EXCLUSIVE : जानिए उस कृष्ण को, जो हर व्यक्ति को ‘कृष्ण’ बनाने की 100% गारंटी देते हैं…

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आलेख : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 24 अगस्त, 2019 (युवाPRESS)। भारत सहित पूरी दुनिया में हिन्दू धर्म में आस्था रखने वाले लोग भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव मना रहे हैं। 5 हजार से अधिक वर्ष पूर्व भगवान विष्णु के 22वें अवतार के रूप में कृष्ण ने कारावास में जन्म लिया था। भगवन श्री कृष्ण ने जहाँ अपनी लीलाओं से हजारों लोगों के मन में भक्ति की अलख जगाई, वहीं अपने गीता उपदेश से भक्ति में लीन लोगों को वह दुर्लभ मार्ग भी दिखाया, जिस पर चल कर हर व्यक्ति स्वयं कृष्ण बन सकता है। धरती पर भगवान कृष्ण ने गीता का जो उपदेश दिया, यदि उसके संक्षिप्त सार को समझा जाए, तो कृष्ण ऐसे जगत् गुरु हैं, जो मानव योनि में जन्म लेने वाले किसी भी जाति-धर्म के हर व्यक्ति को अपने जैसा यानी साक्षात् कृष्ण बनाने की शत प्रतिशत गारंटी देते हैं।

भारत की धरती पर ऐसा कोई कालखंड नहीं था, जब महापुरुषों ने जन्म न लिया हो। भारतीय वैदिक-सनातन धर्म और संस्कृति के अनुसार आधुनिक विज्ञान से कहीं अधिक विकसित भारत की प्राचीन संस्कृति है। यही कारण है कि जिसे आज पौराणिक मान्यता कह कर निरस्त कर दिया जाता है, वह सतयुग, त्रेतायुग और द्वापरयुग वास्तव में कोई युग थे। हर युग में भगवान विष्णु ने अधर्मियों, पापियों, दुष्टों और असुरों का संहार करने के लिए अवतार लिए, जिनमें कई अंशावतारों के अलावा राम और कृष्ण जैसे पूर्णावतार भी शामिल हैं। भारतीय दर्शन के अनुसार सतयुग की आयु 17 लाख 28 हजार वर्ष थी, तो त्रेतायुग की आयु 12 लाख 96 हजार और द्वापर की आयु 8 लाख 64 हजार वर्ष थी। वर्तमान में चल रहे कलयुग की आयु 4 लाख 32 हजार वर्ष है।

अथाह ज्ञान के भंडार का निचोड़ 700 श्लोकों में दिया

हर युग में बीते हुए युग के सिद्धांत धीरे-धीरे चमक गँवाने लगते हैं और इसीलिए भगवान विष्णु को धर्म, सिद्धांत और मानव जीवन को नई दिशा देने के लिए अवतार लेने पड़ते हैं। जब भगवान कृष्ण ने त्रेता युग में जन्म लिया, तब मृत्युलोक में मानव जीवन को दिशा-निर्देश देने वाले और मानव जीवन के परम लक्ष्य मोक्ष का संदेश देने वाले 18 पुराण और 108 उपनिषद् अस्तित्व में थे, परंतु तत्कालीन आधुनिक युग की ओर भाग रहा मानव श्रुतियों के रूप में (लिखित में नहीं) उपलब्ध 18 पुराणों और 108 उपनिषदों में समाहित ज्ञान की परम्परा को आगे नहीं बढ़ा पा रहा था। यही कारण है कि भगवान कृष्ण ने द्वापर युग में महाभारत के युद्ध के समय वीर अर्जुन को माध्यम बनाते हुए जगत को गीता का उपदेश दिया। यद्यपि महर्षि वेदव्यास ने ब्रह्माजी से श्रुति के रूप में उत्पन्न पुराणों को 4 वेदों में बाँटा। इसके बाद 108 उपनिषदों की रचना की। महर्षि वेदव्यास ने ही महाभारत ग्रंथ की भी रचना की, जिसमें श्रीमद् भगवद गीता शामिल है। भगवान कृष्ण ने महाभारत के युद्ध से पहले अर्जुन के समक्ष जिस गीता का ज्ञान वर्णित किया, उसमें 18 पुराणों, 4 वेदों और 108 उपनिषदों के विशाल ज्ञान भंडार को केवल 700 श्लोकों में समेट कर भावी पीढ़ी को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की अत्यंत सरल परिभाषा दी।

