2 करोड़ गुजरातियों के ‘रक्त-संघर्ष’ से सजाई गई ‘थाली’, तब जाकर ‘परोसा’ गया गुजरात : पढ़िए ‘गुजरात’ बनने का पूरा इतिहास

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गुजरातियों के ‘संकल्प’ के सामने नतमस्तक हो गई नेहरू की ‘नकारात्मक सोच’ और मोरारजी की ‘मुंबई माया’ !

आलेख : कन्हैया कोष्टी

गुजरात आज यानी बुधवार 1 मई, 2019 को अपना 60वाँ स्थापना दिवस मना रहा है। गुजरात की स्थापना 1 मई, 1960 को हुई थी और गुजरात आज पूरे 59 वर्ष का हो गया। आज जिस गुजरात का पूरे विश्व में बोलबाला है, उस गुजरात को प्राप्त करने के लिए पूर्वजों ने महान बलिदान दिया, जिससे कदाचित आज के गुज्जूभाई पूरी तरह परिचित नहीं होंगे। आज के समृद्ध और विकसित कहे जाने वाले गुजरात में आज हर गुजराती स्वायत्तता की साँस ले पा रहा है, तो उसके पीछे 67 वर्ष पहले 2 करोड़ गुजरातियों की ओर से जगाई गई वह चिनगारी है, जो महागुजरात आंदोलन के रूप में ज्वाला बनी और 7 वर्षों के लम्बे संघर्ष के बाद बृहन्मुंबई राज्य से पृथक गुजरात राज्य की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ।

गुजरात में आज प्रत्येक समुदाय के लोग पूर्णतः साम्प्रदायिक-जातिगत सौहार्द से और शांतिपूर्वक रहते हैं और गुजरात में रहने वाला हर व्यक्ति विशुद्ध गुजराती है। यही भावना 67 वर्ष पूर्व के गुजरात में भी थी, जब 2 करोड़ गुजरातियों ने पृथक गुजरात के लिए महागुजरात आंदोलन छेड़ा था। इस आंदोलन में हर गुजराती, चाहे वह हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई क्यों न हो, ने भाग लिया था।

यद्यपि आज जिस गुजरात पर हर गुजराती गर्व करता है, वह गुजरातियों को यूँ ही नहीं परोस दिया गया था। गुजरातियों को अपना गुजरात पाने के लिए केन्द्र की तत्कालीन जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के विरुद्ध भारी संघर्ष करना पड़ा था। गुजरातियों ने अपने रक्त और संघर्ष से जब थाली सजाई, तब जाकर परोसा गया गुजरात। भारत और चीन के बीच हुए युद्ध के बाद जिस प्रकार लता मंगेशकर ने जरा याद करो कुर्बानी…. गीत को अपना सुर देकर देश की जनता का आह्वान किया था कि वह शहीदों की कुर्बानी को अपने दिलों में संजोए रखे, उसे भूले नहीं। यह गीत केवल किसी एक युद्ध तक सीमित नहीं हो सकता। हर उस आंदोलन के बाद उसमें आहूति देने वालों को याद करने के लिए प्रेरित करने वाले इस गीत को गुजरात स्थापना दिवस पर प्रत्येक गुजराती को बार-बार याद करना चाहिए, क्योंकि आज जिस खुशहाल गुजरात में हम जी रहे हैं, वह कड़े संघर्षों और अनेक बलिदानों के बाद अस्तित्व में आया था।

अस्मिता पर अड़ गए गुजराती

बात पचास के दशक की है। गुजरात के लोगों को अपनी अस्मिता के साथ समझौता मंजूर नहीं था। इसीलिए द्विभाषी राज्य मुंबई के प्रस्ताव के विरुद्ध महागुजरात आंदोलन की आवश्यकता पड़ी। आज जहाँ गुजरात के साम्प्रदायिक ताने-बाने को बार-बार विभिन्न दंगों की दुहाई देकर चुनौती दी जाती है, वहीं गुजरात की स्थापना के लिए हुए आंदोलन में हर धर्म और जाति के लोगों ने एक गुजराती के रूप में भाग लिया था। उस महागुजरात आंदोलन के दौरान गुजरात में हिन्दू-मुस्लिम एकता पूरे भारत के सामने एक मिसाल बनी थी।

