इस पूर्णिमा को करें चांद की पूजा : खिल उठेगी आपकी कला

Written by

रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 13 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। कहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति के अंदर कोई न कोई कला होती है, आवश्यकता होती है उसे पहचानने की और उसे निखारने की। निखरने के बाद यही कला व्यक्ति को विशिष्ट पहचान और प्रतिष्ठा दिलाती है। चंद्र कलाओं के देवता हैं। इसलिये उनकी पूजा-अर्चना करने से व्यक्ति की आंतरिक सुषुप्त कलाएँ खिलती हैं। इसलिये शरद पूर्णिमा की रात्रि को शुभ मुहूर्त्त में चावल और दूध की खीर पका कर उसे कुछ समय के लिये चांदनी में रखना चाहिये और बाद में उसे खाने से व्यक्ति के अंदर की कला खिलती है। आइए विस्तार से जानते हैं शरद पूर्णिमा के बारे में…

शरद पूर्णिमा क्यों मनाई जाती है ?

अश्विन माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। इस दिन चंद्र अपनी सभी 16 कलाओं में खिलता है। इसलिये इस पूर्णिमा का सर्वाधिक महत्व है, जो नवविवाहिताएँ पूर्णिमा के व्रत करने का संकल्प लेना चाहती हैं, उन्हें भी शरद पूर्णिमा के दिन ही शुभ मुहूर्त्त में यह संकल्प ग्रहण करना चाहिये। धार्मिक ग्रंथों में मिलने वाले चंद्र के वर्णन में कहा गया है कि शरद पूर्णिमा की रात चांद अपनी सोलह कलाओं में सुसज्जित होकर धरती पर किरणें बिखेरता है। इसी दौरान शुभ मुहूर्त्त में चांद की पूजा करने से व्यक्ति की आंतरिक सुषुप्त कलाएँ जागृत होती हैं और निखरती हैं। इसी चांदनी रात को पंच देवों की पूजा करने का भी विशेष महत्त्व दर्शाया गया है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार शरद पूर्णिमा की रात को पांच देवों चंद्रदेव, कुबेर, भगवान शिव, भगवान श्रीकृष्ण तथा माता लक्ष्मी की पूजा करने से विशेष लाभ प्राप्त होते हैं। माता लक्ष्मी के बारे में ग्रंथों में कहा गया है कि वे इस रात को 16 कलाओं में खिलने वाली चांदनी में अपने वाहन पर सवार होकर घूमती हैं और देखती हैं कि कौन जाग रहा है और कौन सो रहा है, जो लोग जाग रहे होते हैं और भगवान की पूजा-अर्चना तथा भजन-कीर्तन में लीन होते हैं, उन्हें माता धन-वैभव का आशीर्वाद प्रदान करती हैं। जबकि भगवान शिव भी नटराज के रूप में कला के देवता है, भगवान श्रीकृष्ण भी 16 कलाओं के साथ जन्मे थे और सभी 16 कलाओं में निपुण थे। चंद्रदेव भी कला के देव हैं और कुबेर देवों के कोषाध्यक्ष कहलाते हैं, जो माता लक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त करने वालों पर धन-वैभव की वर्षा करते हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि शरद पूर्णिमा की रात को चंद्र देव अमृत वर्षा करते हैं। सभी देवी-देवताओं को भोग में खीर सविशेष पसंद है। इसलिये चांदनी रात में सभी पांच देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना करके उन्हें खीर का भोग लगाना चाहिये और प्रसाद रूपी खीर को चांदनी रात में खुले स्थान पर कुछ देर तक रखने के बाद ग्रहण करनी चाहिये। इससे असाध्य रोगों से ग्रस्त लोगों को भी चमत्कारिक फायदा होता है, जबकि साध्य रोगों से रोगियों को छुटकारा मिल जाता है।

शरद पूर्णिमा की तिथि रविवार रात 12.36 बजे से आरंभ होगी और सोमवार देर रात 2.38 बजे तक रहेगी। इस बीच मंदिरों में तथा घरों पर लोग पूजन-अर्चन करते हैं। पूजन अर्चन में सफेद वस्तुओं का प्रयोग किया जाता है। पूजा करने वाले यजमान को सफेद वस्त्र धारण करने चाहिये और सफेद फूलों से पूजा करनी चाहिये सफेद वस्तु का भोग लगाना चाहिये, जिसमें खीर प्रमुख है।

क्या करें और क्या न करें ?

जैसे विज्ञान भी स्वीकार करता है कि सूर्य की धूप शरीर के लिये लाभदायी होती है और उससे शरीर को ऊर्जा तथा विटामिन डी मिलती है। वैसे ही शरद पूर्णिमा की रात को चांद की रोशनी भी अमृत तुल्य किरणों से ऊर्जा बरसाती है। इसे औषधीय गुणों वाली रात्रि भी कहा जाता है और इस रात को ग्रहण की गई वस्तु औषधीय लाभ प्रदान करती है।

इस दिन सूर्यास्त के बाद पवित्र नदी में स्नान करके देवी लक्ष्मी की पूजा करनी चाहिये और दक्षिणावर्ती शंख से महालक्ष्मी तथा भगवान विष्णु का अभिषेक करना चाहिये। शंख में केसर मिश्रित दूध डालकर भगवान को स्नान कराना चाहिये। महालक्ष्मी के मंत्र का 108 बार जाप करना चाहिये। कमल के गट्टे की माला से यह जाप करना फलदायी होता है। भगवान सत्यनारायण की कथा भी करवा सकते हैं। पूर्णिमा की शाम शिवलिंग के पास दीप जला कर ऊं नमः शिवाय का 108 बार जाप करना चाहिये। हनुमानजी के समक्ष सरसों के तेल का दीप जलाना चाहिये और उन्हें पान, सुपारी, लौंग अर्पित करनी चाहिये। तुलसी के पास दीप जलाना चाहिये, परंतु ध्यान रहे सूर्यास्त के बाद तुलसी को स्पर्श नहीं करना चाहिये। पूजा के बाद खीर का भोग लगाएं और छत पर या खुले स्थान पर पकाई गई तथा रखी गई खीर पर कुछ देर तक चंद्र की रोशनी पड़ने के बाद उसे खाने से स्वास्थ्य को अत्यंत लाभ प्राप्त होता है। इस दिन काम, क्रोध, मांस भक्षण मदिरापान जैसे दूषणों का सेवन करने से बचना चाहिये। संभव हो तो जागरण करना चाहिये और कुछ देर चांद की रोशनी में अवश्य बैठें। ऐसा करने से मन को शांति मिलती है।

Article Categories:
News

Comments are closed.

Shares