आ अब लौट चलें : संत ज्ञानेश्वर, जिन्होंने सिद्ध कर दिखाया कि आत्म ज्ञान के आगे अमरत्व भी माटी समान

आलेख : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 25 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। वैचारिक क्रांति मंच युवाPRESS अपने ‘आ अब लौट चलें’ स्तंभ के माध्यम से समय-समय पर वर्तमान-आधुनिक युवा पीढ़ी को भारत की प्राचीन-पुरातन-वैदिक ज्ञान संस्कृति की शक्ति से अवगत कराने का प्रयास कर रहा है। ‘आ अब लौट चलें’ की आज पाँचवीं कड़ी है। भाग 5 में हम आपको 13वीं शताब्दी में हुए एक महान संत, उसके आत्म-ज्ञान की शक्ति और भारतीय सनातन धर्म के लिए जगाई गई उसकी अलख से आपको परिचित कराएँगे।

उपनिषदों को गौ और गीता को दुग्ध कहा गया है। इसका तात्पर्य यह है कि उपनिषदों की जो अध्यात्म विद्या है, उसको गीता सर्वांश में स्वीकार करती है। उपनिषदों की अनेक विद्याएँ गीता में विद्यमान हैं। जैसे, संसार के स्वरूप के संबंध में अश्वत्थ विद्या, अनादि अजन्मा ब्रह्म के विषय में अव्ययपुरुष विद्या, परा प्रकृति या जीव के विषय में अक्षरपुरुष विद्या और अपरा प्रकृति या भौतिक जगत के विषय में क्षरपुरुष विद्या। इस प्रकार वेदों के ब्रह्मवाद और उपनिषदों के अध्यात्म, इन दोनों की विशिष्ट सामग्री गीता में संनिविष्ट है। उसे ही पुष्पिका के शब्दों में ब्रह्मविद्या कहा गया है। यह महाभारत के भीष्मपर्व का अंग है। गीता में 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं, जिसे कुरुक्षेत्र की युद्ध भूमि में श्री कृष्ण ने अर्जुन को सुनाया था, जो श्रीमद्भगवदगीता के नाम से प्रसिद्ध है। भगवद्गीता मूलरूप में संस्‍कृत में है, परंतु गीता प्रेस में इसका हिंदी के अलावा 15 भाषाओं में अनुवाद किया गया है। समय-समय पर योगियों, मुनियों और अनुवादकों ने गीता का अनुवाद करके अलग-अलग भाषी लोगों तक पहुँचा है। ऐसे ही एक महान ज्ञानी महापुरुष थे संत ज्ञानेश्नर। 13वीं शताब्दी में हुए संत ज्ञानेश्वर ने गीता का मराठी में अनुवाद कर न सिर्फ मराठी भाषी मानव जाति को एक अमृत कलश दिया, अपितु स्वयं के जीवन में भी गीता के सार का समावेश कर लिया। उनके ज्ञान की परिकाष्ठा इतनी बड़ी थी कि 1400 वर्ष की विराट आयु के अभिमानी संत चांगदेव महाराज भी नतमस्तक होकर संत ज्ञानेश्वर के शिष्य बन गए थे। आज हम संत ज्ञानेश्वर को हम इसलिए स्मरण कर रहे हैं, क्योंकि आज उनका 723वाँ अंतर्ध्यान-निर्वाण दिवस है। 25 अक्टूबर, 1296 को मार्गशीर्ष वदी (कृष्ण) त्रियोदशी को संत ज्ञानेश्वर ने मात्र 21 वर्ष की अल्पायु में सजीवन समाधिस्थ होकर नश्वर देह का त्याग किया था।

