राहुल की NYAY का न्यायोचित निष्कर्ष : गरीबों का भला होगा या नहीं, भगवान जाने, मगर देश के इन 6 करोड़ लोगों की जेब अवश्य कटेगी !

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कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने लोकसभा चुनाव 2019 में देश के 25 करोड़ गरीबों के वोट पाने के लिए न्यूनतम् आय योजना (NYAY) लागू करने की घोषणा तो कर दी, परंतु मान लीजिए यदि 23 मई के बाद देश में कांग्रेस की सरकार बनी और वादे के मुताबिक न्याय लागू हुई, तो देश के उन लगभग 6 करोड़ लोगों की जेब अवश्य कटेगी, जो ईमानदार करदाता हैं। फरवरी-2019 तक के आँकड़ों के मुताबिक देश में करदाताओं की संख्या छह करोड़ से ज्यादा है।

यह निष्कर्ष इस बात से निकला है कि न्याय लागू करने के लिए वार्षिक लगभग 3.60 लाख करोड़ (3600000000000) रुपए की आवश्यकता पड़ेगी और निश्चित रूप से यह रकम करदाताओं से ही एकत्र की जाएगी। कांग्रेस की न्याय के प्रावधानों के अनुसार इस योजना के तहत देश के प्रत्येक नागरिक की न्यूनतम् मासिक आय 12,000 रुपए सुनिश्चित की जाएगी। कांग्रेस का मानना है कि देश में जो 20 प्रतिशत गरीब हैं, उनकी वर्तमान मासिक आय लगभग औसत 6,000 रुपए है। ऐसे में न्याय के तहत इन लोगों को कांग्रेस की सरकार प्रतिमाह शेष 6000 रुपए देगी। इसका अर्थ है इस योजना पर कांग्रेस प्रत्येक गरीब के लिए वार्षिक 72,000 रुपए खर्च करेगी।

वर्तमान नरेन्द्र मोदी सरकार किसानों को वार्षिक 6,000 रुपये की आर्थिक मदद दे रही है और यह पैसा सीधे किसानों के बैंक खातों में डाल रही है। इससे सरकारी कोष पर 75000 करोड़ रुपये का आर्थिक भार पड़ रहा है। वर्तमान सरकार की इसी योजना को परास्त करने के लिये कांग्रेस ने गरीब परिवारों को मासिक 6,000 रुपये देने का वादा तो कर दिया है, लेकिन अब सवाल यह उठता है कि ऐसा करने के लिये उसे कम से कम 3.60 लाख करोड़ रुपये की जरूरत पड़ेगी। यह पैसा वह कहां से लाएगी ?

वॉल स्ट्रीट ब्रोकरेज बैंक ऑफ अमेरिका के निवेश बैंकिंग व वित्त प्रबंधन प्रभाग Merrill Lynch ने अपनी एक अध्ययन रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि जनता पर भारी टैक्स लादे बिना या बॉण्ड के जरिये धन जुटाए बिना इस योजना के लिये पैसा जुटाना असंभव है। इसका मतलब यह हुआ कि अगर कांग्रेस सत्ता में आती है और वादे के मुताबिक इस न्याय योजना को लागू करती है तो उसे देश की करदाता जनता के कंधों पर भारी करों का भार लादना पड़ेगा। दूसरा रास्ता यह है कि वह बॉण्ड जारी करके धन जुटाए और इस योजना को लागू करने के लिये पैसा इकट्ठा करे। कांग्रेस की न्याय योजना जिस युनिवर्सल बेज़्ड इनकम ( UBI) से प्रेरित है, उस न्याय को लागू करने से सकल घरेलु उत्पाद (GDP) दर पर बढ़ सकती है?

मेरिल लिंच की अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक सरकार जीडीपी खर्च 1.2 से 1.5 प्रतिशत खर्च बढ़ सकता है। रिपोर्ट में चेतावनी भी दी गई है कि इस तरह के नकद अंतरण से मुद्रास्फीति पर दबाव बढ़ सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस योजना के लिये सरकार को प्रत्यक्ष कर संग्रह में कम से कम 6.4 प्रतिशत बढ़ोतरी करके राजकोषीय घाटे की पूर्ति करनी पड़ेगी। इस तरह की वृद्धि व्यक्तिगत और कंपनी कर दोनों तरह की दरों में करनी पड़ेगी। प्रत्यक्ष कर संग्रह में अधिकांश राशि प्रत्यक्ष करदाताओं से आती है, इससे निवेश पर प्रभाव नहीं पड़ेगा, लेकिन केन्द्रीय उत्पाद शुल्क में वृद्धि की तो गरीबों पर ही बोझ बढ़ेगा। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि यह भी देखना पड़ेगा कि खाद्यान्न सब्सिडी या रोजगार गारन्टी योजना मनरेगा पर खर्च होने वाले 2 लाख करोड़ रुपये को इस प्रस्तावित योजना में शामिल किया जाएगा या नहीं। इसके अलावा सरकार के पास पैसा जुटाने का एक और उपाय बॉण्ड हो सकता है। जरूरत के मुताबिक सरकार बॉण्ड जारी करके पैसा जुटा सकती है और लाभार्थियों को योजना का लाभ दे सकती है।

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