1947 से 2019 : राजनीतिक उठापटक और अस्थिरता का अखाड़ा बन चुका है कर्नाटक

Written by

* 19 में से 16 मुख्यमंत्रियों ने चुनाव से लेकर चुनाव तक नहीं किया शासन

* डी. देवराज उर्स, एस. एम. कृष्णा और सिद्धारमैया ही पूरा कर सके कार्यकाल

* एक चुनाव : 3-3 मुख्यमंत्रियों के अनुपात का अनूठा इतिहास

* सबसे कम 6 दिन के शासन का रिकॉर्ड बनाने वाले येदि लाएँगे स्थिरता ?

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 26 जुलाई, 2019 (युवाPRESS)। पिछले एक महीने से देश की राजनीति में चर्चा के केन्द्र में रहे कर्नाटक राज्य की स्थापना तो 1 नवम्बर, 1956 को हुई, परंतु स्वतंत्र भारत में इसका इतिहास 25 अक्टूबर, 1947 को बने मैसूर राज्य से आरंभ होता है। वर्तमान कर्नाटक का मैसूर से आरंभ हुआ 72 वर्षों का राजनीतिक इतिहास राजनीतिक उठापटकों और अस्थिरताओं से सना हुआ है। इस राज्य ने अब तक 19 मुख्यमंत्री देखे हैं, जिनमें से 16 मुख्यमंत्री चुनाव से लेकर चुनाव तक सत्ता पर नहीं रह सके और राजनीतिक उठापटक के चलते बीच में ही उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा। केवल डी. देवराज उर्स, एस. एम. कृष्णा और सिद्धारमैया ही ऐसे 3 मुख्यमंत्री रहे, जिन्होंने चुनावी जीत के बाद अगले चुनाव तक पद पर बने रहने में सफलता हासिल की।

येदियुरप्पा चौथी बार बने मुख्यमंत्री

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी-BJP) के वरिष्ठ नेता, तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके और 14 महीने पहले ही सबसे कम 6 दिनों के शासन का अनोखा रिकॉर्ड बनाने वाले बी. एस. येदियुरप्पा फिर चौथी बार मुख्यमंत्री बने हैं। येदियुरप्पा का ट्रैक रिकॉर्ड भी बहुत अच्छा नहीं है। वे केवल एक बार चुनावी बहुमत के साथ सत्ता में आए थे, परंतु अगले चुनाव तक सीएम नहीं रह सके और डी. देवराज उर्स तथा एस. एम. कृष्णा के रिकॉर्ड की बराबरी करने में विफल रहे थे। दूसरी तरफ कांग्रेस के सिद्धारमैया कार्यकाल पूरा करने वाले तीसरे मुख्यमंत्री सिद्ध हुए। येदियुरप्पा ने भले ही आज मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले ली हो, परंतु इस बार भी वे पाँच वर्ष का कार्यकाल पूरा नहीं कर सकेंगे, क्योंकि वर्तमान विधानसभा का गठन दिसम्बर-2018 में हुआ था और येदियुरप्पा राजनीतिक अस्थिरता का फायदा उठा कर मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं। ऐसे में उनके लिए 4 साल 5 महीने ही सीएम बने रह पाना संभव है और वो भी यदि 31 जुलाई को बहुमत सिद्ध कर सके तो। यदि बहुमत सिद्ध कर भी लिया, तो भी दिसम्बर-2023 तक सरकार का अस्तित्व बनाए रखना येदियुरप्पा के लिए बड़ी और कड़ी चुनौती होगा।

