कौन हैं वंदे मातरम् का उर्दू अनुवाद करने वाले आरिफ मोहम्मद खान, जो बने केरल के नये राज्यपाल ?

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रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 1 सितंबर, 2019 (युवाPRESS)। मुस्लिम समुदाय के लोग वंदे मातरम् को गाने से यह कहकर इनकार करते हैं कि यह उनकी आस्था के खिलाफ है, परंतु उसी वंदे मातरम् का अग्रगण्य मुस्लिम नेता और समाज सुधारक आरिफ मोहम्मद खान ने उर्दू में अनुवाद किया था। आरिफ मोहम्मद खान मुस्लिम समाज में व्याप्त तीन तलाक की प्रथा का भी विरोध करते रहे हैं। इसी के इनाम के तौर पर उन्हें केरल के राज्यपाल की राजगद्दी मिली है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने राजस्थान, महाराष्ट्र, केरल, हिमाचल प्रदेश और तेलंगाना के राज्यपालों की नियुक्ति की है। इनमें भगत सिंह कोश्यारी को महाराष्ट्र, आरिफ मोहम्मद खान को केरल, टी. सुंदरराजन को तेलंगाना का राज्यपाल बनाया है, जबकि हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल कलराज मिश्र को राजस्थान स्थानांतरित किया है। उनके स्थान पर पूर्व केन्द्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय को हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

कौन हैं आरिफ मोहम्मद खान ?

उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में 1951 में जन्मे और बाराबस्ती से ताल्लुक रखने वाले परिवार के आरिफ मोहम्मद खान पेशे से वकील थे और उन्होंने 1978 में अपनी पहली पत्नी शाह बानो को तीन तलाक दिया था। शाह बानो समान नागरिक संहिता की दलील के साथ गुज़ारा भत्ता लेने के लिये अपने पति के खिलाफ अदालत पहुँच गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने भी शाह बानो के पक्ष में फैसला दिया था, परंतु सालों तक चली कानूनी लड़ाई के बीच इस केस पर बहस से मुस्लिम समाज तीन तलाक के विरुद्ध और मुस्लिम महिला के कोर्ट में जाने के विरुद्ध आंदोलित हो गया था। इस दौरान राजीव गांधी सरकार में गृह राज्य मंत्री रहे आरिफ मोहम्मद खान ने शाह बानो के पक्ष में आये सुप्रीम कोर्ट के फैसले की जबरदस्त पैरवी की थी और 23 अगस्त 1985 को लोकसभा में दिया गया आरिफ खान का भाषण मशहूर तथा यादगार हो गया। अंत में इस केस में यह हुआ कि मुस्लिम समाज के दबाव में आकर राजीव गांधी ने मुस्लिम पर्सनल लॉ सम्बंधी एक कानून संसद में पास करवाया और शाह बानो के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया। तब खान ने राजीव गांधी के इस कदम के खिलाफ मुखर होते हुए न केवल मंत्री पद से इस्तीफा दिया बल्कि कांग्रेस का दामन भी छोड़ दिया। 1980 में कानपुर और 1984 में बहराइच से लोकसभा के सांसद रहे खान मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के समर्थक रहे हैं। खान ने कांग्रेस छोड़ने के बाद जनता दल का दामन थाम लिया था और 1989 में वह फिर सांसद चुने गये तथा जनता दल के शासन काल में वह नागरिक उड्डयन मंत्री बने। बाद में जनता दल छोड़कर वह बहुजन समाज पार्टी में चले गये थे। 1998 में वह फिर चुनाव जीतकर संसद पहुँचे, इसके बाद 2004 में खान ने भारतीय जनता पार्टी जॉइन की। 2007 में भाजपा भी छोड़ दी। बाद में 2014 में बनी भाजपा की केन्द्र सरकार के साथ मिलकर तीन तलाक के खिलाफ कानून बनाने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को खत्म करने की वकालत करते हैं आरिफ खान

आरिफ खान लेखक भी रहे हैं और उनकी किताबें बेस्ट सेलिंग में रही हैं, जो उन्होंने कुर्आन और समसामयिक चुनौतियों के विषयों पर लिखी थी। वह लगातार इस्लाम और सूफीवाद से जुड़े विषयों पर लेख और कॉलम लिखते रहे हैं और अपने लेखन के माध्यम से वह भारत के मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को खत्म करने की पैरवी करते रहे हैं। अभी खान अपनी वर्तमान पत्नी रेशमा आरिफ के साथ मिलकर शारीरिक रूप से कमजोर लोगों के लिये एक संस्था ‘समर्पण’ का संचालन करते हैं। खान मुस्लिम समाज में व्याप्त कुरीतियों के खिलाफ मुखर होकर बोलते हैं। जब राष्ट्रगीत वंदे मातरम् को लेकर विवाद उठा तब भी वह सामने आये और उन्होंने वंदे मातरम् का समर्थन किया और उसके शब्दों से ग़ुरेज़ करने वालों के लिये उसका उर्दू में अनुवाद किया। उन्होंने कहा कि वंदे का अर्थ वंदना करना होता है, जिसे उर्दू में सलाम करना या तस्लीम करना कहते हैं।

प्रस्तुत है वंदे मातरम् का उर्दू अनुवाद

तस्लीमात, मां तस्लीमात

तू भरी है मीठे पानी से,

फल-फूलों की शादाबी से,

दक्खिन की ठंडी हवाओं से,

फसलों की सुहानी फिजाओं से

तस्लीमात, मां तस्लीमात्

तेरी रातें रोशन चांद से,

तेरी रौनक सब्जे-फाम से,

तेरी प्यार भरी मुस्कान है,

तेरी मीठी बहुत जुबान है,

तेरी बाहों में मेरी राहत है,

तेरे कदमों में मेरी जन्नत है

तस्लीमात, मां तस्लीमात

शब्दार्थ : तस्लीमात – सलाम, शादाबी – हरियाली, दक्खिन – दक्षिण, सब्जे-फाम – हरियाली, जुबान – भाषा।

वंदे मातरम् के विषय में…

वंदे मातरम् 1876 में लिखा गया था। उस समय इसके दो पैराग्राफ ही लिखे गये थे। बाद में उसमें तीन अन्य पैराग्राफ जोड़े गये थे। आज़ादी की लड़ाई के दौरान क्रांतिवीरों ने वंदे मातरम् का नारा गुंजायमान किया था। 1909 में महर्षि अरविंदो ने इसका अंग्रेजी अनुवाद किया था। 1937 में कांग्रेस ने वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत बनाने के लिये रवींद्रनाथ टैगोर की अगुवाई में कमेटी बनाई थी, जिसमें नेहरू, सुभाष और आचार्य नरेन्द्र देव भी थे। 14 अगस्त 1947 की आधी रात को जब आज़ादी मिली तो सबसे पहले वंदे मातरम् ही गाया गया था। संसद के सेंट्रल हॉल में सत्ता हस्तांतरण हुई तब डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने कार्यवाही शुरू की और उन्होंने सुचेता कृपलानी से कहा था कि वंदे मातरम् शुरू करो।

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