किया, ताकि अंग्रेज पहरेदारों को समझ न आए। दोनों ने जो योजना बनाई, उसके अनुसार गेंदालाल ने पुलिस गुप्तचरों से कहा कि वे कुछ रहस्य की बातें बताना चाहते हैं। अधिकारियों की अनुमति लेकर पुलिस ने गेंदालाल को मैनपुरी जेल भेजा, जहाँ बिस्मिल की संस्था मातृवेदी के कुछ साथी नवयुवक पहले से ही बंद थे। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अप्रतिम योद्धा, महान क्रांतिकारी व उत्कट राष्ट्रभक्त गेंदालाल ने आम आदमी को ही नहीं, अपितु डाकुओं में भी राष्ट्रभक्ति की चिनगारी पेदा की। गेंदालाल को उत्तर भारत के क्रांतिकारियों का द्रोणाचार्य भी कहा जाता था। आंदोलन के दौरान ही मैनपुरी षड्यंत्र के आरोप में पुलिस ने गेंदालाल को ग़िरफ़्तार कर लिया। अदालत के आदेश पर गेंदालाल सहित कई क्रांतिकारियों को मैनपुरी की जेल में डाल दिया गया।

चमका देकर भागे, सरकारी गवाह भी ले उड़े

गेंदालाल दीक्षित मैनपुरी जेल से पुलिस को चमका देकर भाग निकले। इतना ही नहीं, उन्होंने एक सरकारी गवाह को भी अपने साथ भगा लिया। आश्चर्य की बात तो यह थी कि पुलिस के सारे हथकंडे भी उन्हें हथकड़ियों से बांधे रखने में सफल नहीं हुए। अंतत: कोर्ट ने उन्हें फ़रार घोषित किया और मुक़दमा चलाया। मुक़दमे के दौरान गेंदालाल ने फिर चाल चली। गेंदालाल ने कहा, ‘सरकारी गवाह से उनके दोस्ताना ताल्लुक़ात हैं, अत: यदि हम दोनों को एक ही बैरक में रख दिया जाए, तो कुछ और षड्यंत्रकारी गिरफ़्त में आ सकते हैं।’ जेलर ने उनकी बात पर विश्वास करके सीआईडी की देखरेख में गेंदालाल को सरकारी गवाहों के साथ हवालात भेज दिया। थानेदार ने एहतियात के तौर पर दीक्षित जी का एक हाथ और सरकारी गवाह का एक हाथ आपस में एक ही हथकड़ी में कस दिया ताकि रात में हवालात से भाग न सकें। किन्तु गेंदालाल जी ने वहाँ भी सबको धता बता दी और रातों-रात हवालात से भाग निकले। केवल इतना ही नहीं, अपने साथ बन्द उस सरकारी गवाह रामनारायण को भी उड़ा ले गये, जिसका हाथ उनके हाथ के साथ हथकड़ी में कसकर जकड़ दिया गया था। सारे अधिकारी, सीआईडी और पुलिस वाले उनकी इस हरकत को देख हाथ मलते रह गये।

परंतु न परिजनों और न देश ने दिया सम्मान

जेल से भागकर पंडित गेंदालाल दीक्षित अपने एक संबंधी के पास कोटा पहुंचे; पर वहां भी उनकी तलाश जारी थी। इसके बाद वे किसी तरह अपने घर पहुंचे; पर वहां घरवालों ने साफ कह दिया कि या तो आप यहां से चले जाएं, अन्यथा हम पुलिस को बुलाते हैं। अतः उन्हें वहां से भी भागना पड़ा। तब तक वे इतने कमजोर हो चुके थे कि दस कदम चलने मात्र से मूर्छित हो जाते थे। किसी तरह वे दिल्ली आकर पेट भरने के लिए एक प्याऊ पर पानी पिलाने की नौकरी करने लगे। कुछ समय बाद उन्होंने अपने एक संबंधी को पत्र लिखा, जो उनकी पत्नी को लेकर दिल्ली आ गये। तब तक उनकी दशा और बिगड़ चुकी थी। पत्नी यह देखकर रोने लगी। वह बोली कि ‘मेरा अब इस संसार में कौन है ?’ पंडित जी ने कहा, ‘आज देश की लाखों विधवाओं, अनाथों, किसानों और दासता की बेड़ी में जकड़ी भारत माता का कौन है? जो इन सबका मालिक है, वह तुम्हारी भी रक्षा करेगा।’ अहर्निश कार्य करने व एक क्षण को भी विश्राम न करने के कारण गेंदालाल दीक्षित को क्षय रोग हो गया। पैसे के अभाव में घरवालों ने उनको दिल्ली के एक सरकारी अस्पताल में भर्ती करा दिया, लेकिन बच नहीं सके और अस्पताल में ही 21 दिसम्बर, 1920 को दोपहर बाद दो बजे उनका देहांत हो गया। भारत की आज़ादी के लिए समर्पित एक महान क्रांतिकारी इस दुनिया से इस प्रकार उठ गया कि कोई यह जान नहीं सका की वह कौन था।

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