हिन्दी करे पुकार, ‘‘मुझे मेरा ‘चंद्र’ लौटा दो…’’

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* आधुनिकता के नाम पर हिन्दी के साथ खिलवाड़ ?

विशेष टिप्पणी : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 14 सितंबर, 2019 (युवाPRESS)। आज हिन्दी दिवस है। आप सोचिए, हम हमारी भावी पीढ़ी को कैसी हिन्दी देने जा रहे हैं ? जिसे हिन्दी नहीं आती, वह भी हिन्दी के साथ वह खिलवाड़ नहीं करता, जो आज स्वयं को हिन्दी के तथाकथित सेवक के रूप में पेश करने वाले लोग कर रहे हैं। हिन्दी एक ऐसी भाषा है, जिसका लेखन पूर्णत: बोली यानी उच्चारण पर आधारित है, परंतु समस्या तब जन्म लेती है, जब उच्चारण और लेखन में अंतर आ जाए। यह हिन्दी का दुर्भाग्य है कि तथाकथित हिन्दी सेवकों ने भी आधुनिकता के नाम पर हिन्दी भाषा से उसका ‘चंद्र’ छीन कर न केवल हिन्दी के साथ अन्याय और खिलवाड़ किया है, अपितु अपने पाठकों और दर्शकों और भावी पीढ़ी के समक्ष घोर अज्ञान परोसने के भागीदार बने हैं।

जी हाँ। हम बात कर रहे हैं हिन्दी के उन तथाकथित सेवकों की, जिन्होंने हिन्दी को अपना धंधा तो बना लिया, परंतु धर्म नहीं बनाया। टेलीविज़न, संचार और इंटरनेट की दुनिया के आगमन के बाद पूरी दुनिया को लगा कि भारत में बहुसंख्य लोग हिन्दी ही समझते हैं। ऐसे में एक ओर जहाँ विदेशी व्यवसायियों ने अपने व्यावसायिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए हिन्दी को हथियार बनाया, वहीं सबसे बड़ा क्षेत्र यानी समाचार माध्यम (MEDIA) में भी हिन्दी की आवश्यकता, अनिवार्यता और उपयोगिता का विकास हुआ। आज हम बात उस मीडिया तक ही सीमित रखना चाहते हैं, जो वर्तमान काल में सबकी पहुँच में है और देश के लोग अधिकांश वही हिन्दी पढ़ते हैं, जो हिन्दी मीडिया से आती है। अब मीडिया भी कई प्रकार के हो चुके हैं। कभी प्रिंट मीडिया ही अकेला था, जिसमें दैनिक, साप्ताहिक या मासिक समाचार पत्र, सामयिक छपते थे, परंतु आज न्यूज़ चैनलों के रूप में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और इंटरनेट पर वेब मीडिया का भी प्रचलन तेजी से बढ़ा है और लोगों को मोबाइल पर अपनी ही हिन्दी भाषा में सहज समाचार तथा अन्य कई जानकारियाँ मिल रही हैं।

सेवा के नाम पर मेवा की अंधी दौड़ ने छीना चंद्र

अधिकांश मीडिया हाउस अपनी हिन्दी सेवा आरंभ करते समय यह दंभ दिखाने का प्रयास करते हैं कि वे हिन्दी की सेवा करने का प्रयास कर रहे हैं, परंतु वास्तव में इसके पीछे उनकी मंशा भारत में हिन्दी को जानने, समझने और पढ़ सकने वाला बड़ा वर्ग होता है, जिसके माध्यम से वे धन कमाने का लक्ष्य रखते हैं। यही कारण है कि ऐसे लोग हिन्दी के साथ, उसके उच्चारण और लेखन के साथ निश्चिंत होकर धड़ल्ले से खिलवाड़ कर रहे हैं। सहिष्णु भाषा मानी जाने वाली हिन्दी में उर्दू का संक्रमण तो सदियों पहले हो चुका था, फिर पश्चिम की आंधी ने हिन्दी में अंग्रेजी की भी मिलावट कर दी। यहाँ तक तो ठीक था। बोल-चाल की भाषा में जो शब्द चलन-प्रचलन में हो, उसका उपयोग करने में न हिन्दी को कोई आपत्ति है और न ही सच्चे हिन्दी सेवक को, परंतु घोर अनर्थ और अन्याय तब हो गया, जब समाचार पत्रों-न्यूज़ चैनलों से लेकर न्यूज़ पोर्टलों तक ने हिन्दी से उसका ‘चंद्र’ छीन लिया। हिन्दी में अन्य भाषा के शब्दों के उपयोग से अर्थ का अनर्थ नहीं होता, परंतु उच्चारण और लेखन में समानता की विशिष्टता लिए हिन्दी से चंद्र को लुप्त करके हिन्दी के तथाकथित सेवकों ने केवल अपना ही उल्लू सीधा किया है। आधुनिकता और त्वरितता की दौड़ में ये लोग भूल गए कि हिन्दी भाषा में एक ‘चंद्र’ का होना और न होना कितना बड़ा अर्थ का अनर्थ कर सकता है ? इन तथाकथित सेवकों की दृष्टि में बिंदु और चंद्रबिंदु का अंतर बहुत ही हल्का अंतर है, परंतु वास्तविकता क्या है, िससे हम आपको आगे परिचित कराएँगे।