कांग्रेस के प्रस्ताव ने जगाई चिनगारी

स्वतंत्रता के बाद भारत में विविधभाषी जनता की अस्मिता बनाए रखने के लिए भाषाई राज्यों की स्थापना का विचार रखा गया। 1953 में कांग्रेस के हैदराबाद अधिवेशन में भाषाई राज्यों की स्थापना का प्रस्ताव पारित किया गया। बस यहीं से पृथक गुजरात की आशा बंधी और चिनगारी भी जगी। गुजरातियों ने सपना संजोया कि उनका भी अपना एक राज्य होगा, लेकिन पृथक गुजरात की उम्मीदों पर मोरारजी देसाई ने यह कह कर पानी फेर दिया कि बृहन्मुंबई राज्य में मुंबई जैसे विविधभाषी शहर को किसी एक राज्य का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता। देसाई के इस विचार से गुजरात की जनता में रोष फैल गया। केंद्र सरकार ने बीच का रास्ता निकालते हुए महाराष्ट्र, मुंबई और गुजरात नामक तीन राज्यों और तीनों के लिए एक ही उच्च न्यायालय का प्रस्ताव रखा। इस प्रस्ताव का महाराष्ट्र में गलत संकेत गया। वहाँ के लोगों नो सोचा कि गुजराती लोग मुंबई को महाराष्ट्र से अलग रखना चाहते हैं। 7 अगस्त, 1956 को केंद्र सरकार और जवाहर लाल नेहरू की नकारात्मक सोच और मोरारजी देसाई की मुंबई की माया ने महाराष्ट्र और गुजरात के मतभेदों को देखते हुए गुजरात सहित मुंबई को द्विभाषी राज्य बनाने का फैसला किया। इस फैसले ने अपना गुजरात का सपना संजोए गुजरातियों पर वज्राघात किया, क्योंकि इस फैसले से पृथक गुजरात का सपना चकनाचूर हो गया। यहीं से शुरू हुआ महागुजरात आंदोलन।

मोरारजी के विरुद्ध भड़क उठा गुजरात

गुजरात मोरारजी देसाई का यह कहना था कि बिना मुंबई के गुजरात एक दिन भी नहीं चल सकेगा। गुजरात टूट जाएगा। विकास ठप हो जाएगा। देसाई के इस मत से गुजरात कांग्रेस के कई नेता असहमत थे, परंतु देसाई के विरुद्ध बोलने का किसी में साहस नहीं था। केंद्र सरकार के इस गुजरात विरोधी फैसले के समय गुजरात कांग्रेस नेतृत्व मूकप्रेक्षक बना रहा, लेकिन जनता में जबर्दस्त प्रतिक्रिया हुई। 7 अगस्त, 1956 को ही कुछ विद्यार्थी अहमदाबाद में भद्र स्थित कांग्रेस हाउस पर पहुँचे और कांग्रेस नेता ठाकोरभाई देसाई से मिले। 8 अगस्त को पूर्ण हड़ताल का आह्वान किया गया।

8 अगस्त, 1956 : गुजरातियों के लिए काला दिन, जब 12 युवक शहीद हुए

उधर दिल्ली में उसी दिन यानी 8 अगस्त, 1956 को लोकसभा ने द्विभाषी मुंबई राज्य का प्रस्ताव पारित कर दिया। 8 अगस्त का यह दिन गुजरात के लिए काला दिन साबित हुआ। इसके विरुद्ध हजारों छात्र भद्र स्थित कांग्रेस हाउस पर इकट्ठा हुए और केंद्र के विरुद्ध प्रदर्शन करने लगे। इसी बीच कांग्रेस हाउस से गोलियाँ चलीं। इस सरकारी हिंसा में सात से आठ छात्र शहीद हो गए तथा अनेक घायल हुए। इनमें हिन्दू-मुस्लिम दोनों ही कौम के छात्र थे। इस हिंसा के बाद शहर भर में द्विभाषी मुंबई राज्य का विरोध शुरू हो गया। पूर्ण हड़ताल के आह्वान के बीच छात्रों का बड़ा जुलूस खाडिया पहुंचा और माहौल ‘महागुजरात ले के रहेंगे’ के नारों से गूंज उठा। 8 और 9 अगस्त को जबर्दस्त दंगे हुए तथा सरकारी सम्पत्तियों में तोडफ़ोड़ व आगजनी की गई। हरिहर खंभोलजा, हरीप्रसाद व्यास तथा प्रबोध रावल ने खुली जीप में शहर का दौरा कर छात्रों से शांति की अपील की। इन दंगों में करीब 12 लोग शहीद हुए और 80 जने घायल हुए। शाहपुर में सरकार विरोधी प्रदर्शन के बीच भडक़ी हिंसा के बाद 10 अगस्त को करफ्यू लगा दिया गया। कर्फ्यू उल्लंघन के दौरान 5 लोग पुलिस की गोली के शिकार हुए तथा 45 घायल हुए।

