‘गागर में सागर’ की तरह है हिन्दी, इस तरह बज रहा है पूरी दुनिया में डंका

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अहमदाबाद, 14, सितंबर 2019 (युवाPRESS)। हिन्‍दी एक ऐसी भाषा है, जो दुनिया में सबसे ज्‍यादा बोली जाती है। देश औ दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ती हिन्दी भाषा हर जनमानस को दिल की गहराई तक छूती है, इतना ही नहीं हिन्‍दी की बढ़ती मजबूती को देखते हुए, विदेशी कंपनियाँ भी हिन्‍दी को बढ़ावा दे रही हैं। दुनिया का सबसे बड़ा सर्च इंजन गूगल जहाँ पहले सिर्फ अंग्रेजी भाषा में ही परिणामों को दर्शाता था वहीं आज गूगल पर सर्च करने से अंग्रेसी के साथ साथ ढूँढी जाने वाली सामग्रियाँ हिन्दी हिन्‍दी और अन्‍य क्षेत्रीय भाषाओं में देखने को मिलती हैं। जहाँ पहले विदेश जाने वाले युवा हिन्दी बोलने में शर्म की अनुभूति किया करते हैं, वहीं आज वही युवा बेझिझक हिन्दी भाषा का उपयोग करते हैं। आज हिन्दी को प्रमुखता से पढ़ाया जा रहा है, उसकी गरिमा को एक नई पहचान मिली है। आज 66वें हिन्दी दिवस के अवसर पर हम हिन्दी से जुड़ी कुछ ख़ास बाते लेकर आए हैं।

भारत में हिंदी दिवस की शुरूआत 14 सितंबर 1953 में हुई। हिंदी भाषा को बढ़ावा देने और उसके प्रचार-प्रसार के लिए वर्ष की हर 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है। हिन्दी विश्व की एक प्रमुख भाषा है एवं भारत की राजभाषा है। भारत समेत कई विदेशी देशों पाकिस्‍तान, नेपाल, बांग्‍लादेश, अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, न्‍यूजीलैंड, संयुक्‍त अरब अमीरात, युगांडा, गुयाना, सूरीनाम, त्रिनिदाद, मॉरिशस और साउथ अफ्रीका में भी हिन्दी बोली और पढ़ाई जाती है।

ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी ने भी हिंदी भाषा का लोहा मानते हुए अपने मार्च संस्करण में हिंदी शब्दों को इंग्लिश शब्दों की लिस्ट में शामिल किया है। ‘चड्डी, बापू, सूर्य नमस्कार और अच्छा’ जैसे शब्द भी इस शब्दकोश में जगह बना चुके हैं, इससे पहले 2017 में करीब 70 शब्दों को ऑक्सफोर्ड ने अपनी डिशनरी में शामिल किया था, इनमें से 33 शब्द हिंदी भाषा के थे। 2017 में शामिल ‘नारी शक्ति’ और 2018 में ‘आधार‘ शब्दों को हिंदी शब्द ‘ऑफ द ईयर’ के खिताब से भी नवाजा जा चुका है। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस (ओयूपी) दुनिया की सबसे बड़ी विश्वविद्यालय प्रेस है। यह ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय का एक विभाग है और इसका संचालन उपकुलपति द्वारा नियुक्त 15 शिक्षाविदों के एक समूह द्वारा किया जाता है जिन्हें प्रेस प्रतिनिधि के नाम से जाना जाता है। शिक्षाविदों का नेतृत्व प्रतिनिधियों के सचिव द्वारा किया जाता है, जो ओयूपी के मुख्य कार्यकारी और अन्य विश्वविद्यालय निकायों के प्रमुख प्रतिनिधि होते हैं। विश्वविद्यालय ने 1480 में मुद्रण व्यापार में कदम रखा और बाइबल, प्रार्थना पुस्तकों और अध्ययनशील रचनाओं का प्रमुख मुद्रक बन गया। इसी प्रेस द्वारा शुरु की गयी एक परियोजना उन्नीसवीं सदी के अंतिम दौर में आकर ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी बन गई।

