कटु सत्य : ‘धन’ की ‘धुन’ होती, तो ‘निर्धनता’ में ‘धन्यता’ की ‘धुनी’ नहीं रमाते साईंबाबा

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आलेख : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 15 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। ‘कानजीभाई बिल्कुल ठीक कह रहे हैं, साईंबाबा अपनी पूरी ज़िंदगी ग़रीबों के लिए और ग़रीबी में जिए। जब तक वे ज़िंदा रहे, तेल की एक-एक बूंद के लिए दर-ब-दर भटकते रहे और आज उनके मरने के बाद उनके लिए करोड़ों का सिंहासन, सोने का मुकुट, किसलिए ?’

यह संवाद (डायलॉग) है वर्ष 2012 में आई बॉलीवुड फिल्म ‘ओह माय गॉड’ (OH MY GOD) यानी ओएमजी (OMG) का है। फिल्म में यह डायलॉग एक पुजारी की भूमिका अदा कर रहे अरुण बलि कहते हैं। आज यह डायलॉग इसलिए स्मरण हो आया, क्योंकि ओएमजी में अरुण बलि जिन साईंबाबा के बारे में बात कर रहे हैं, आज उनका 101वाँ निर्वाण (अंतर्ध्यान) दिवस है। 15 अक्टूबर का दिन किसी भी साधारण व्यक्ति के लिए जन्म दिवस, जन्म जयंती या पुण्यतिथि हो सकते हैं, परंतु किसी भी महान संत के लिए उसके जन्म दिवस के दिन को जयंती नहीं, अपितु प्रागट्य दिवस और निधन दिवस को निर्वाण या अंतर्ध्यान दिवस कहा जाता है। इसीलिए हम महान संत और युग पुरुष साईंबाबा के निधन दिवस को उनका निर्वाण दिवस या अंतर्ध्यान दिवस कह रहे हैं।

वर्तमान में साईंबाबा नाम सुनते ही महाराष्ट्र में स्थित शिर्डी और वहाँ बने भव्य मंदिर, उसमें स्थापित साईंबाबा की स्वर्णाभूषणों से मढ़ी हुई दिव्य मूर्ति, लाखों साईंभक्तों की भीड़, धन चुका कर दर्शन करने के अभिलाषी लोगों की कतार, श्रद्धा, विश्वास और भक्तिभाव से सज्ज निर्धन लोगों की लम्बी-लम्बी कतार, भोजन-प्रसादी, तरह-तरह के साहित्य-पुस्तकों का विक्रय आदि दृश्य नेत्रों के सामने उभर आते हैं, परंतु तरह-तरह की मनोकामनाओं के साथ शिर्डी स्थित साईंबाबा मंदिर में भगवान साईंबाबा के दर्शन करने के लिए पहुँचने वाले इन लाखों लोगों की इस भीड़ में से कितने लोग साईंबाबा के निर्धनतापूर्ण और संघर्षपूर्ण जीवन के बीच परम् तत्व ईश्वरीय सत्य का दर्शन कर पाते हैं ? अपने श्रद्धेय साईंबाबा के नाम पर कभी उनके सोने के सिंहासन, तो कभी सोने के मुकुट और कभी नकद राशि में अरबों रुपए का दान करने वालों से आज साईंबाबा के निर्वाण दिवस पर एक ही प्रश्न है, ‘जिस धन-दौलत से साईंबाबा को स्नान कराया जा रहा है, क्या स्वयं साईंबाबा ने अपने संपूर्ण 82 वर्ष के जीवनकाल में उस धन-दौलत से कभी भी प्रेम किया था ? क्या साईंबाबा को धन की लालसा थी ? लोगों के मन में ईश्वर के प्रति विश्वास जागृत करने का लक्ष्य रखने वाले साईंबाबा चाहते, तो अपने चमत्कारों के माध्यम से लाखों रुपए, सोना-चांदी, भूमि आदि स्थायी-अस्थायी सम्पत्ति एकत्र कर सकते थे, परंतु उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया ? क्यों साईंबाबा ने पूरा जीवन निर्धनता में बिताया तथा केवल और केवल मानवता को ही अपना धर्म बनाया ? ’ इन कटु प्रश्नों का उत्तर कदाचित साईंबाबा के उन अनुयायियों के पास नहीं होगा, जो उन्हें सोने-चांदी से लाद रहे हैं। यद्यपि साईंबाबा को उनके सत्य स्वरूप में पहचानने वाले अवश्य ही समझ सकते हैं कि साईंबाबा के जीवन का वास्तविक संदेश मानव कल्याण था, न कि धन-सम्पदा।

कौन थे साईंबाबा और कैसे पड़ा नाम ?

साईंबाबा का जन्म 28 सितम्बर, 1836 को हुआ था। इनके जन्म स्थान को लेकर कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है। इनके आरंभिक जीवन को लेकर कई तरह के रहस्य और मान्यताएँ हैं, परंतु अधिकांश विवरणों के अनुसार साईंबाबा का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था, जिन्हें बाद में एक सूफ़ी फ़क़ीर ने गोद ले लिया था। यद्यपि साईंबाबा ने बाद में स्वयं को एक हिन्दू गुरु का शिष्य बताया। इनके नाम की उत्पत्ति साईं शब्द से हुई है। साईं एक फ़ारसी शब्द है, जिसका मूलत: मुस्लिम लोग उपयोग करते हैं। साईं का अर्थ होता है पूज्य व्यक्ति और हिन्दी शब्द बाबा का अर्थ पिता होता है। साईंबाबा आगे चल कर पूरे देश में भारतीय आध्यात्मिक गुरु, योगी और फ़कीर के रूप में प्रसिद्ध हुए। साईं बाबा को कोई चमत्कारी पुरुष, तो कोई दैवीय अवतार मानता है, परंतु कोई भी उन पर यह सवाल नहीं उठाता कि वे हिन्दू थे या मुस्लिम। यद्यपि युवाPRESS का मत है कि साईंबाबा ने जाति-पाँति तथा धर्म की सीमाओं से ऊपर उठ कर एक विशुद्ध संत की तस्‍वीर प्रस्‍तुत की थी। वे सभी जीवात्माओं की पुकार सुनने व उनके कल्‍याण के लिए पृथ्वी पर अवतीर्ण हुए थे। साईंबाबा समूचे भारत के हिन्दू-मुस्लिम श्रद्धालुओं तथा अमेरिका और कैरेबियन जैसे दूरदराज़ के क्षेत्रों में रहने वाले कुछ समुदायों के भी प्रिय थे।

