कारगिल विजय दिवस : जानिए कौन है वह सबसे बड़े सम्मान का अधिकारी, जो 20 साल बाद भी बेबसी में जीने को मजबूर है ?

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रिपोर्ट : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 26 जुलाई, 2019 (युवाPRESS)। आज पूरा देश भारतीय सेना (INDIAN ARMY) तथा भारतीय वायुसेना (IAF) के अदम्य साहस और शौर्य की गाथा गा रहा है। 26 जुलाई, 1999 का ही वह दिन था, जब सेना ने जम्मू-कश्मीर में 18000 फीट की ऊँचाई पर स्थित कारगिल से पाकिस्तानी घुसपैठिया सैनिकों को खदेड़ कर फिर एक बार तिरंगा लहराया था। वैसे भारत को अपनी ही भूमि से शत्रुओं को खदेड़ने के लिए चलाया गया ऑपरेशन विजय बहुत महंगा पड़ा था, क्योंकि इसमें करीब 527 जवान वीरगति को प्राप्त हुए थे और लगभग 1300 जवान घायल हुए थे। इसके बावजूद सेना ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए लगभग 60 दिन चले इस युद्ध में विजय हासिल की थी।

नि:संदेह कारगिल आज भारत का हिस्सा है, तो यह सेना के हजारों जवानों के कड़े और बलिदानी संघर्ष का परिणाम है, परंतु क्या आप जानते हैं कि यदि एक कश्मीरी गाय खो न गई होती और उसका मालिक उसे खोजने न निकला होता, तो भारतीय सेना को न जाने कितने समय तक पाकिस्तानी सैनिकों के कारगिल पर कब्जा करने की भनक तक न लगती ? वास्तव में यदि कारगिल आज हमारा है, तो इसका कारण वह कश्मीरी याक यानी चमरी गाय है, जो अपने मालिक से खो गई थी। वह मालिक उसे खोजने निकला और उसने कारगिल की पहाड़ियों में पाकिस्तानी सेना को देखा। उसी चरवाहे ने भारतीय सेना को पाकिस्तानी घुसपैठ की जानकारी दी और फिर कारगिल से पाकिस्तानी सेना को खदेड़ने के लिए भारत ने युद्ध आरंभ किया।

उस चरवाहे का नाम है ताशी नामग्याल। दरअसल ताशी ने एक नया याक ख़रीदा था। नया-नवेला याक होने के कारण वह एक दिन अचानक गुम हो गया। वह दिन था 3 मई, 1999 का। अपने याक की खोज में निकले ताशी कारगिल के बाल्टिक सेक्टर में पहाड़ियों पर चढ़-चढ़ कर दूर-दूर तक नज़रें दौड़ा रहे थे कि कहीं उनका याक दिखाई दे जाए। इसी दौरान उन्हें अपना याक मिल गया, परंतु इसके साथ ही उन्होंने जो दृश्य देखा, उसे देख कर वे दंग रह गए। उन्होंने देखा कि पहाड़ियों में कुछ संदिग्ध लोग हैं, जिनकी वेशभूषा पाकिस्तानी सैनिकों जैसी थी। ताशी ने एक क्षण की भी देरी नहीं की और भारतीय सेना को इसके बारे में जानकारी दी। इसके बाद 5 मई को भारतीय सेना की पेट्रोलिंग टीम कारगिल पहुँची और वहाँ पाकिस्तानी सेना होने का खुलासा हुआ। यद्यपि कारगिल की पहाड़ियों पर हथियारों के साथ कब्जा जमा चुके पाकिस्तानी सैनिकों ने भारतीय सेना की पेट्रोलिंग टीम को पकड़ लिया और 5 भारतीय सैनिकों की हत्या कर दी। दरअसल कारगिल में 5000 पाकिस्तानी सैनिक घुसपैठ कर चुके थे। ऐसे में भारत के पास तत्काल जवाब देने के लिए कोई पूर्वायोजित रणनीति नहीं थी। 9 मई को पाकिस्तानी सेना की गोलीबारी में कारगिल में भारतीय सेना का गोला-बारूद नष्ट हो गया। इसके बाद भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सैनिकों की पड़ताल शुरू की, तो लद्दाख के प्रवेश द्वार द्रास, काकसार और मुश्कोह सेक्टर में भी बड़ी संख्या में पाकिस्तानी सैनिक देखे गए। 26 मई को भारत ने आधिकारिक रूप से युद्ध आरंभ किया। वायुसेना ने पाकिस्तानी घुसपैठियों के खिलाफ कार्यवाही शुरू की, तो ज़मीन पर भारतीय सेना ने मोर्चा संभाला।

यह तो कहानी हुई कारगिल युद्ध आरंभ होने की और 26 जुलाई, 1999 को भारत ने ऑपरेशन विजय के अंतर्गत पाकिस्तान को बुरी तरह परास्त करते हुए कारगिल युद्ध में विजय भी हासिल कर ली। आज जब हम कारगिल विजय दिवस की 20वीं बरसी मना रहे हैं, तब पूरे देश को ताशी पर नाज़ होना स्वाभाविक है, परंतु क्या आप जानते हैं कि भारतीय सेना के लिए सबसे बड़ा मुखबिर बने ताशी आज किस हालत में जीवन यापन कर रहे हैं ?

ताशी कारगिल से 60 किलोमीटर दूर सिंधु नदी के तट पर गारकौन नामक गाँव में रहते हैं। बौद्ध धर्मावलंबी ताशी को आज भी इस बात का गर्व है कि उन्होंने भारत देश और सेना की सहायता कर देश का ऋण चुकाया। उनके इस बहादुरी भरे कार्य और सजगता के लिए उन्हें कई सम्मान चिह्न प्राप्त हुए, परंतु ताशी अब इन सम्मान चिह्नों से ऊबब गए हैं। वास्तव में, ताशी एक अत्यंत ग़रीब चरवाहे हैं। उनके चार बच्चे हैं। उनकी बेटी की पढ़ाई के लिए तो सरकारी मदद मिली, परंतु कोई और आर्थिक सहायता नहीं दी गई। कई वादे किए गए थे, परंतु कोई वादा पूरा नहीं किया गया। वैसे ताशी को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से बहुत आशाएँ हैं। वे चाहते हैं कि उनकी दीन-दशा की सूचना कोई प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक पहुँचाए।

युद्ध के दौरान ताशी के साथ ही उनके गारकौन गाँव के अन्य लोगों ने भी सेना की ख़ूब मदद की। गारकौन गाँव के लोगों ने अपने खाने-पीने की चिंता किए बगैर भारतीय सैनिकों के खाने-पीने का ध्यान रखा, परंतु बदले में उन्हें सरकार की ओर से कुछ भी नहीं मिला। गारकौन गाँव आज भी संचार सुविधा के अभाव में जी रहा है। इस गाँव के लोगों का मानना है कि वे सम्मान और विशेष व्यवहार के अधिकारी हैं, क्योंकि उन्होंने कई ज़िंदगियाँ बचाने के साथ-साथ भारतीय सेना के सम्मान को बचाया।

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