मैसूर से ही अस्थिरता का आरंभ

मैसूर राज्य का मानचित्र।

आइए अब कर्नाटक के राजनीतिक इतिहास की ओर चलते हैं, जो 72 वर्षों से राजनीतिक उठापटक और अस्थिरता का अखाड़ा बना हुआ है। स्वतंत्रता के बाद 25 अक्टूबर, 1947 को मैसूर राज्य की स्थापना हुई, जिसके प्रथम चयनित मुख्यमंत्री थे कांग्रेस नेता के. चेंगलराया रेड्डी। मैसूर विधानसभा के लिए प्रथम चुनाव मार्च-1952 में हुए, जिसमें कांग्रेस की जीत हुई और के. हनुमंथैया मुख्यमंत्री बने। 30 मार्च, 1952 को सीएम बने हनुमंथैया ने 19 अगस्त, 1956 को त्यागपत्र दे दिया और कडिडल मंजियप्पा नए मुख्यमंत्री बने। इसके बाद राज्य पुनर्गठन के चलते नेतृत्व परिवर्तन हुआ और मंजियप्पा ने 73 दिन बाद 31 अक्टूबर, 1956 को त्यागपत्र दे दिया और एस. निजलिंगप्पा नए मुख्यमंत्री बने। 1957 में हुए दूसरे विधानसभा चुनाव के बाद भी कांग्रेस ने निजलिंगप्पा को ही कमान सौंपी, परंतु 16 मई, 1958 को उन्होंने त्यागपत्र दे दिया और बी. डी. जट्टी नए मुख्यमंत्री बने। 1962 में तीसरे विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत हुई और उसने एस. आर. कंठी को नया मुख्यमंत्री बनाया। 14 मार्च, 1962 को सीएम बनने वाले कंठी को 20 जून, 1962 को त्यागपत्र देना पड़ा और निजलिंगप्पा पुन: मुख्यमंत्री बनए गए। 1967 के चौथे चुनाव में कांग्रेस जीती और निजलिंगप्पा का नेतृत्व बरकरार रखा गया, परंतु 28 मई, 1968 को उन्हें त्यागपत्र दे देना पड़ा और उनके स्थान पर वीरेन्द्र पाटिल नए मुख्यमंत्री बने। पाटिल भी राजनीतिक उठापटक का शिकार हुए और उन्हें 18 मार्च, 1971 को त्यागपत्र दे देना पड़ा। इसके साथ ही विधानसभा भंग कर दी गई और मैसूर राज्य में पहली बार 19 मार्च, 1971 को राष्ट्रपति शासन लागू हुआ।

कर्नाटक के पहले मुख्यमंत्री ने रचा इतिहास

डी. देवराज उर्स।

नवम्बर-1956 को अस्तित्व में आए कर्नाटक राज्य में 1972 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने जीत हासिल की। 20 मार्च, 1972 को डी. देवराज उर्स मुख्यमंत्री बने। उन्होंने 5 वर्ष का कार्यकाल पूरा किया। 31 दिसम्बर, 1977 को विधानसभा भंग होने के साथ ही उर्स का कार्यकाल समाप्त हो गया और कर्नाटक राज्य में पहली बार राष्ट्रपति शासन लागू हुआ। विधानसभा चुनाव 1978 में कांग्रेस को जीत मिली और उर्स पुन: सीएम बने, परंतु इस बार वे कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। उन्हें 7 जनवरी, 1980 को त्यागपत्र देना पड़ा। कांग्रेस ने नेतृत्व परिवर्तन करते हुए आर. गुंडु राव को सीएम बनाया। 12 जनवरी, 1980 को मुख्यमत्री बने राव को विधानसभा चुनाव 1983 में कांग्रेस की हार के चलते 6 जनवरी, 1983 को त्यागपत्र देना पड़ा।

पहली बार ग़ैर कांग्रेसी सरकार का गठन

रामकृष्ण हेगडे

कर्नाटक में विधानसभा चुनाव 1983 में पहली बार जनता पार्टी को जीत हासिल हुई और रामकृष्ण हेगडे के नेतृत्व में पहली बार ग़ैर कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ, परंतु हेगडे को 29 दिसम्बर, 1984 को पद से हटना पड़ा। तीन माह बाद विधानसभा चुनाव 1985 में पुन: जनता पार्टी की जीत हुई और हेगडे ने 8 मार्च को फिर एक बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इसी बीच जनता पार्टी में राजनीतिक उठापटक के चलते हेगडे को 10 अगस्त, 1988 को त्यागपत्र देना पड़ा और एस. आर. बोम्मई ने 13 अगस्त, 1988 को राज्य की कमान संभाली। वे 21 अप्रैल, 1989 तक सीएम रहे। इसके बाद विधानसभा भंग हुई और राष्ट्रपति शासन लागू हो गया।

कांग्रेस की सत्ता में वापसी

एस. बंगारप्पा।

विधानसभा चुनाव 1989 में कांग्रेस ने सत्ता में वापसी की और वीरेन्द्र पाटिल फिर एक बार 30 नवम्बर को मुख्यमंत्री बनाए गए, परंतु वे 10 अक्टूबर, 1990 तक ही इस पद पर रह सके। कांग्रेस पार्टी की अंदरूनी कलह के चलते राज्य में फिर एक बार राष्ट्रपति शासन लागू हुआ। 7 दिन बाद 17 अक्टूबर, 1990 को एस. बंगारप्पा को कांग्रेस ने नया मुख्यमंत्री बनाया। कांग्रेस ने 19 नवम्बर, 1992 को बंगारप्पा को हटा कर एम. वीरप्पा मोईली को मुख्यमंत्री बनाया।

जनता दल का हुआ उदय

एच. डी. देवेगौडा।

राष्ट्रीय स्तर पर जनता दल के उदय के साथ कर्नाटक में भी विधानसभा चुनाव 1994 में जनता दल को बहुमत मिला और एच. डी. देवेगौडा पहली बार 11 दिसम्बर, 1994 को मुख्यमंत्री बने, परंतु देवेगौडा भी राजनीतिक उठापटक का शिकार हुए और 31 मई, 1996 को उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा। जनता दल ने देवेगौडा के स्थान पर जे. एच. पटेल को मुख्यमंत्री बनाया। पटेल 7 अक्टूबर, 1999 तक ही मुख्यमंत्री रह सके, क्योंकि विधानसभा चुनाव 1999 में जनता दल को पराजय का सामना करना पड़ा।