जीते-जी प्राप्त की जाने वाली दशा अर्थात् मोक्ष

भगवान कृष्ण की आज हम विभिन्न स्वरूपों और साकारों में पूजा करते हैं, परंतु स्वयं भगवान कृष्ण के मुख से निकली वाणी पर विश्वास करें, तो भगवान कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश देते हुए स्पष्ट रूप से कहा था, ‘मैं जैसा दिखता हूँ, वैसा हूँ नहीं।’ कहने का तात्पर्य यह है कि कृष्ण की भक्ति तो उनके साकार स्वरूपों को आधार बना कर की जा सकती है, परंतु स्वयं कृष्ण तक पहुँचने के लिए हमें कृष्ण के उस रूप को पहचानना होगा, जिसका कोई आकार नहीं है, जिसने कभी जन्म नहीं लिया, जिसकी कभी मृत्यु नहीं हुई। कृष्ण के गीता उपदेश के बाद जिस-जिस ने उनके इस उपदेश को अक्षरश: अंगीकार किया, उन सभी ने कृष्ण का वह मूल रूप जाना और संसार में रहते हुए, जीते-जी उस मोक्ष दशा को प्राप्त किया, जिसे लेकर वर्तमान भारत और दुनिया में तरह-तरह की भ्रांतियाँ हैं। अधिकांश लोग मोक्ष शब्द सुनते ही उसका अर्थ मृत्यु से जोड़ देते हैं, परंतु मोक्ष किसी को भी मृत्यु के बाद नहीं मिलता, अपितु मोक्ष एक जीवनमुक्त दशा है। यह वह दशा है, जिसमें भगवान कृष्ण ने 125 वर्ष का जीवन यापन किया। जीवनमुक्त अर्थात् संसार में रहते हुए, हर कर्म करते हुए ईश्वर के उस निराकार (आकाररहित) और निरंजन (अंजन न किया जा सके) रूप में निष्ठ रहना।

कृष्ण का संदेश सबको कृष्ण बनाने की गारंटी

भगवान कृष्ण ने गीता में जो उपदेश या संदेश दिया है, वह दुनिया के हर व्यक्ति को कृष्ण जैसा नहीं, अपितु स्वयं कृष्ण बनने की शत प्रतिशत गारंटी देता है। साकार स्वरूप के अनुयायियों के लिए भले ही कृष्ण आज भी मुरली-मोरपंख धारी कोई अवतारी पुरुष हों, परंतु कृष्ण की गीता के संदेश का अनुकरण करने वालों को कृष्ण ने अपने एक-एक श्लोक के जरिए स्वयं कृष्ण बनने का मार्ग दिखाया है। जब महाभारत के युद्ध से पहले अपने सगे-संबंधियों के मोह में आकंठ डूबे अर्जुन ने शस्त्र डाल दिए, तब कृष्ण ने अर्जुन से केवल इतना ही कहा, ‘सभी धर्मों का त्याग कर एकमात्र मेरी शरण में आ जा। मैं तुझे हर पाप से मुक्त कर दूँगा। मुझमें ध्यान केन्द्रित कर और मोह के चक्रव्यूह को तोड़ते हुए हर शत्रु का नि:संकोच व निर्भय होकर संहार कर दे।’ कृष्ण ने पाँच हजार वर्ष पहले अर्जुन को यह उपदेश दिया, जो आज की आपाधापी जीवनशैली में अशांति का पर्याय बन चुके हर मनुष्य को शांति की ओर ले जाने में सक्षम है। कृष्ण ने अर्जुन को न किसी तरह का संन्यास लेने को नहीं कहा। कृष्ण ने केवल शरणागत होने की बात कही, जो अर्जुन को 18 अध्याय के बाद समझ में आई। आज का मानव यदि गीता के दूसरे ही अध्याय सांख्य योग को समझ ले, तो उसे शेष 18 अध्याय पढ़ने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। वह कृष्ण ही हैं, जो हर मनुष्य को धर्म, अर्थ, काम से जुड़े कर्म करते हुए जीते-जी मुक्ति, मोक्ष या जीवनमुक्त बना कर साक्षात् कृष्ण बनाने की शत प्रतिशत गारंटी देते हैं। 700 श्लोकों की गीता का कुल मिला कर सार यही है कि पृथ्वी पर विचरण करने वाले 84 लाख योनियों में 83 लाख 99 हजार 999 योनियों के पास कृष्ण यानी परमात्मा या ईश्वर से एकाकार होने का विकल्प नहीं है। इन 83 लाख 99 हजार 999 योनियों में देवताओं से लेकर पशु-पक्षी और कीड़े-मकोड़े-जीव-जंतु सारे शामिल हैं। एकमात्र मनुष्य योनि ऐसी है, जिसे कृष्ण परमात्मा को उसके मूल रूप में जानने और उसमें विलीन होकर मोक्ष दशा की प्राप्ति का अवसर देती है। भगवान कृष्ण ने 18 पुराणों, 4 वेदों, 108 उपनिषदों और संपूर्ण महाभारत में समाहित लाखों श्लोकों और कर्मकांड से लेकर ज्ञानकांड के अथाह भंडार में से केवल 700 श्लोकों के जरिए पूरी दुनिया को स्वयं कृष्ण बनने का मार्ग दिखाया है।

