यह VIDEO देखने के बाद हर मतदाता NOTA बटन दबाने से पहले यह सोचने पर विवश हो जाएगा कि उसे ‘सारथी’ कृष्ण बनना है या ‘पलायनवादी’ बलराम ?

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लोकतंत्र में जब चुनाव होता है, तो आम जनता यानी मतदाता अपना मतदान कर अपने लिए नए प्रतिनिधि और नई सरकार चुनते हैं। देश इस समय चुनाव के ऐसे ही मुँहाने पर खड़ा है, जहाँ जनता को यह सुनिश्चित करना है कि 2019 से 2024 तक के लिए उसके अपने संसदीय क्षेत्र का सांसद कौन होगा और उसके अपने देश का प्रधानमंत्री कौन होगा ?

हमारे देश में स्वतंत्रता के साथ ही लोकतांत्रिक शासन पद्धति अपनाई गई और पहली बार देश की जनता को सांसद और सरकार चुनने का अवसर मिला वर्ष 1951 में और उसके साथ एवं बाद राज्यों की विधानसभा चुनावों का भी सिलसिला शुरू हुआ। 1951 से लेकर नवम्बर-2013 से पहले तक देश में लोकसभा के 17 चुनाव हुए और राज्य विधानसभाओं के लिए अनगिनत वोटिंग हुई।

सरकारों, शासन करने वाले राजनीतिक दलों और उनके नेताओं के तथाकथित नाकारापन के चलते देश में पहली बार यह मांग उठी कि मतदाताओं को कोई ऐसा विकल्प भी दिया जाए कि वह किसी भी प्रत्याशी को वोट न देकर भी अपने मताधिकार का प्रयोग कर सके। चुनाव आयोग (EC) ने अपनी यह अवधारणा 2009 में उच्चतम् न्यायालय (SC) के समक्ष रखी और लम्बे वाद-विवाद के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 27 सितम्बर, 2013 को इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) में नन ऑफ द अबॉव (NOTA) को एक उम्मीदवार, प्रत्याशी, कैंडिडेट के रूप में जगह मिली। देश में पहली बार इस नोटा का उपयोग 11 नवम्बर से 4 दिसम्बर, 2013 के दौरान हुए पाँच राज्यों दिल्ली, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ, राजस्थान और मिज़रोम विधानसभा चुनावों में किया गया।

अब बात करते हैं लोकसभा चुनाव 2014 की। यह देश का पहला लोकसभा चुनाव था, जिसमें ईवीएम में नोटा का विकल्प था और नेताओं के नाकारापन से परेशान मतदाताओं ने इसका उपयोग भी किया। देश में चुनावों पर नज़र रखने वाले संगठन एसोसिएशन फॉर डेमोक्रैटिक रिफॉर्म्स (ADR) की रिपोर्ट के अनुसार लोकसभा चुनाव 2014 में नरेन्द्र मोदी के पक्ष में आंधी होने के बावजूद कुल 60,02,942 मतदाताओं ने नोटा को वोट देकर स्पष्ट संदेश दिया कि वे देश के किसी भी राजनीतिक दल और उम्मीदवार को अपना वोट नहीं देना चाहते।

परंतु अब हम जो VIDEO आपको दिखाने जा रहे हैं, उसे देखने के बाद नेताओं से नाराज नोटा महारथी कदाचित लोकसभा चुनाव 2019 में नोटा का बटन दबाने से पहले एक बार सोचने पर अवश्य विवश हो जाएँगे कि उन्हें अपने जीवन में कृष्ण बनना अच्छा लगेगा या दाऊ बलराम बनना ? दरअसल यह वीडियो बी. आर. चौपड़ा निर्मित धारावाहिक महाभारत का है, जिसमें 18 दिनों तक कौरवों और पांडवों के बीच चले भीषण युद्ध के दौरान तीर्थयात्रा पर रहे और दुर्योधन वध के समय पहुँचे बलराम तथा भगवान श्री कृष्ण के बीच संवाद है।