आत्म ज्ञान, जिसके बल पर भैंसे से करवाया वेदोच्चारण

संत ज्ञानेश्वर का जन्म 22 अगस्त, 1275 को महाराष्ट्र में अहमदनगर (अब औरंगाबाद) के पैठण के पास आपे गाँव में भाद्रपद के कृष्ण अष्टमी (श्री कृष्ण जन्माष्टमी) को हुआ था। उनके पिता विट्ठल पंत एवं माता रुक्मिणी बाई थीं। सन्न्यास छोड़कर गृहस्थ बनने के कारण समाज ने ज्ञानेश्वर के पिता विट्ठल पंत का बहिष्कार कर दिया। वे कोई भी प्रायश्चित करने के लिए तैयार थे, पर शास्त्रकारों ने बताया कि उनके लिए देह त्यागने के अतिरिक्त कोई और प्रायश्चित नहीं है और उनके पुत्र भी जनेऊ धारण नहीं कर सकते। इस पर विट्ठल पंत ने प्रयाग में त्रिवेणी में जाकर अपनी पत्नी के साथ संगम में डूब कर प्राण दे दिए। बच्चे अनाथ हो गए। लोगों ने उन्हें गाँव के अपने घर में भी नहीं रहने दिया। अब उनके सामने भीख माँग कर पेट पालने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं रह गया। ज्ञानेश्वर और उनके भाई-बहन को जाति से बहिष्कृत कर दिया गया था। पिता की छत्रछाया से वंचित ये अनाथ भाई-बहन जनापवाद के कठोर आघात सहते हुए ‘शुद्धिपत्र’ की प्राप्ति के लिये उस समय के सुप्रसिद्ध धर्मक्षेत्र पैठण में जा पहुँचे, परंतु वहाँ के ब्राह्मणों ने उनका उपहास उड़ाना शुरू कर दिया, तब ज्ञानदेव ने उनका उपहास उड़ा रहे ब्राह्मणों के समक्ष एक भैंसे के मुख से वेदोच्चारण कराया, इतना ही नहीं भैंस को जो डंडे मारे गए थे, उसके निशान ज्ञानेश्वर के शरीर पर उभर आए। यह सब देखकर पैठण उपहास उड़ा रहे सभी ब्राह्मण ज्ञानेश्वर के नतमस्तक हो गए और ज्ञानेश्वर और उनके भाई को शुद्धिपत्र दे दिया। समाज से उन्हें बहुत कष्ट मिले, परंतु उन्होंने अखिल जगत पर अमृत सिंचन किया। भावार्थदीपिका की वह अद्भुत ज्योति जलाई, जिसकी आँच किसी को नहीं लगती, परंतु प्रकाश आज भी सबको मिल रहा है। ज्ञानेश्वरजी के प्रचंड साहित्य में कहीं भी, किसी के विरुद्ध परिवाद नहीं है। क्रोध, रोष, ईर्ष्या, मत्सर का कहीं लेशमात्र भी नहीं है। समग्र ज्ञानेश्वरी क्षमाशीलता का विराट प्रवचन है। भारत के महान संतों एवं मराठी कवियों में संत ज्ञानेश्वर का स्थान अतुल्य है।

अहंकारी चांगदेव ने भेजा कोरा पत्र

अब बात करते हैं चांगदेव महारज की, जो अपनी सिद्धियों के लिए प्रसिद्ध थे। कहते हैं कि संत ज्ञानेश्वर के जीवन काल के समय चांगदेव की आयु 1400 वर्ष की थी। पौराणिक कथाओं के अनुसार चांगदेव ने अपनी सिद्धि के बल पर 42 बार आए यमराज को अपनी आत्मा लिए बिना खाली हाथ वापस भेज दिया था। यमराज जब भी उनके प्राण लेने आते थे वे ब्रह्मरंध्र में चले जाते थे और यमराज को वापस लौटना पड़ता था। इस प्रकार वे 1400 वर्षों तक जीवित रहे। उसी दौरान उन्हें संत ज्ञानेश्वर के अद्भुत कर्यों की सूचना मिली। चांगदेव ने सोचा कि ज्ञानेश्वरजी को एक पत्र लिखूँ , परन्तु उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि पत्र का आरम्भ कैंसे करूँ, क्योंकि उस समय ज्ञानेश्वर की आयु केवल 16 वर्ष थी। अतः उन्हें पूज्य, चिरंजीव कैंसे लिखा जाए ? महात्मा और इतने बड़े ज्ञानी होने के कारण वह इस प्रकार का संबोधन लिखने में स्वयं को सहज महसूस नहीं कर पा रहे थे, इसलिए उन्होंने एक कोरा पत्र संत ज्ञानेश्वर के पास भेज दिया।