धिक्कार है अज्ञान परोस रहे हिन्दी सेवकों पर

देश के एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र के न्यूज वेब पोर्टल पर परोसी गई अशुद्ध हिन्दी, जिसमें ‘हँस-हँस’ की जगह, ‘हंस-हंस’ लिखा है। हँस-हँस शुद्ध शब्द है, जबकि हंस पक्षी होता है।
ऐसी ही अशुद्धता देश के एक प्रतिष्ठित हिन्दी न्यूज़ चैनल ने भी की।

आइए, अब आपको बताते हैं कि हिन्दी के तथाकथित सेवकों ने उसके माथे से चंद्र का मुकुट उतार कर किस तरह घोर अनर्थ किया है ? वास्तव में हिन्दी में बिन्दु का बहुत महत्व होता है। इस बिन्दु को अनुस्वार कहते हैं, परंतु हर शब्द पर बिन्दु का ही उपयोग करना हिन्दी भाषा की टांग तोड़ने के समान है। हम जिस चंद्र की बात कर रहे हैं, वह है हिन्दी भाषा के अनेक अक्षरों पर लगने वाली अर्धचंद्राकार में समाहित बिन्दु यानी चंद्रबिंदु, जिसे अनुनासिक कहते हैं। आज के दौर की हिन्दी में केवल बिन्दु रह गया है, चंद्रबिन्दु लुप्त कर दिया गया है, परंतु ऐसा करने वाले यह भूल जाते हैं कि यह हिन्दी की मूल अवधारणा पर वज्राघात है। एक उदाहरण से समझिए। कोई चुटकुला सुनने के बाद आपके चेहरे पर क्या होगी ? उत्तर है ‘हँसी’, परंतु दुर्भाग्य देखिए कि आज मूल शब्द को ‘हंसी’ लिख दिया जाता है। हँसना शब्द में ह पर चंद्रबिन्दु ही लगेगे, क्योंकि इसके उच्चारण में छिपा आधा न ह के साथ है, ह के बाद नहीं। यदि हंसना (हन्सना) लिखेंगे, तो ह के बाद आधा न आएगा और फिर स आएगा। इसे हंस और हँस से भी समझ सकते हैं। हंस एक पक्षी है, जबकि हँस ऐसा शब्द है, जो हम किसी को करने के लिए कह सकते हैं। उदाहरण के तौर पर आप अपने मित्र को कोई चुटकुला सुना कर उससे कह सकते हैं, ‘हँस’। इसी प्रकार किसी व्यक्ति का नाम बंटी है, तो इसका उच्चारण करते समय मुँह से पहले ब, फिर आधा न और ट तथा ई की मात्रा निकलेगी और यह बंटी कहलाएगा, परंतु यदि पोशाकों का वितरण हुआ हो, उसे पोशाकें ‘बँटी’ लिखा जाएगा, न कि पोशाकें ‘बंटी’, क्योंकि बँटी में ब के साथ आधा ण जुड़ा हुआ है और उसके बाद ट तथा ई आते हैं। ऐसे में पोशाकें बँटी की जगह बंटी लिखना, अर्थ का अनर्थ ही कहलाएगा। ऐसे कई उदाहरण हैं, जो हिन्दी में बिन्दी और चंद्रबिन्दी के अत्यंत महत्वपूर्ण अंतर और अर्थ-परिवर्तन को प्रदर्शित करते हैं। अत: हिन्दी के सच्चे सेवकों से हमारा अनुरोध है कि वे हिन्दी को उसका चंद्र लौट दें और वास्तविक सेवक बन जाएँ।

युवाप्रेस का अभय वचन और अनुरोध

yuvapress.com अपनी हिन्दी सेवा की इस यात्रा में अपने सभी पाठकों को यह अभय वचन देता है कि वह अपने हर लेखन में हिन्दी की शुद्धता बनाए रखेगा, उस पर अशुद्धता का ग्रहण नहीं लगने देगा और हिन्दी का सदैव उसके चंद्रबिंदु के साथ ही प्रयोग करेगा। इस वेबसाइट के किसी भी समाचार में हम अनुस्वार यानी बिन्दु (ं) और अनुनासिक यानी चंद्रबिंदु (ँ) का शब्दों के उच्चारण के अनुरूप प्रयोग करते आए हैं, करते रहे हैं, कर रहे हैं और करते रहेंगे। युवाप्रेस.कॉम साथ ही देश के सभी हिन्दी मीडिया हाउसेज़ से भी अनुरोध करता है कि वे हिन्दी दिवस पर हिन्दी को उसका चंद्रबिंदु लौटाने का प्रण लें और देश के सामने तथा भावी पीढ़ी के समक्ष सही हिन्दी परोसने के युवाप्रेस.कॉम के महानयज्ञ में अपना योगदान करें।

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