शिर्डी पहुँचे और आरंभ की धन्यता की धुन

अब आते हैं शीर्षक पर। साईंबाबा पर यदि धन की धुन सवार होती, तो वे निर्धनतापूर्ण जीवन में धन्यता की धुनी नहीं रमाते। साईंबाबा वर्ष 1858 (अनुमानित) में महाराष्ट्र के तत्कालीन छोटे-से गाँव शिर्डी आए। आज तो शिर्डी साईंधाम (बड़ा और विख्यात धार्मिक शहर) का पर्याय बन चुका है, परंतु साईंबाबा जब शिर्डी आए थे, तब यह एक छोटा-सा गाँव हुआ करता था। मुस्लिम टोपी पहनने वाले साईंबाबा ने शिर्डी आने के बाद एक निर्जन मस्जिद को अपना निवास स्थान बनाया। इसी निर्जन मस्जिद में साईंबाबा कुछ सूफ़ी परम्पराओं के पुराने रिवाज़ों के अनुसार धुनी रमाते थे। इस निर्जन मस्जिद का नाम उन्होंने ‘द्वारकामाई’ रखा था, जिससे स्पष्ट है कि साईंबाबा के चित्त में हिन्दू या मुस्लिम जैसा कोई धर्म नहीं था। कहा जाता है कि साईंबाबा को पुराणों, भगवद् गीता और हिन्दू दर्शन की विभिन्न शाखाओं का व्यापक ज्ञान था। ‘श्रद्धा और सबूरी’ (धैर्य-संयम) उनके विचार-दर्शन का सार है। साईंबाबा का मत था कि कोई भी इंसान अपार धैर्य व सच्ची श्रद्धा की भावना रख कर ही ईश्वर की प्राप्ति कर सकता है। ‘सबका मालिक एक है’ के उद्घोष वाक्य से साईंबाबा ने सम्पूर्ण विश्व को सर्वशक्तिमान ईश्वर के स्वरूप का बाह्य साक्षात्कार कराया और साथ ही अपने भीतर ईश्वर का साक्षात्कार करने का मार्ग भी दिखाया।

‘मैं चमत्कार करता हूँ, इसलिए कृष्ण नहीं हूँ’

फिर आते हैं ओह माय गॉड फिल्म के एक और डायलॉग पर। फिल्म के अंतिम भाग के एक दृश्य में जब कानजीभाई (परेश रावल) अस्पताल के बिस्तर पर होते हैं, तब कृष्ण वसुदेव यादव (अक्षय कुमार) कानजीभाई को अपने ईश्वरीय स्वरूप का दर्शन कराते हैं। तब कानजीभाई कहते हैं, ‘इसका मतलब है कि भगवान है।’ इसी संवाद के दौरान कृष्ण वसुदेव यादव कहते हैं, ‘कानजीभाई, मैं चमत्कार करता हूँ, इसलिए कृष्ण नहीं हूँ। मैं कृष्ण हूँ, इसलिए चमत्कार करता हूँ।’ यह डायलॉग इसलिए यहाँ महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि साईंबाबा ने अपने जीवन में कई चमत्कार किए थे। उनके चमत्कारों के कारण ही वे लोगों में भगवान की तरह पूजनीय बन गए और आज भी सच्ची श्रद्धा और भक्ति से उनका स्मरण करने वालों के जीवन में चमत्कार होते हैं, परंतु जहाँ तक दान-धन-सम्पदा का प्रश्न है, तो साईंबाबा यदि चाहते, तो जिन चमत्कारों के बल पर अरबों का धन जुटा सकते थे, परंतु उन्होंने अपने जीवन में चमत्कारों के जरिए केवल दु:खी और पीड़ित निर्धन लोगों की सहायता की। बदले में उन्होंने न तो कभी किसी से कुछ मांगा और न ही लिया। उन्होंने भिक्षा मांग कर पूरा जीवन बिताया। वे एक सच्चे संत थे। उनकी आँखों में जो दिव्य चमक थी, वह स्पष्ट रूप से कहती थी कि साईंबाबा न केवल ईश्वर से साक्षात्कार कर चुके थे, अपितु स्वयं ईश्वर के साथ एकाकार हो चुके थे। वे चमत्कार करते थे, इसलिए साईंबाबा नहीं थे, अपितु वे ईश्वर थे, इसीलिए चमत्कार करते थे। उनका वास्तविक सत्य और संदेश स्पष्ट था, ‘प्रत्येक मनुष्य का कल्याण, श्रद्धा-विश्वास और ईश्वर की प्राप्ति।’ उन्होंने यदि धन, वैभव और भौतिक सुखों को महत्व दिया होता, तो वे लाखों लोगों की धन्यता की धुनी नहीं रमा पाते।

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