जम्मू-कश्मीर : SNG ने किया ‘बर्बाद’, MSD कर रहे ‘आबाद’, जानिए आँखें खोल देने वाला इतिहास !

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* काश ! नेहरू ने 1948 में न मानी होती शेख की सलाह

* काश ! इंदिरा ने 1972 में न लौटाई होती भारतीय भूमि

* परंतु अब हुआ ‘खंडित’ जम्मू-कश्मीर का वास्तविक विलय

* परंतु अब होगा ‘अखंड जम्मू-कश्मीर’ अगला पड़ाव

विशेष टिप्पणी : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 9 अगस्त, 2019 (युवाPRESS)। भारत का मुकुट जम्मू-कश्मीर पिछले दो हफ्तों से देश और विदेश में चर्चा तथा खास कर पड़ोसी पाकिस्तान में बौखलाहट का कारण बना हुआ है। 72 वर्षों बाद जम्मू-कश्मीर धारा 370 से मुक्त हो गया है और पूरा देश इस बात का उत्सव मना रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के गुरुवार रात प्रसारित राष्ट्र के नाम संदेश के बाद कश्मीर में तथाकथित संभावित उबाल जैसा कोई वातावरण नहीं है और कश्मीर में हालात सामान्य हो रहे हैं।

विरासत में मिले ‘खंडित’ जम्मू-कश्मीर का भारत में ‘वास्तविक विलय’ कराने का श्रेय जिस त्रिपुटी को दिया जा रहा है, उसे आज-कल MSD के संक्षिप्त नाम से संबोधित किया जा रहा है। एमएसडी वैसे अब तक भारतीय क्रिकेट टीम (TEAM INDIA) के पूर्व कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी के लिए प्रचलित था और है भी, परंतु पिछले एक हफ्ते के घटनाक्रमों ने सोशल मीडिया सहित पूरे देश में एक नए ही एमएसडी को चर्चा में ला खड़ा किया है, जो भारत के कश्मीर से धारा 370 हटाने, अलग केन्द्र शासित जम्मू-कश्मीर व अलग केन्द्र शासित लद्दाख के शिल्पकारों के रूप में देखे जा रहे हैं।

MSD, जो नए J&K व लद्दाख के शिल्पकार बने

चलिए, अधिक रहस्य न बनाए रखते हुए बता ही देते हैं कि ये एमएसडी क्या और कौन हैं ? एमएसडी अर्थात् मोदी, शाह और डोभाल। इन तीनों के उपनामों को मिला कर एमएसडी शब्द बना है। नए जम्मू-कश्मीर और नए लद्दाख के उदय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजित डोभाल को आज पूरा देश सलाम और प्रणाम कर रहा है। इस त्रिपुटी ने वह काम कर दिखाया है, जो स्वतंत्र भारत के 72 वर्षों के इतिहास में कोई राजनीतिक दल या उसकी सरकार नहीं कर सकी। जम्मू-कश्मीर में लागू की गई धारा 370 को हटा कर मोदी-शाह-डोभाल की त्रिपुटी ने लौह पुरुष तथा प्रधान उप प्रधानमंत्री व गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल और संविधान निर्माता व प्रथम विधि मंत्री डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर के दिल में दबी रह गई विरोध की अधुरी कसक पूरी की, वहीं धारा 370 के विरुद्ध खुल कर आवाज़ उठाने वाले डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी व सुषमा स्वराज जैसे महापुरुषों के सपने को साकार भी किया है। यह इस त्रिपुटी की ही रणनीति थी, जिसके अंतर्गत सबसे पहले अजित डोभाल ने जम्मू-कश्मीर का दौरा किया और उनके लौटते ही केन्द्र सरकार ने 38 हजार अतिरिक्त जवानों को जम्मू-कश्मीर में तैनात कर दिया। यह एमएसडी की ही रणनीति थी कि जगत जमादारी करने वाले अमेरिका से लेकर हमेशा भारत की तरफ कान किए रखने वाले पाकिस्तान तक को भनक नहीं लगी कि 5 अगस्त, 2019 को भारत की संसद में किसी ऐतिहासिक निर्णय की घोषणा होने वाली है। यह भी इस एमसडी की ही रणनीति थी कि कश्मीर पर ऐतिहासिक जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक व धारा 370 समाप्ति का संकल्प पहले राज्यसभा में पारित कराया गया। यह त्रिपुटी विशेषकर मोदी-शाह की जोड़ी अच्छी तरह जानती थी कि राज्यसभा में बहुमत नहीं है, परंतु बात जब धारा 370 हटाने जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे की होगी, तो कई धुर-विरोधी राजनीतिक दल भी सरकार का साथ देंगे। हुआ भी यही। राज्यसभा से विधेयक और संकल्प पारित कराने में सफलता मिलने के बाद लोकसभा में यह निर्विघ्नता से पारित हो गया, क्योंकि वहाँ सरकार के पास पूर्ण बहुमत था। इस एमएसडी की रणनीति धारा तक सीमित नहीं थी, अपितु इसका लक्ष्य तो धरा है। गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में खुलेआम पूरी दुनिया के सामने पाकिस्तान और प्रधानमंत्री इमरान खान तथा चीन और राष्ट्रपति शी जिनपिंग को यह कह कर ललकारा, ‘जब मैं जम्मू-कश्मीर की बात करता हूँ, तो उसमें पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) और चीन कश्मीर (COK) अधिकृत अक्साई चिन आ जाता है।’ शाह का स्पष्ट संकेत है कि एमएसडी का अगला पड़ाव पीओके और फिर अक्साई चिन होगा। यह महत्वपूर्ण पड़ाव जम्मू-कश्मीर को पुन: 1947 से पूर्व वाला अखंड जम्मू-कश्मीर बनाएगा।

SNG, जो भारत को खंडित कश्मीर दिलाने के भागीदार बने ?