एस. एम. कृष्णा ने की डी. देवराज उर्स की बराबरी

एस. एम. कृष्णा।

विधानसभा चुनाव 1999 में कांग्रेस पुन: सत्ता में लौटी और 11 अक्टूबर को एस. एम. कृष्णा मुख्यमंत्री बने। कृष्णा अगले चुनाव 2004 तक मुख्यमंत्री के रूप में सफलतापूर्वक बने रहे और उन्होंने डी. देवराज उर्स के चुनाव से चुनाव तक मुख्यमंत्री बने रहने के रिकॉर्ड की बराबरी की। विधानसभा चुनाव 2004 में जनता ने खंडित जनादेश दिया। इस चुनाव में पूर्ववर्ती जनता दल अब जनता दल सेकुलर (जेडीएस-JDS) बन चुका था। भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी, परंतु कांग्रेस-जेडीएस ने मिल कर सरकार बनाई और कांग्रेस के धरम सिंह 28 मई, 2004 को मुख्यमंत्री बने। 2 फरवरी, 2006 को उन्होंने त्यागपत्र दिया और जेडीएस के एच. डी. कुमारस्वामी ने अगले ही दिन पहली बार सीएम पद की शपथ ली। राजनीतिक अस्थिरता का फिर उदय हुआ और कुमारस्वामी को 8 अक्टूबर, 2007 को त्यागपत्र देना पड़ा। 35 दिनों तक राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू रहा। 12 नवम्बर, 2007 को बी. एस. येदियुरप्पा पहली बार मुख्यमंत्री बने, परंतु 7 दिन ही सरकार चला सके। बहुमत सिद्ध न कर पाने के कारण 19 नवम्बर, 2007 को उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा। इसके साथ ही कर्नाटक विधानसभा भंग हो गई और राष्ट्रपति शासन लागू हो गया।

भाजपा का जोरदार उदय

बी. एस. येदियुरप्पा।

विधानसभा चुनाव 2008 में कर्नाटक में भाजपा का जोरदार उदय हुआ और उसे 110 सीटें हासिल हुईं। येदियुरप्पा 30 मई, 2008 को दोबारा मुख्यमंत्री बने। उन्होंने इस बार बहुमत भी सिद्ध कर लिया, परंतु 4 अगस्त, 2011 को विवादों के चलते उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा और 5 अगस्त को डी. वी. सदानंद गौडा मुख्यमंत्री बने। उन्हें भी भाजपा ने 11 जुलाई, 2012 को हटा कर जगदीश शेट्टर को कमान सौंपी।

सिद्धारमैया ने सिद्ध की राजनीतिक कुशलता

सिद्धारमैया।

राजनीतिक अस्थिरता से तंग आ चुकी जनता ने विधानसभा चुनाव 2013 में कांग्रेस को फिर एक बार स्पष्ट बहुमत दिया और 13 मई को सिद्धरमैया पहली बार मुख्यमंत्री बने। सिद्धरमैया ने चुनाव से चुनाव तक कार्यकाल पूरा किया और डी. देवराज उर्स तथा एस. एम. कृष्णा के रिकॉर्ड की बराबरी की।

खंडित जनादेश से फिर नेतृत्व परिवर्तन

एच. डी. कुमारस्वामी।

विधानसभा चुनाव 2018 में जनादेश कांग्रेस और सिद्धारमैया सरकार के विरुद्ध आया। खंडित जनादेश में भाजपा 105 सीटों के साथ फिर सबसे बड़ी पार्टी बनी और येदियुरप्पा ने 17 मई, 2018 को तीसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, परंतु वे बहुमत नहीं सिद्ध कर सके और 6 दिनों के बाद 23 मई को उन्हें त्यागपत्र दे देना पड़ा। फिर कांग्रेस-जेडीएस ने मिल कर सरकार बनाई। कुमारस्वामी दूसरी बार 23 मई, 2018 को मुख्यमंत्री बने, परंतु कांग्रेस-जेडीएस विधायकों की नाराजगी के चलते 23 जुलाई, 2019 को बहुमत सिद्ध न कर पाने के बाद कुमार स्वामी को त्यागपत्र दे देना पड़ा। अब येदियुरप्पा फिर एक बार खंडित जनादेश के साथ सत्ता पर आए हैं। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि वे 31 जुलाई को कैसे बहुमत सिद्ध करते हैं और किस तरह दिसम्बर-2023 तक सरकार चलाते हैं।

Article Categories:
News

Comments are closed.

Shares