भाषा की उत्पत्ति से तात्पर्य यह है कि मनुष्य ने सर्वप्रथम कब अपने मुख से ध्वनियों का इच्चारण किया और उसे वस्तु, पदार्थ एवं भावों से जोड़ा। संसार का सबसे प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद है। संभव है कि ऋग्वेद से पहले भी कोई भाषा विद्यमान रही हो, परन्तु आज तक उसका कोई परिणाम नहीं मिला पाया है। आरेयों और ऋग्वेद की प्राचीन भाषा वैदिक संस्कृत थी। ऐसा माना जाता है कि ऋग्वेद की रचना किसी एक स्थान नहीं हुई, इसके कुछ मन्त्रों के अंश कन्धार में, कुछ सिन्धु तट पर, कुछ की विपाशा-शतद्रु के संभेद पर और कुछ मंत्रों की यमुना-गंगा के तट पर हुई। संपूर्ण आर्यभाषाएँ फारसी, यूनानी, लैटिन, रूसी आदि वैदिक संस्कृत से निकली हैं।

इतिहासकारों का मामना है कि संसार की उत्पति आदिम से हुई थी, यह इधर-उधर, अलग अलग देशों में भ्रमण किया करते थे, उन्होंने ही अपनी भाषाओं की नींव हर उस स्थान पर रखी जहाँ वह भ्रमँ के लिए गए, जो आदिम पश्चिम गए उनसे ग्रीक, लैटिन, अंग्रेजी आदि आर्यभाषाएँ बोलने वाली जातियों की उत्पत्ति हुई, जो पूर्व की ओर गए उनके दो भाग हुए, एक भाग फारस (ईरान) और दूसरा हिन्दूकुश पर्वत को पार कर काबुल की तराई से होता हुआ हिंदुस्तान पहुँचा। ईरान में पहुँचे आदिम ने ‘मोडी’ भाषा के द्वारा फारसी को जन्म दिया और हिन्दिस्तान के आदिम ने संस्कृत का प्रचार किया। भारतीय आर्यभाषा के मध्ययुग में जो अनेक प्रादेशिक भाषाएँ विकसित हुई, उनका सामान्य नाम प्राकृत है और उन भाषाओं में जो ग्रंथ रचे गए, उन सबको समुच्चय रूप से प्राकृत साहित्य कहा गया।

भाषावैज्ञानिकों ने भारत के आर्यभाषा को तीन काल में बँटा है। प्राचीन, मध्यकालीन और अर्वाचीन । प्राचीन काल में वैदिक संस्कृत और संस्कृत भाषा का प्रचार हुआ, मध्ययुगीन में मागधी, अर्धमागधी, शौरसेनी, पैशाची, महाराष्ट्री और अपभ्रंश भाषा आस्तित्व में आई, तीसरे और आख़िरी काल अर्वाचीन में हिंदी, गुजराती, मराठी, बँगला भाषाओं का उदय हुआ, जो आगे चलकर उत्तर भारत की आधुनिक आर्यभाषाएँ बनी और आज तक चल रही हैं।

हिन्दी भाषा का सबसे अधिक विकास मुगल काल के दौरान ही हुआ, हलांकि शुरूआत में जब 1500 के आसपास तैमूरी राजवंश के राजकुमार बाबर ने उमैरिड्स साम्राज्य की स्थापना करने के लिए दोआब पर कब्जा किया और खोरासन के पूर्वी क्षेत्र द्वारा सिंध के उपजाऊ क्षेत्र और सिंधु नदी के निचले घाटी पर नियंत्रित कर लिया। 1526 में, बाबर ने दिल्ली के सुल्तानों में आखिरी सुलतान, इब्राहिम शाह लोदी, को पानीपत के पहले युद्ध में हरा कर दिल्ली पर कब्ड़ा कर लिया। मुगल ने शुरूआत में फारसी भाषा का ही प्रचार किया, परंतु फारसी भाषा के प्रचार से कोई लाभ न मिलता देख हिन्दी भाषा को अपना लिया, इस दौरान फारसी के कई शब्द हिन्दी भाषा में आ गए और इसके बाद से ही हिन्दी भाषा का मुगल काल में विकास शुरू हुआ।

ब्रिटेन ने भी हिन्दी भाषा और देवनागरी लिपि को ख़त्म करने की पूरी कोशिश। अंग्रेज़ो ने कभी हिन्दी भाषा को बढ़ने नहीं दिया। ब्रिटेन को डर था, कि कहीं हिन्दी भाषा के विस्तार और प्रसार से लोगों में एकता न बढ़ जाये, उस समय हिन्दी भाषा बहुत बड़े क्षेत्र के लोगों द्वारा बोली जाती है और कई अन्य भाषाओं के लोग भी इसे आसानी से समझ सकते हैं, अतः ब्रिटेन ने हिन्दी भाषा के प्रसार और विकास को रोकने के लिए फूट डालो और राज करो की नीति के साथ साथ भाषा की राजनीति भी करने लगे थे।

भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में हिन्दी भाषा और हिन्दी पत्रकारिता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। महात्मा गांधी और अनेक राष्ट्रीय नेता हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में देखने लगे थे। भारत के स्वतन्त्र होने पर हिन्दी को भारत की राजभाषा घोषित किया गया, परंतु हिन्दी का दुर्भाग्य ही कहें कि आजतक वह भारत की राष्ट्रभाषा नहीं बन पाई है।

स्वतंत्रता मिलने के बाद भी हिन्दी को वह स्थान नहीं मिला जो उसे मिलना चाहिए था, हिन्दी भाषा को राजभाषा के रूप में चुने जाने पर बहुत से लोगों ने इसका जमकर विरोध भी किया जो भारतीय होने के नाते उन विरोधियों के लिए बड़े ही शर्म की बात थी। 14, सितंबर 1949 को संविधान द्वारा हिन्दी को राजभाषा के रूप में मान्यता तो दी, परंतु पूर्णरूप से नहीं बल्कि एक बैसाखी के साथ। सरकारी और ग़ैरसरकारी कार्यालयों का कामकाज सुचारु ढंग से चलाने के लिए सह-राजभाषा के तौर पर अंग्रेज़ी को अपनाया गया और कहा गया कि अंग्रेजी 15 वर्षों तक हिंदी के साथ प्रयोग की जाएगी। संविधान के अनुच्छेद 343(1) के अंतर्गत अनुसूची(1) में संघ की भाषा हिन्दी निर्धारित की गई, अनुच्छेद 343(3) में यह सुविधा दी गई कि, 15 वर्षों के बाद भी अंग्रेज़ी का प्रयोग आवश्यकतानुसार जारी रखा जा सकता है और संविधान के अनुच्छेद 345-346 में राज्यों की प्रांतीय भाषाओं को विकसित और लागू करने की पूरी छूट दे दी गई। संविधान की आठवीं अनुसूची में हिंदी सहित 14 प्रादेशिक भाषाओं को मान्यता दी गई थी, जिसमें असमिया, बांग्ला, गुजराती, हिन्दी, कन्नड़, कश्मीरी, मराठी, मलयालम, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, तमिल, तेलगु उर्दू।

अंग्रेज़ी के सह-राजभाषा बनने के बाद उसका और अधिक प्रसार हुआ। सभी सरकारी कार्यालय में अंग्रेज़ी में काम होने के कारण लोग अंग्रेज़ी को जानने में अधिक समय व्यर्थ करने लगे और जिन लोगों को हिन्दी का ज्ञान था, वे भी हिन्दी को छोड़ अंग्रेज़ी भाषा सीखने के प्रति रुचि दिखाने लगे। हिन्दी भाषा सरकारी कार्यालयों काम काज़ की मुश्य लिपि अंग्रेजी बन गई, इस कारण लोगों को अपने जीवन यापन के लिए अंग्रेज़ी सीखना पड़ता था। अंग्रेज़ी को सह-राजभाषा बनाने का विरोध भी हुआ , परंतु समय के साथ वह विरोध खत्म हो गया। हिन्दी को अपना स्थान दिलाने के लिए हिन्दी दिवस मनाने की योजना बनाई गई। इसका उद्देश्य हिन्दी भाषा जानने वालों को अपने भाषा के प्रति सचेत करना और उसका विकास करनाथा।

जिस रफ़्तार से भारत में इंटरनेट का विकास हो रहा है, उसी के सात हिंदी भी इंटरनेट पर छा रही है। समाचारपत्र से लेकर हिंदी ब्लॉग तक अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। सर्च इंजन गूगल ने भी हिंदी में खोज करने की जगह उपलब्ध कराई, इतना ही नहीं विकिपीडिया ने भी हिंदी की महत्ता को समझते हुए, कई सारी सामग्री का सॉफ्टवेयर अनुवाद हिंदी में प्रदान करना शुरू कर दिया है, जिससे हिन्दी भाषी को किसी भी विषय की जानकरी आसानी से सुलभ हो सके। हिंदुस्‍तान में कुल मिला कर 147 भाषाएँ बोली जाती हैं, जिसमें हिंदी भाषा एक ऐसी प्राचीन भाषा है, जिसे भारत से लेकर यूरोप तक के पूर्वज बोला करते थे, हालांकि अब हिन्दी तेजी से प्रचलित हो रही है, वह साहित्य तक ही सीमित नहीं रही, अपितु पूरे विश्व में फैल चुकी है।

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