अब आपको एसएनजी के बारे में भी बता देते हैं। यहाँ एनएसजी शब्द का पूर्ण स्वरूप है शेख, नेहरू और गांधी। एक बात पहले ही स्पष्ट किए देते हैं कि यहाँ गांधी से तात्पर्य राष्ट्रपिता महात्मा गांधी तनिक भी नहीं हैं। यहाँ जिस एनएसजी त्रिपुटी की बात की जा रही है, वह हैं जम्मू-कश्मीर के प्रथम प्रधानमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) के संस्थापक शेख अब्दुल्ला, भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी। वैसे इन तीनों ने मिल कर जम्मू-कश्मीर को बर्बाद नहीं किया। एनएसजी का कालखंड दो भागों में बँटा हुआ है। पहले भाग में नेहरू और शेख हैं, जबकि दूसरे भाग में इंदिरा। बात 1947 की है, जब भारत को स्वतंत्र हुए दो महीने ही हुए थे। एक तरफ सरदार पटेल देश के 562 रजवाड़ों को भारत में मिलाने की बड़ी कवायद में जुटे हुए थे, वहीं नेहरू की ज़िद के कारण जम्मू-कश्मीर के विलय का जिम्मा सरदार पटेल को नहीं सौंपा गया था। जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन महाराजा हरि सिंह असमंजस में थे, क्योंकि वे न भारत में आना चाहते थे, न पाकिस्तान में जाना। मौके का फायदा उठा कर 22 अक्टूबर, 1947 को पाकिस्तानी सेना ने कबाइलियों के भेष में कश्मीर पर हमला कर दिया। घबराए हरि सिंह को अचानक होश आया और उन्होंने नेहरू से सैन्य मदद मांगी। कश्मीर को लेकर नेहरू को इतना ग़ुमान था कि वे इस समस्या को मानो चुटकी में सुलझा लेंगे। नेहरू ने हरि सिंह को मदद भेजने में चार दिन की देरी लगाई। जब हरि सिंह ने जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए, तब जाकर नेहरू ने कश्मीर में भारतीय सेना भेजी। तब तक कश्मीर में दुश्मन काफी भीतर तक घुस आए थे। इसके बावजूद भारतीय जवानों ने जम कर युद्ध लड़ा और जून-1948 में कबाइलियों और पाकिस्तानी सैनिकों को काफी हद तक पीछे खदेड़ दिया, परंतु भारतीय जवान अभी पूरे कश्मीर पर कब्जा कर पाते, उससे पहले ही शेर-ए-कश्मीर कहे जाने वाले, कश्मीरी अवाम की आवाज़ कहे जाने वाले शेख अब्दुल्ला अचानक विलन के रूप में उभरे। नि:संदेह शेख पाकिस्तान परस्त नहीं थे, परंतु उन्होंने न जाने क्यों नेहरू पर दबाव डाला और नेहरू ने 1 जनवरी, 1949 को युद्ध विराम की एकतरफा घोषणा कर दी। जब नेहरू ने यह घोषणा की, तब अखंड जम्मू-कश्मी के एक तिहाई हिस्से पर पाकिस्तानी सेना का कब्जा था। बस यहीं से अघोषित नियंत्रण रेखा (LOC) अस्तित्व में आई। नेहरू की इस भूल पर 1972 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने एक और मुहर लगाई और एलओसी हमेशा के लिए भारत के लिए कलंक बन गई। इंदिरा ने वैसे 1971 के युद्ध में सब कुछ बढ़िया किया। पाकिस्तान को बुरी तरह परास्त किया। अलग बांग्लादेश की स्थापना की, परंतु इंदिरा ने ग़लती 2 जुलाई, 1972 को शिमला शिखर वार्ता में कर दी। युद्ध में बुरी तरह मात खाने के बाद पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़ीक़ार अली भुट्टो अपनी बेटी बनेज़ीर भुट्टो के साथ शिखर वार्ता के 28 जून के लिए शिमला आए, परंतु पाकिस्तान की हठधर्मिता के कारण चार दिन तक कोई बात नहीं बनी। अचानक 2 जुलाई को पाकिस्तान शिमला समझौता करने पर सहमत हो गया। इस समझौते को भले ही इंदिरा की कूटनीतिक जीत बताया जाता हो, परंतु इस समझौते के चलते भारत ने पाया कम और खोया अधिक। समझौते के तहत भारत को युद्ध में बंदी बनाए गए सभी पाकिस्तानी सैनिकों को रिहा कर दिया और युद्ध में जीती गई 5600 वर्ग मील ज़मीन लौटानी पड़ी। इतना ही नहीं, समझौते के बावजूद पाकिस्तान ने भारत के 54 युद्धबंदियों को रिहा नहीं किया, जो आज भी स्वदेश लौटने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। भारत को इस शिमला समझौते से केवल इतना आश्वासन मिला कि भविष्य में कश्मीर मुद्दे पर कोई तीसरा पक्ष मध्यस्थता नहीं करेगा। भारत और पाकिस्तान के बीच ही द्विपक्षीय बातचीत होगी। इस प्रकार इस एसएनजी यानी शेख-नेहरू ने 1948 में भारत की पूर्ण कश्मीर विजय को रोक दिया, वहीं गांधी ने 1971 का युद्ध जीत कर भी 1972 में शिमला समझौता कर बहुत कुछ लुटा दिया और जम्मू-कश्मीर के मानचित्र पर आज पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) और अक्साई चिन (चीन अधिकृत कश्मीर-COK) लिखना पड़ता है।

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