झाँसी की रानी के बारे में तो आप जानते होंगे, पर ‘सहारनपुर की सिंहनी’ के बारे में जानते हैं, जिनकी वीरता के आगे ताबूतबंद हो गया था तैमूर ?

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रिपोर्ट : विनीत दुबे

वर्तमान मैकाले शिक्षा पद्धति ने भारत की उन्नत संस्कृति और इतिहास को छिन्न-भिन्न कर दिया है। परिणाम स्वरूप भारत की वर्तमान युवा पीढ़ी अपने ही गौरवशाली इतिहास से दूर हो गई और पश्चिमी दूसरे शब्दों में कहें तो अंग्रेजी संस्कृति का अंधानुकरण करने में इतनी आगे निकल गई, कि अपनी ही गौरवशाली सभ्यता, संस्कृति और इतिहास को उसने मीलों पीछे छोड़ दिया। खैर, मैकाले शिक्षा पद्धति के दुष्परिणामों पर फिर कभी प्रकाश डालेंगे, अभी हम बात करने जा रहे हैं एक ऐसे गौरवपूर्ण इतिहास की, जिस पर हर भारतीय को गर्व होगा।

बात करते हैं ‘दादी रानी रामप्यारी गुर्जरी की।’ हम झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के शौर्य से तो परिचित हैं, जिन्होंने झाँसी को अंग्रेजों के हाथों में जाने से बचाने के लिये वीरतापूर्वक अंग्रेजी सेना का सामना किया और युद्ध के मैदान में अंग्रेजों को लोहे के चने चबवा दिये, परंतु दादी रानी रामप्यारी गुर्जरी के बारे में बहुत कम लोग ही जानते हैं, क्योंकि वर्तमान मैकाले शिक्षा पद्धति में भारत के गौरवशाली इतिहास को मिटाने का काम किया गया है, ताकि भावी पीढ़ी इनके बारे में जान ही न पाये और उनके स्थान पर अंग्रेजी शासकों और वैज्ञानिकों के गुणगान किये जा रहे हैं, ताकि भारतीय स्वतंत्रता के बाद भी किसी न किसी प्रकार अंग्रेजी मानसिकता के ग़ुलाम बने रहें।

वीरांगना रामप्यारी ने 40 महिलाओं के साथ मिल कर किया क्रूर तैमूर का ख़ात्मा

दादी रानी रामप्यारी गुर्जरी का जन्म गुर्जरगढ़ में हुआ था जो अब सहारनपुर के नाम से जाना जाता है। वह चौहान गोत्र की गुर्जर थी। ई. स. 1398 में जब समरकंद (मध्य एशिया में उज़्बेकिस्तान का एक महत्वपूर्ण शहर है) के शासक तैमूर लंग ने हरिद्वार के रास्ते प्राचीन दिल्ली पर आक्रमण किया, तब फिरोज़ शाह दिल्ली का शासक था और वह बहुत ही कमज़ोर शासक था, जिसके कारण ही तैमूर को भारत पर आक्रमण करने और यहाँ पैठ जमाने का अवसर मिला था, परंतु क्रूरता और निष्ठुरता के लिये कुख्यात तैमूर लंग का उस समय सामना किया भारत की दादी रानी रामप्यारी ने। तैमूर लंग के विरुद्ध लड़ाई लड़ने के कारण ही दादी रानी रामप्यारी के नाम के साथ भी वीरांगना शब्द लगाया जाता है। रानी रामप्यारी के रण-कौशल को देखकर तैमूर भी दाँतों तले अँगुलियाँ दबाने को मजबूर हो गया था। उसने अपने जीवन में इससे पहले कभी ऐसी वीरता और शौर्य से भरी महिला नहीं देखी थी, जिसने 40 हजार महिलाओं की सेना बनाकर उसका नेतृत्व करते हुए तैमूर को युद्ध में घायल कर दिया था, जिसके कुछ समय बाद ही तैमूर की मृत्यु हो गई थी।

दरअसल हाल ही में ठाणे-महाराष्ट्र में अस्माकम् भारत कार्यक्रम का आयोजन किया गया था, जिसमें मानोषी सिन्हा की एक पुस्तक ‘सैफरॉन स्वॉर्ड्स’ और ऑनलाइन मैगज़ीन ‘अस्माकं भारत’ का विमोचन किया गया। चिंतनकार रतन शारदा ने इसका विमोचन किया।

इस मौके पर पुस्तक की लेखक मानोषी सिन्हा ने बताया कि भारत वर्ष के इतिहास पर अपनी तथ्यात्मक रचना सेफ्रोन स्वोर्ड्स के लेखन के लिये उन्होंने भारत भर के अनगिनत ऐतिहासिक स्थलों का भ्रमण किया था। उन्होंने बताया कि भारतीय इतिहास से अनेक महान विभूतियों के नाम गायब हो चुके हैं, इन्हीं में से एक नाम तैमूर के इतिहास से जुड़ी वीरांगना दादी रानी रामप्यारी गुर्जर का भी है, जिनके साहस के आगे तैमूर ने भी आत्मसमर्पण कर दिया था। भारतीय गौरव के ऐसे अनेक पृष्ठ हमारे इतिहास की पुस्तकों से लुप्त हो चुके हैं।

विमोचन समारोह में मुख्य वक्ता चिंतनकार रतन शारदा ने इतिहास लेखन में आने वाली व्यावहारिक कठिनाइयों के बारे में प्रकाश डाला। समारोह में आयोजक संस्थान की निदेशिका डॉ. शालिनी पंड्या के अलावा स्मिता ताई, रति हेगड़े, आभिजात, स्नेहा, बीना मेनन, मंजरी, रुपिंदर कौर आदि भी उपस्थित थे।

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