जब यमराज को हराने वाले चांगदेव आ गिरे चरणों में

संत ज्ञानेश्वर के आदेश पर उनकी बहन मुक्ताबाई ने पत्र का उत्तर भेजा, जिसमें लिखा था, “आपकी आयु 1400 वर्ष की है फिर भी आप इस पत्र की भाँति कोरे ही हैं।” यह पत्र पढ़कर चांगदेव ज्ञानेश्वर से मिलने का निश्चय किया। चांगदेव एक सिद्धि पुरुष थे अतः वे शेर पर बैठकर और सर्प की लगाम बनाकर संत ज्ञानेश्वर से मिलने गए। संत ज्ञानेश्वर को, जब ज्ञात हुआ कि चांगदेव मिलने आ रहे हैं, तब उन्हें आगे बढ़कर उनका स्वागत-सत्कार करने का निश्चय किया और उस समय वे जिस दीवार पर बैठे थे, उस दीवार को ही चलने का आदेश दिया। चांगदेव ने जब दीवार को चलते देखा, तो उन्हें विश्वास हो गया कि ज्ञानेश्वर उनसे श्रेष्ठ हैं, क्योंकि वे तो निर्जीव वस्तु को भी वश करने में सक्षम हैं, जबकि मैं तो केवल जीवित प्राणियों को ही वश करता हूँ। बस उसी क्षण से चांगदेव संत ज्ञानेश्वर के चरणों और शरण में आ गए तथा उनके शिष्य बन गए। कहने का तात्पर्य ये है कि ज्ञान से बड़ा कोई सिद्ध या पौरुष नहीं है। ज्ञान आ जाने के बाद संसार की प्रत्येक वस्तु छोटी तुच्छ हो जाती है और एक ज्ञानी पुरुष जगत का सम्राट बन जाता है। चांगदेव को उसके देहाभिमान और सिद्धियों के अहंकार से मुक्त करा कर संत ज्ञानेश्वर ने सिद्ध कर दिखाया कि आत्म-ज्ञान के आगे अमरत्व (अमृत) भी माटी समान है। साधारण मानव अपने पूरे जीवनकाल में जहाँ सदैव और सदेह (देह के साथ) जीवित रहने की आकांक्षा रखता है, वहीं आत्म-ज्ञान ऐसे व्यक्ति को उस परम तत्व का बोध कराता है, जहाँ वह स्वयं से साक्षात्कार कर देह से मुक्त होकर स्वत: ही अमर हो जाता है।

संत ज्ञानेश्वर ने जगाई अध्यात्म की अलख

हिन्दु धर्म के लगभग सारे धर्मग्रंथ संस्कृत में होते थे और आम जनता संस्कृत भाषा से परिचित नहीं थी, परंतु इस तेजस्वी बालक ज्ञानेश्वर ने केवल 15 वर्ष की आयु में ही गीता को मराठी की बोलचाल भाषा में ‘ज्ञानेश्वरी’ नामक गीता-भाष्य की रचना करके मराठी जनता की के लिए ज्ञान की झोली खोल दी थी। स्वयं टीकाकार में उन्होंने लिखा है, “अब यदि मैं गीता का ठीक-ठीक विवेचन मराठी भाषा में करूँ, तो इस में आश्चर्य का क्या कारण है ? गुरु-कृपा और ज्ञान से क्या कुछ सम्भव नहीं ?” बालक से लेकर वृद्धों तक को भक्तिमार्ग का परिचय करा कर भागवत-धर्म की पुन:स्थापना करने के बाद ज्ञानदेव ने आलंदी गाँव में अत्यंत युवा होते हुए भी जीवित समाधि लेने का निश्चय किया। केवल 21 वर्ष 3 महीने और 5 दिन की अल्पायु में वह इस नश्वर संसार का परित्याग कर समाधिस्थ हो गये। ज्ञानदेव के समाधिग्रहण का वृत्तांत संत नामदेव ने अत्यंत हृदयस्पर्शी शब्दों में लिखा है। अपने गुरु निवृत्तिनाथ को अंतिम वंदन कर ज्ञानदेव स्थित प्रज्ञ के समान समाधि मंदिर में जा बैठे। तदुपरांत स्वयं गुरु ने समाधि मंदिर की द्वार शिला बंद कर दी। ज्ञानेश्वर को ध्यानेश्वर भी कहा जाता है। उन्होंने संजीवन समाधि ले ली थी यानी एक गहरी ध्यान अवस्था में प्रवेश करने के बाद स्वेच्छा से मरने की प्रथा। उनकी समाधि महाराष्ट्र में अलंदी गाँव के सिधेश्वरा मंदिर परिसर में स्थित है।

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