खन्ना जैसे खैरखाँ और शेषन जैसे शूरवीर भी नहीं भेद सके भाजपा का यह मजबूत किला, अब किले का करतार ही बन गया उम्मीदवार : पढ़िए रोचक इतिहास इस किले का

Written by

गांधीनगर। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने आज गुजरात की राजधानी के नाम से बनी गांधीनगर लोकसभा सीट से भारी शक्ति प्रदर्शन के साथ नामांकन पत्र दाखिल कर दिया। पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ रहे शाह ने पार्टी के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी की विरासत को संजोए रखने और आगे बढ़ाने का उद्घोष करते हुए नामांकन पत्र दाखिल किया। उनके साथ गृह मंत्री राजनाथ सिंह, एनडीए नेता उद्धव ठाकरे, प्रकाश सिंह बादल, राम विलास पासवान, गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी और गुजरात भाजपा अध्यक्ष जीतू वाघाणी सहित बड़ी संख्या में नेता-कार्यकर्ता मौजूद थे।

गांधीनगर संसदीय सीट पिछले 30 वर्षों से भाजपा का ऐसा अभेद्य किला बनी हुई है। भाजपा का यह ऐसा मजबूत दुर्ग है, जिसे अपने ज़माने के और बॉलीवुड के प्रथम सुपर स्टार राजेश खन्ना और भारत में चुनाव सुधारों के जनक माने जाने वाले पू्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी. एन. शेषन भी भेद नहीं पाये।

आइये अब गांधीनगर लोकसभा सीट के बीजेपी का गढ़ बनने के रोमांचक इतिहास पर नजर डालते हैं।
गांधीनगर लोकसभा सीट 1960 में गुजरात राज्य की स्थापना के बाद 1967 में पहली बार अस्तित्व में आई। शुरुआती दौर में इस सीट पर कांग्रेस का दबदबा रहा। 1967 के पहले और 1971 के दूसरे चुनाव में कांग्रेस के सोमचंद सोलंकी लगातार दो बार सांसद चुने गए, परंतु 1977 में भाजपा के पूर्ववर्ती संगठन भारतीय लोकदल (BLD) ने कांग्रेस के इस किले को ढहा दिया और पुरुषोत्तम मावलंकर सांसद चुने गए। हालांकि 1980 में कांग्रेस ने फिर एक बार गांधीनगर सीट पर कब्जा कर लिया और उसके उम्मीदवार अमृत पटेल विजयी रहे। 1984 में भी कांग्रेस के जी. आई. पटेल ही जीते, परंतु 1989 से कांग्रेस ने यह सीट गँवाना शुरू किया, तो आज तक उसे गांधीनगर सीट पुनः हासिल करने में सफलता हासिल नहीं हुई।

AB VAJPAYEE *** Local Caption *** AB VAJPAYEE

वाघेला से वाजपेयी तक भाजपा का दबदबा

लोकसभा चुनाव 1989 में समग्र देश में कांग्रेस विरोधी लहर थी और कांग्रेस की राजीव गांधी सरकार को हटाने के लिए भाजपा तथा जनता दल ने गठबंधन किया। गुजरात में भी भाजपा-जद गठबंधन के तहत गांधीनगर सीट भाजपा के हिस्से आई और भाजपा ने पहली बार गांधीनगर सीट जीती। भाजपा उम्मीदवार शंकरसिंह वाघेला ने कांग्रेस से यह सीट ऐसी छीनी कि वह इसे दोबारा हासिल करने का केवल सपना ही देखती रही। हालाँकि उसने इस सीट को भाजपा से छीनने के लिए राजेश खन्ना और टी. एन. शेषन जैसी हस्तियों का सहारा लिया, परंतु सफलता नहीं मिली।

लोकसभा चुनाव 1991 में भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी को जब लगा कि वे दिल्ली में कांग्रेस उम्मीदवार व बॉलीवुड सुपरस्टार राजेश खन्ना से चुनाव हार सकते हैं, तो उन्होंने गांधीनगर से भी नामांकन पत्र दाखिल किया। वही हुआ, जिसका संदेह आडवाणी को था। आडवाणी दिल्ली से हार गए, लेकिन गांधीनगर की जनता ने भाजपा और आडवाणी पर जीत की मुहर लगाई।’