दुर्योधन वध के इस प्रसंग में जब भीम कृष्ण के कहने पर छल-कपटपूर्वक तथा युद्ध के नियमों का उल्लंघन कर दुर्योधन की जंघा पर वार करते हैं, तभी तीर्थयात्रा से लौटे बलराम वहाँ पहुँच जाते हैं। बलराम भीम और दुर्योधन दोनों के ही गुरु थे। बलराम से यह सहन नहीं हुआ कि उनके एक शिष्य भीम ने उनके दूसरे शिष्य दुर्योधन का छल से वध किया। बलराम क्रुद्ध हो गए और उन्होंने भीम का वध करने के उद्देश्य से अपनी गदा उठाई, तभी कृष्ण बीच में आ गए और कृष्ण ने बलराम को जो उपदेश दिया, वह लोकतंत्र के चुनावी पर्व के नोटा महारथियों के लिए महान उपदेश समान है।

आइए सबसे पहले यह जानते हैं कि कृष्ण ने दाऊ बलराम से क्या कहा ? भीम पर प्रहार करने को आतुर दाऊ बलराम को रोकते हुए कृष्ण कहते हैं,‘हे दाऊ, ये न भूलिये कि जब अर्जुन और दुर्योधन दोनों ही इस युद्ध का निमंत्रण लेकर आपके पास आए थे, तब आपने समय की इस चुनौती को स्वीकार नहीं किया था। आप तीर्थ यात्रा पर निकल गए थे दाऊ, तीर्थ यात्रा पर। जब धर्म और अधर्म के बीच युद्ध होने जा रहा, तब केवल एक तीर्थ स्थान रह जाता है दाऊ, केवल एक तीर्थ स्थान रणभूमि। जिस युद्ध से आप भाग गए थे दाऊ, उसके अंतिम क्षणों में आकर अपना प्रभाव डालने का प्रयत्न न कीजिए।’ यहाँ कृष्ण अपने बड़े भाई को जो उपदेश दे रहे हैं, उसका सीधा अर्थ यह निकलता है कि सत्य और असत्य की लड़ाई में दाऊ बलराम को निष्पक्ष नहीं रहना चाहिए था। ऐसा करके वे इतिहास में युद्ध से भागने वाले पलायनवादी सिद्ध हुए, जबकि कृष्ण ने स्वयं को महारथी सिद्ध किया।

इस प्रसंग को नोटा के साथ इसलिए जोड़ कर देखा जा सकता है, क्योंकि जब किसी अच्छे या बुरे कार्य के निर्णय की घड़ी हो, तब व्यक्ति को कोई एक पक्ष अवश्य लेना चाहिए। ऐसे में जबकि देश को एक अच्छी सरकार की महती आवश्यकता है, तब देश के हर मतदाता का यह दायित्व बन जाता है कि वह उस सरकार के चुनाव में अपने मत से सहभागी बने। नोटा का उपयोग कर अपने मत को व्यर्थ न जाने दे। यह मतदाता के विवेक पर निर्भर करता है कि वह वाद-विवाद, अच्छे-बुरे, सही-गलत, उचित-अनुचित का विवेक प्राप्त कर किसी भी पार्टी और उसके नेता को वोट अवश्य दे, ताकि देश को एक मजबूत सरकार मिले और उसमें उस मतदाता का भी योगदान हो। अन्यथा यह निश्चित है कि नोटा का उपयोग करने वालों को किसी सरकार, नेता या पार्टी को सही-गलत ठहराने का अधिकार नहीं है। इसलिए लोकतंत्र के इस चुनावी संग्राम से बलराम की तरह भागें नहीं, अपितु कृष्ण की तरह उसमें सहभागी बनें। अब यह प्रत्येक मतदाता को तय करना है कि वह नोटा का उपयोग कर भगौड़े बलराम बनना चाहता है या फिर रणभूमि में परिस्थितियों का अकर्ता भाव से डट कर सामना करने वाला कृष्ण बनना चाहता है।

आप भी यदि नोटा प्रेमी हैं, तो एक बार अवश्य इस प्रसंग को देख-सुन लीजिए और फिर निर्णय कीजिए कि नोटा का उपयोग करना चाहिए या नहीं ?

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