सावधान इंडिया ! अलगाववाद का अजगर निगल न जाए नागालैण्ड !

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दूसरा कश्मीर न बन जाए नागालैण्ड

अलगाववाद को रोकने के लिये इनर लाइन परमिट रद्द होना जरूरी

नागालैण्ड को देश की मुख्य धारा में लाना आवश्यक

भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय ने उठाया मुद्दा

लोकसभा में भी गूँजा नागालैण्ड में भारतीयों के लिये आईएलपी का मुद्दा

रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 25 जुलाई 2019 (युवाPRESS)। आपको यह तो पता है कि भारत का उत्तरी राज्य जम्मू-कश्मीर ऐसा राज्य है जहाँ भारतीय धारा 370 और अनुच्छेद 35ए के कारण जमीन-जायदाद नहीं खरीद सकते, परंतु बहुत कम लोगों को ही यह पता है कि देश में एक और राज्य ऐसा है, जहाँ हम हिंदुस्तानियों को ही जाने के लिये परमिट लेनी पड़ती है। इस राज्य में भी अलगाववाद तेजी से फल-फूल रहा है और यदि सरकार समय पर नहीं जागी तो आशंका है कि कहीं यह राज्य भी दूसरा कश्मीर न बन जाए।

नागालैंड में लागू है इनर लाइन परमिट (ILP)

नागालैंड की स्थिति को देखें तो ऐसा कह सकते हैं कि जम्मू-कश्मीर में हालात फिर भी ठीक हैं। क्योंकि जम्मू-कश्मीर में जाने के लिये कम से कम किसी भारतीय को वहाँ की सरकार से कोई अनुमति तो नहीं लेनी पड़ती है, परंतु नागालैंड में हालात यह हैं कि अगर किसी भारतीय को अपने इस राज्य में घूमने जाना है तो वहाँ की राज्य सरकार से इनर लाइन परमिट लेनी पड़ती है। बिना परमिट के वहाँ कोई भारतीय घुस ही नहीं सकता। केवल इस राज्य की स्थानीय जनता को ही पूरे राज्य में कहीं भी आने-जाने की अनुमति है, परंतु अन्य राज्यों के नागरिकों के लिये ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। यह इनर लाइन परमिट एक प्रकार का आंतरिक वीजा जैसा ही दस्तावेज होता है।

जम्मू-कश्मीर में भी लागू था इनर लाइन परमिट सिस्टम

पहले जम्मू-कश्मीर में भी यह इनर लाइन परमिट का नियम लागू था, परंतु श्यामा प्रसाद मुखर्जी के आंदोलन के बाद वहाँ परमिट सिस्टम समाप्त कर दिया गया, परंतु नागालैंड में यह नियम अभ भी जारी है। इसलिये अब यह मुद्दा भी राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनने लगा है। हाल ही में भाजपा के एक नेता अश्विनी उपाध्याय ने यह मामला उठाया और इस मामले को लेकर उन्होंने 2 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। अश्विनी उपाध्याय ने याचिका में कहा कि आईएलपी व्यवस्था अपने ही देश में वीजा लेने की तरह है। यह नियम संविधान से भारतीय नागरिकों को मिले अनुच्छेद 14 (समानता), 15 (भेदभाव की मनाही), 19 (स्वतंत्रता) और 21 (जीवन) के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। उपाध्याय ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि चूँकि नागालैंड की आदिवासी जनता का रहन-सहन, उनकी कला-संस्कृति, बोलचाल आदि औरों से अलग है, इसलिये उनके संरक्षण के लिये सरकार ने आज़ादी के बाद भी अंग्रेजों की इनर लाइन परमिट प्रथा को इस राज्य में जारी रखा था, परंतु अब यहाँ परिस्थितियों ने जिस तेजी से करवट बदली है, उसके बाद यह नियम इस राज्य के लिये व्यर्थ हो चुका है, अनुपयोगी हो गया है। क्योंकि आदिवासी बहुल इस राज्य में 90 प्रतिशत आबादी ईसाई हो चुकी है। वहाँ की सरकार की आधिकारिक भाषा अंग्रेजी हो चुकी है। हर गाँव में चर्च स्थापित हो गये हैं। वहाँ की आदिवासी प्रजा अपने पुराने रीति-रिवाजों के स्थान पर चर्च में जाकर ईसाई रीति-रिवाज से शादी कर रहे हैं। ऐसे में नागाओं के संरक्षण के लिये लागू किये गये इस नियम का कोई औचित्य ही नहीं रह गया है। अश्विनी उपाध्याय ने अपनी याचिका में यह भी कहा कि नागालैंड में स्थानीय नेता अलगाववाद को बढ़ावा दे रहे हैं और कश्मीर के अलगाववादियों की तरह ही वह भी वहाँ अपनी अलगाववाद की दुकानें चलाने के लिये स्थानीय जनता का बाहरी प्रजा से संपर्क नहीं होने देना चाहते हैं। वह इनर लाइन परमिट के जरिये नागालैंड को देश और दुनिया से काटने के प्रयास कर रहे हैं। अब वहाँ की सरकार मैदानी क्षेत्र दीमापुर में भी इनर लाइन परमिट लागू करना चाहती है। हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल उपाध्याय की इस याचिका को सुनवाई के लिये स्वीकार नहीं किया है और यह कहकर खारिज कर दिया कि अभी वह इस याचिका पर सुनवाई के मूड में नहीं है।