आवश्यकता है एक सद्गुरु की

यद्यपि कृष्ण की इस गीता और उसके संदेश को समझने के लिए एक देहधारी सद्गुरु की आवश्यकता पड़ती है। वह सद्गुरु ऐसा होना चाहिए, जो स्वयं कृष्ण बन चुका हो। अन्यथा केवल गीता ज्ञान परोसने वाले गुरुओं की आज के भारत में कोई कमी नहीं है। जिस व्यक्ति ने कृष्ण परमात्मा के साथ स्वयं को एकाकार किया हो, वही सद्गुरु है। आवश्यक नहीं है कि उसने कोई भगवा चोला पहन रखा हो। ऐसा सद्गुरु आधुनिक वेशभूषा में भी उपलब्ध हो सकता है। जहाँ तक सद्गुरु की खोज का प्रश्न है, तो वह भी कोई मुश्किल काम नहीं है। जो व्यक्ति अपने मानव जीवन के परम लक्ष्य यानी परमानंद की अनुभूति कराने वाली मोक्ष दशा को प्राप्त करना चाहता है और गीता में दिए गए उपदेश के अनुसार स्वयं को एक सद्शिष्य बना लेता है, उसे सद्गुरु की खोज के लिए नहीं निकलना पड़ता। ऐसे सद्शिष्य को स्वयं सद्गुरु खोजते हुए आते हैं।

सद्शिष्य अर्थात् क्या ?

भगवान कृष्ण ने गीता में जो उपदेश दिया है, उसमें सद्शिष्य की परिभाषा भी स्पष्ट रूप से दी है। एक सद्शिष्य को ही यह अधिकार होता है कि वह भगवान कृष्ण परमात्मा को उनके मूल रूप में पहचान सके। कृष्ण ने व्यक्ति को सद्शिष्य बनने के कई उपाय बताए हैं। सद्शिष्य का अर्थ कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है, जिसने संन्यास ग्रहण कर लिया हो, जिसने भगवा धारण कर लिया हो। सद्शिष्य का अर्थ है हर तरह की कामनाओं से मुक्त व्यक्ति। जिसने अपने मन को वश में कर लिया हो, जिसके मन में ईश्वर की प्राप्ति के अलावा कोई विचार न हो, जो अपने जीवन में आने वाले हर कर्म को निष्काम भाव से करता हो, जो मद, मोह, माया, मत्सर आदि षट्रिपुओं से मुक्त हो, जो अपने-पराए, स्त्री-पुरुष, जीव-जगत, जड़-चेतन जैसे तमाम प्रकारों के भेदों से मुक्त हो, जिसका चित्त चंचल न हो, वह ईश्वर प्राप्ति का अधिकारी पात्र बन जाता है। ऐसे अधिकारी पुरुष को ही सद्शिष्य कहा जाता है और उसे सद्गुरु की खोज में नहीं निकलना पड़ता, अपितु ईश्वर स्वयं सद्गुरु उसके पास भेज देते हैं।

कैसे होता है परमात्मा का साक्षात्कार ?

भगवान कृष्ण ने गीता का जो उपदेश अर्जुन को दिया, उस पर स्वयं कभी दावा नहीं किया कि यह उनका ज्ञान है। यह गीता की गंगा हर व्यक्ति को कृष्ण बनाने यानी परमात्मा से साक्षात्कार की ओर ले जाती है। जहाँ तक परमात्मा से साक्षात्कार की बात है, तो यह साक्षात्कार हर व्यक्ति कर सकता है। वैसे किसी व्यक्ति के भीतर परमात्मा दर्शन देने के लिए प्रवेश नहीं करते, क्योंकि ऐसा कोई घट (व्यक्ति) नहीं है, जिसमें परमात्मा न हो। इसका अर्थ यह हुआ कि हम सबके भीतर भी कृष्ण विद्यमान हैं, परंतु हमारा चित्त मलिन होने के कारण हम उनसे साक्षात्कार नहीं कर सकते। गीता का उपदेश देते हुए भगवान कृष्ण अर्जुन को अपने चित्त की मलिनता को स्वच्छ करने को कहते हैं, क्योंकि चित्त में स्वयं परमात्मा साक्षात् हैं, परंतु चूँकि वह राग-द्वेष आदि विकारों से मलिन होता है, इसलिए व्यक्ति को परमात्मा का अनुभव नहीं हो पाता। जैसे ही व्यक्ति अपने चित्त की मलिनता को दूर कर लेता है, सद्गुरु उस व्यक्ति के चित्त पर पड़े अंतिम दोष यानी आवरण दोष को दूर कर देते हैं और चित्त में ही पहले से विद्यमान परमात्मा की अनुभूति करा देते हैं। परमात्मा का हमेशा अनुभव होता है, कभी भी दर्शन नहीं होता, क्योंकि दर्शन हमेशा द्वैत में होता है अर्थात् एक दर्शन करने वाला और एक दर्शन देने वाला, जबकि परमात्मा निर्द्वंद्व हैं। इसीलिए कहा जाता है कि परमात्मा से साक्षात्कार का अर्थ है उसके साथ एकाकार हो जाना, उसमें विलीन हो जाना। व्यक्ति और परमात्मा जब दो नहीं, अपितु एक हो जाते हैं। उसी को अपरोक्षानुभूति भी कहते हैं। अपरोक्षानुभूति यानी वह वस्तु, जिसकी हम तलाश कर रहे थे, परंतु वह हम स्वयं थे। परमात्मा की अपरोक्षानुभूति होते ही व्यक्ति कह उठता है, ‘यह तो स्वयं मैं ही हूँ।’

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