वो फाँसी से पहले कर रहे थे कसरत : जेलर से कहा, ‘अगले जन्म में इससे भी बलिष्ठ शरीर के साथ करेंगे अंग्रेजों से युद्ध’

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आलेख : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 17 दिसंबर, 2019 (युवाPRESS)। तनिक सोचिए यदि अदालत ने आपको फाँसी की सजा सुना दी हो, तो आप के दिलों-दिमाग और आँखों के सामने केवल और केवल फाँसी का फंदा और भयावह मौत के दृश्य के अतिरिक्त कोई और विचार आ सकता है ? अभी पिछले दिनों आपने ख़बरें भी पढ़ी होंगी कि निर्भया केस के दोषियों का फाँसी की सजा के भय से क्या हाल हुआ है ? उन्होंने खाना-पीना छोड़ दिया है और नींद भी हराम हो गई है, परंतु हम बात कर रहे नौ दशक पहले की, जब देश के युवाओं पर अंग्रेजी हुक़ूमत को उखाड़ फेंकने का ज़ुनून सवार था और अंग्रेजी हुक़ूमत ऐसे युवाओं को राजद्रोही घोषित कर एक-एक कर फाँसी के फंदे पर लटका रही थी, परंतु उन युवाओं में फाँसी का ख़ौफ नहीं हुआ करता था।

ऐसे ही एक युवा थे 26 वर्षीय राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी। अदालत ने लाहिड़ी को 6 अप्रैल, 1927 को ही फाँसी की सजा सुना दी थी और उन्हें फाँसी दी गई 17 दिसंबर, 1927 को। तनिक सोचिए एक साधारण व्यक्ति के लिए फाँसी की सजा के आदेश से फाँसी के फंदे पर झूलने के बीच 8 महीनों का लंबा काल कैसी मनोदशा में व्यतीत होता, परंतु लाहिड़ी की मनोदशा असाधारण थी। फाँसी की सजा मिलने के बाद लाहिड़ी को जिस जेल में रखा गया, वहाँ वे अत्यंत शांत, अविचलित और दृढ़ मनोबल के साथ अपनी नियमित दिनचर्या करते थे। अध्ययन और व्यायाम उनकी दिनचर्या के महत्वपूर्ण हिस्सा थे। फाँसी की सजा के बाद भी लाहिड़ी ने अपनी दिनचर्या में कोई परिवर्तन नहीं किया। एक दिन जेलर ने पूछा, ‘प्रार्थना तो ठीक है, परंतु अंतिम समय में इतनी भारी कसरत क्यों ?’ राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी ने बड़े ही गर्व और शौर्य के साथ सीना चौड़ा करते हुए उत्तर दिया, ‘व्यायाम मेरा नित्य नियम है। मृत्यु के भय से मैं नियम क्यों छोड़ दूँ ? दूसरा और महत्वपूर्ण कारण यह है कि हम पुनर्जन्म में विश्वास रखते हैं। व्यायाम इसलिए करता हूँ, ताकि अगले जन्म में भी बलिष्ठ शरीर मिले, जो ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध युद्ध में काम आ सके।’ अदालत ने लाहिड़ी को काकोरी कांड के लिए फाँसी की सजा सुनाई थी और दोषियों रामप्रसाद बिस्मिल, रोशन सिंह, अशफ़ाक उल्ला खाँ तथा राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी को एक साथ फाँसी देने का आदेश दिया था, परंतु भयभीत अंग्रेजी सरकार ने लाहिड़ी को निर्धारित तिथि से दो दिन पूर्व यानी 17 दिसंबर, 1927 को ही फाँसी के फंदे पर लटका दिया। लाहिड़ी ने हँसते-हँसते फाँसी का फंदा चूमने से पहले वंदे मातरम् की जोरदार हुंकार भर कर जयघोष करते हुए कहा, ‘मैं मर नहीं रहा हूँ, बल्कि स्वतंत्र भारत में पुनर्जन्म लेने जा रहा हूँ।’ क्रांतिकारी की इस ज़ुनून भरी हुंकार को सुन कर अंग्रेज़ ठिठक गये थे। उन्हें लग गया था कि इस धरती के सपूत उन्हें अब चैन से नहीं जीने देंगे।

कौन थे राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी ?

राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी का जन्म 23 जून, 1901 को तत्कालीन अविभाजित बंगाल के पाबना जिले के भड़गा ग्राम में पिता क्षिति मोहन शर्मा व माता बसंत कुमारी के घर हुआ था। 1909 में परिवार वाराणसी चला गया, जिससे लाहिड़ी की शिक्षा-दीक्षा वाराणसी में ही हुई। लाहिड़ी के जन्म के समय पिता क्षिति व ताऊ बंगाल में चल रहे ब्रिटिश शासन विरोधी आंदोलन के आरोप में जेल में थे। जब काकोरी कांड हुआ, तब लाहिड़ी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में इतिहास विषय में एमए प्रथम वर्ष की पढ़ाई कर रहे थे। इसी दौरान वे क्रांतिकारी शचीद्रनाथ सान्याल के सम्पर्क में आए। सान्याल बंगाल के क्रांतिकारी युगांतर दल से जुड़े हुए थे। एक और क्रांतिकारी अनुशीलन दल में भी लाहिड़ी काम करने लगे। बाद में लाहिड़ी ने बम बनाने का प्रशिक्षण लिया और बंगाल के क्रांतिकारियों से संपर्क के लिए कोलकाता पहुँचे। इसी दौरान वे दक्षिणेश्वर बम फैक्ट्री कांड में पकड़े गए और उन्हें 10 वर्ष की सजा हुई। इस बीच धन की किल्लत से निपटने के लिए बिस्मिल के नेतृत्व में लखनऊ के काकोरी रेलवे स्टेशन से रवाना हुई आठ डाउन सहारनपुर-लखनऊ पैसेन्जर ट्रेन को लूटने की योजना बनाई गई। 9 अगस्त, 1925 को इस कांड को अंजाम दिया गया, जिसके चलते अंग्रेजी हुक़ूमत ने हिन्दुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन के कुल 40 क्रांतिकारियों पर सम्राट के विरुद्ध सशस्त्र युद्ध छेड़ने, सरकारी धन लूटने और यात्रियों की हत्या का मुकदमा चलाया। इस मुकदमे में लाहिड़ी, बिस्मिल, अशफ़ाक़ और ठाकुर रोशन सिंह को मृत्यु दंड की सजा सुनाई गई। अदालत का आदेश तो सभी को एक साथ फाँसी पर चढ़ाने का था, परंतु अंग्रेजी हुक़ूमत भयभीत थी कि ऐसा करने से क्रांतिकारी और भड़क जाएँगे। इसीलिए सजा के बाद सभी क्रांतिकारियों को अलग-अलग जेल भेज दिया गया और 17 दिसंबर, 1927 को लाहिड़ी को गोंडा कारागार में फाँसी पर लटका दिया गया।

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