लोकसभा चुनाव 1996 में भाजपा के सबसे बड़े नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने भी दो सीटों से चुनाव लड़ने का निर्णय किया। वाजपेयी ने गांधीनगर और लखनऊ लोकसभा सीटों से चुनाव लड़ा और दोनों ही सीटों पर जीत हासिल की। इस चुनाव में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनी और वाजपेयी पहली बार देश के प्रधानमंत्री बने। हालाँकि वाजपेयी को एक सीट छोड़नी थी। उन्होंने लखनऊ से सांसद रहना उचित समझा और गांधीनगर सीट से त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद हुए उप चुनाव में भाजपा ने यहाँ से अपने दिग्गज नेता और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष हरिश्चंद्र पटेल के पुत्र विजय पटेल को चुनाव मैदान में उतारा। कांग्रेस को लगा कि विजय पटेल जाना-माना चेहरा नहीं है। ऐसे में उप चुनाव में गांधीनगर पर कब्जा करने का सबसे श्रेष्ठ अवसर है। इसलिए कांग्रेस ने विजय पटेल के मुकाबले राजेश खन्ना को चुनाव मैदान में उतारा, लेकिन राजेश खन्ना भी कांग्रेस की झोली में यह सीट न डाल सके और विजय पटेल विजयी हुए।

लोकसभा चुनाव 1998 से 2014 तक भाजपा की ओर से आडवाणी ही गांधीनगर से लगातार चुनाव लड़ रहे थे। इस दौरान 1999 में आडवाणी का सामना पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी. एन. शेषन से हुआ। शेषन को चुनाव मैदान में उतारकर कांग्रेस ने भाजपा को उसके गढ़ में कड़ी चुनौती देने की कोशिश जरूर की लेकिन उसे फिर विफलता ही हाथ लगी।

किला बनाने वाले अब खुद मैदान में

गांधीनगर को भाजपा का मजबूत किला बनाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई अमित शाह ने और अब वे स्वयं इस किले में अपनी चुनावी किस्मत आजमाने के लिए मैदान में हैं। अमित शाह को वर्तमान में भाजपा का चाणक्य कहा जाता है। जब अयोध्या में विवादित ढांच ढहाने के लिये आडवाणी सोमनाथ से अयोध्या तक राम रथ यात्रा निकाल कर हिन्दू हृदय सम्राट बने थे, तब नरेन्द्र मोदी भी उनके साथ थे। मोदी ने ही नई दिल्ली में राजेश खन्ना से हारने के बाद आडवाणी को गांधीनगर से चुनाव लड़ने की सलाह दी थी और तब अमित शाह उनके चुनाव प्रचार के प्रभारी बने थे। जब आडवाणी ने यहां से उम्मीदवारी की, तब अटल बिहारी वाजपेयी ने उनसे कहा था कि यह सीट आपके लिये माला सिन्हा के गाल जैसी है। मोदी की सलाह पर ही तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष आडवाणी ने शंकरसिंह वाघेला से गांधीनगर की सीट खाली करवाई थी। तब से ही मोदी और वाघेला के रिश्तों में तनाव पैदा हो गया था। दूसरी तरफ 1996 में शाह को गांधीनगर सीट का संयोजक बनाया गया था औऱ इस तरह वे पिछले 23 साल से इस सीट के संयोजक की भूमिका निभाते आ रहे हैं। भाजपा के चाणक्य कहलाने वाले शाह का चुनाव प्रबंधन में कोई जवाब नहीं है। 2014 के लोकसभा चुनाव में उनके नेतृत्व में भाजपा ने गुजरात की सभी 26 सीटों पर केसरिया लहराया और यूपी में भी 80 में से 73 सीटें भाजपा को जिताकर वह भाजपा के चुनावी चाणक्य बन गये।

Article Categories:
News

Leave a Reply

Shares