पूरे गुजरात में फैली आंदोलन की आग, मोरारजी की सभा में सन्नाटा

अगले दिन 10 अगस्त, 1956 को अखबारों ने स्पष्ट कर दिया कि महागुजरात आंदोलन अब अहमदाबाद तक सीमित नहीं रहा। नडिय़ाद, जूनागढ़, वडोदरा, सायला (सुरेन्द्रनगर), भावनगर, डाकोर (खेडा), पालनपुर (बनासकांठा), बोटाद (भावनगर), सूरत, राजकोट, अमरेली, पारडी (नवसारी), बावला (अहमदाबाद), भुज (कच्छ), आणंद सहित पूरे गुजरात में इसकी गूंज शुरू हो गई। मोरारजी देसाई के प्रति गुजरात के लोगों में भारी गुस्सा था। 19 अगस्त, 1956 को घोषणा हुई कि कांग्रेस हाउस पर मोरारजी देसाई द्विभाषी मुंबई राज्य के अपने मत पर सफाई देंगे। इससे माहौल और गरमा गया। उनकी सभा के दिन पूरे शहर में जनता करफ्यू का ऐलान कर दिया गया। यह ऐलान पूरी तरह सफल रहा। सडक़ें वीरान रहीं, बाजार बंद रहे। देसाई की सभा में कोई नहीं पहुंचा।

इंदूलाल याज्ञिक को बागडोर

अब तक महागुजरात आंदोलन एक निश्चित नेतृत्व के अभाव में अलग-अलग तरीके से चल रहा था। इसे एक निश्चित दिशा देने के लिए 9 सितंबर, 1956 को अहमदाबाद में खाडिया स्थित औदिच्य की वाड़ी में सुबह बड़ी भीड़ जमा हुई और वहाँ महागुजरात जनता परिषद् का गठन किया गया। ब्रह्मकुमार भट्ट इसके संयोजक रहे, लेकिन अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी तेज-तर्रार भाषण शैली के लिए मशहूर इंदूलाल याज्ञिक को सौंपी गई। परिषद् के गठन के बाद आंदोलन को जबर्दस्त गति मिली। याज्ञिक के उत्तेजक भाषणों ने पूरे गुजरात को संगठित बनाया। परिषद् के नेतृत्व में करीब चार साल आंदोलन चलता रहा। धरने-प्रदर्शन-नारेबाजी-लाठीवार-गोलीबारी में कइयों ने प्राणों की आहूति दी और अनेक घायल हुए।

जीवराज मेहता बने मुख्यमंत्री

अंतत: केंद्र सरकार ने 27 अगस्त, 1959 को लोकसभा में द्विभाषी मुंबई राज्य से पृथक गुजरात के निर्माण का प्रस्ताव रखा। 1957 में हुए चुनाव में कांग्रेस को मिली जीत के बाद यशवंतराव चव्हाण मुंबई के मुख्यमंत्री थे, जबकि जीवराज मेहता वित्त मंत्री थे। लोकसभा में प्रस्ताव पारित हो गया। पृथक गुजरात विधानसभा में कांग्रेस का बहुमत था, अत: जीवराज मेहता को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला किया गया। जब लोकसभा ने पृथक गुजरात के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी, तब इंदूलाल याज्ञिक ने विसनगर (मेहसाणा) में महागुजरात जनता परिषद् की आखिरी बैठक बुलाई और इसे भंग कर दिया। कई लोगों ने परिषद् के जरिए राजनीति में आने की बात कही, परंतु इसे स्वीकार नहीं किया गया।

साबरमती आश्रम में प्रथम मंत्रिमंडल की शपथ

17 अप्रेल, 1960 को मुंबई से विशेष ट्रेनों में सचिवालय कर्मचारियों, सैकड़ों टाइपराइटरों, कागज के पार्सलों आदि को अहमदाबाद लाया गया। 19 अप्रेल को लोकसभा ने मुंबई राज्य विभाजन का विधेयक पारित किया गया। 23 अप्रेल को राज्यसभा ने भी इसे मंजूर कर लिया। 25 अप्रेल को गुजरात मंत्रिमंडल की घोषणा हुई। इसी दिन राष्ट्रपति ने विधेयक को मंजूरी दे दी। आंध्र प्रदेश के मेहंदी नवाज जंग को राज्यपाल बनाया गया। 30 अप्रेल को जीवराज मेहता सरकार के स्वागत के लिए अहमदाबाद में लालदरवाजा सरदार बाग में जनसभा हुई और 1 मई, 1960 को साबरमती स्थित गांधी आश्रम में जीवराज मेहता ने प्रथम मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण की।

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