जानते हैं आपका एक वोट कितना मूल्यवान है ? एक वोट के कारण वाजपेयी को सत्ता गँवानी पड़ी, इसलिए वादों पर नहीं, विकास पर मतदान करना जरूरी

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लोकसभा चुनाव 2019 की दुंदुभि बज चुकी है। प्रत्येक राजनीतिक दल अपने पाले में अधिक से अधिक लोगों का मत खींचने की कवायद में जुटा है, लेकिन कई भारतीय मतदाताओं की मानसिकता कुछ ऐसी है कि वे वोटिंग डे के हॉलिडे समझते हैं और अपने शक्तिशाली वोट को जाया कर देते हैं।

इतिहास के पन्ने पलटें, तो पता चलता है कि लोकतंत्र में एक वोट का क्या और कितना महत्व होता है। यह एक वोट की ही ताकत थी कि दुनिया को हिटलर युग देखने पर विवश होना पड़ा, तो अटलजी जैसे महापुरुष को अपनी सत्ता गँवानी पड़ी।

आइए नजर डालते हैं एक वोट के महत्व को दर्शाने वाली कुछ ऐतिहासिक घटनाओं पर :

अटल बिहारी वाजपेयी, सी. पी. जोशी और एडोल्फ हिटलर (फाइल तसवीरें)

वाजपेयी सरकार गिरी

वर्ष 1999 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की 13 महीने पुरानी सरकार से जयललिता के नेतृत्व वाली अखिल भारतीय अन्नाद्रविड मुनेत्र कषगम (AIADMK) ने समर्थन वापस ले लिया। वाजपेयी ने संसद में विश्वास प्रस्ताव रखा। प्रस्ताव के पक्ष में 269 और विरोध में 270 वोट पड़े और इस तरह 1 वोट से वाजपेयी सरकार गिर गई।

माँ और पत्नी ने वोट डाला होता, तो जोशी मुख्यमंत्री होते

राजस्थान विधानसभा चुनाव 2008 में कांग्रेस के दिग्गज नेता सी. पी. जोशी मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार थे। इस चुनाव में कांग्रेस ने 96 सीटें जीतीं, लेकिन जोशी सिर्फ 1 वोट से चुनाव हार गए। जोशी को 62 हजार 215 वोट मिले, जबकि उनके निकटतम् प्रतिद्वंद्वी भाजपा के कल्याण सिंह को 62 हजार 216 वोट हासिल हुए। राज्य में सरकार तो कांग्रेस की बनी, लेकिन जोशी पराजय के कारण मुख्यमंत्री नहीं बन सके। जोशी का दुर्भाग्य देखिए कि इस चुनाव में स्वयं जोशी की माता, पत्नी और ड्राइवर ने वोट नहीं डाला था। यदि इनमें से किन्हीं दो व्यक्तियों ने भी वोट डाल दिया होता, तो जोशी कदाचित मुख्यमंत्री बन जाते।

ड्राइवर ने कराई कृष्णमूर्ति की छुट्टी

कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2004 में जनता दल (सेकुलर) यानी JDS उम्मीदवार ए. आर. कृष्णमूर्ति को कांग्रेस के के. आर. ध्रुवनारायण ने 1 वोट से हराया था। कृष्णमूर्ति को 40 हजार 751, जबकि ध्रुवनारायण को 40 हजार 752 वोट मिले थे। कृष्णमूर्ति के ड्राइवर ने छुट्टी होने के कारण वोट नहीं डाला।

तो अमेरिका की मातृभाषा जर्मन होती

वर्ष 1776 की बात है। अमेरिका में आज मातृभाषा अंग्रेजी है। यदि एक वोट अधिक पड़ता, तो अमेरिका की राजभाषा जर्मन होती। एक वोट की बदौलत ही अमेरिका में जर्मन की बजाए अंग्रेजी मातृभाषा होती। अमेरिका में ही 1910 में रपब्लिक उम्मीदवार की एक वोट से हार के बाद पार्टी शोक में डूब गई थी।

एक वोट ने रदरफोर्ड को रंक से राजा बना दिया

1878 में अमेरिका में हुए राष्ट्रपति चुनाव में रदरफोर्ड बी हायेस ने सैमुअल टिलडेन को 1 वोट से हरा कर राष्ट्रपति चुनाव जीता। रुदरफोर्ड को 185 वोट मिले, जबकि टिलडेन के वोटो का आँकड़ा 184 पर अटक गया।

फ्रांस में एक वोट ने किया लोकतंत्र का उदय

फ्रांस में तो 1 वोट ने सत्ता और तंत्र का रूप ही बदल डाला। 1875 में एक वोट की जीत से फ्रांस में राजाशाही समाप्त हुई और लोकतंत्र का उदय हुआ। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि एक वोट की शक्ति कितनी होती है। यदि यह एक वोट न होता, तो फ्रांस के लोग अब भी राजाशाही ढो रहे होते।

एक वोट ने दिया आतताई हिटलर

जर्मनी के लोग एक वोट की ताकत को बखूबी समझते-जानते हैं, क्योंकि 1923 में एडोल्फ हिटलर केवल 1 वोट की जीत से अपनी नाज़ी पार्टी का अध्यक्ष चुना गया और फिर जर्मनी का तानाशाह बना। हिटलर जैसा क्रूर तानाशाह 1 वोट की कमी ने दुनिया को दिया, जिसने नागाशाकी और हिरोसिमा को तबाह किया।

हमें आशा है कि आप अब अपने 1 वोट की कीमत अच्छी तरह समझ गए होंगे और लोकसभा चुनाव 2019 में अपने मतदान क्षेत्र में निर्धारित तारीख को अवश्य मतदान करेंगे, क्योंकि आपका 1 वोट देश का भाग्य विधाता बन सकता है। हम आप सभी मतदाताओं से यह भी अपील करना चाहेंगे कि राजनीतिक दलों की ओर से किए जाने वाले लोकलुभावन वादों पर ज्यादा भरोसा न करते हुए विकास के नाम पर वोट दें। सोचें और देखें कि विकास के प्रति कौन-सी पार्टी अधिक समर्पित है, उसी को वोट दें और देश की अविरत् विकास यात्रा को आगे बढ़ाने में अपना सहयोग करें।

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