संसद में भी उठा नागालैंड का मुद्दा

23 जुलाई को संसद में भी दो सांसदों ने नागालैण्ड का मुद्दा उठाया। लोकसभा में उठाए गये इस मुद्दे पर सरकार ने जवाब दिया कि भारतीय नागरिकों को अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और दीमापुर को छोड़कर नागालैंड में घूमने-फिरने जाना हो तो इनर लाइन परमिट लेनी पड़ती है। राज्य सरकार ने दीमापुर में भी इनर लाइन परमिट सिस्टम लागू करने की केन्द्र सरकार से अनुमति मांगी है, परंतु केन्द्र उसके प्रस्ताव पर अभी विचार विमर्श कर रही है। सरकार ने अभी कोई फैसला नहीं लिया है।

19वीं सदी में अंग्रेजों ने लागू किया था आईएलपी सिस्टम

जब भारत में अंग्रेजी शासन था, तब 19वीं सदी में यानी बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेग्युलेशन-1873 के तहत अंग्रेजों ने आईएलपी सिस्टम लागू किया था। उस समय नागालैण्ड क्षेत्र की पहाड़ियों में जड़ी-बूटियों और प्राकृतिक औषधियों का प्रचूर भण्डार था, जिसे ब्रिटेन भेजा जाता था। औषधियों पर किसी की नज़र न पड़े, इसलिये अंग्रेजों ने नागालैण्ड के हिस्से में इनर लाइन परमिट सिस्टम शुरू किया था। ताकि बाहरी लोग इस इलाके में प्रवेश न कर सकें। आजादी के बाद भारत सरकार ने नागालैण्ड की विशिष्ट कला-संस्कृति के संरक्षण के लिहाज से इस सिस्टम को लागू रखा । हालाँकि बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेग्युलेशन 1873 के अनुसार ही यह सिस्टम एक सीमित अवधि के लिये किसी संरक्षित या प्रतिबंधित क्षेत्र में दाखिल होने के लिये अनुमति देता है।

1963 में भारत का 16वाँ राज्य बना था नागालैण्ड

उल्लेखनीय है कि नागालैण्ड का अधिकाँश हिस्सा पहाड़ी है। मात्र दीमापुर ही मैदानी क्षेत्र है, जहाँ रेलवे और विमान सेवाएँ उपलब्ध हैं। पहले दीमापुर असम का हिस्सा था, परंतु नागालैण्ड को देश के परिवहन से जोड़ने के लिये इस मैदानी क्षेत्र दीमापुर को नागालैण्ड को दे दिया गया। यहाँ कोलकाता से दीमापुर के लिये सप्ताह में तीन दिन इंडियन एयरलाइंस की उड़ानें हैं। 19वीं सदी में यह क्षेत्र ब्रिटिश शासन के अधीन आया था। आज़ादी के बाद 1957 में यह क्षेत्र केन्द्रशासित प्रदेश बना और असम के राज्यपाल इसका प्रशासन देखते थे। पहले इसका नाम नगा हिल्स तुएनसांग था। 1961 में इसका नाम बदलकर नागालैण्ड रखा गया और 1 दिसंबर 1963 को यह नागालैण्ड भारतीय संघ का 16वाँ राज्य बना।

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