उस आदमी ने ग़लत ट्रेन पकड़ ली, फिर भी उतरने को तैयार नहीं था ! जानिए क्यों ?

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सीटी बजी और ट्रेन चल पड़ी। ट्रेन के चलते ही अनारक्षित डिब्बे में बैठा एक आदमी अचानक ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने और रोने-पीटने लगा। डिब्बा अनारक्षित था। ऐसे में उसमें भीड़ होनी चाहिए थी, परंतु संयोग से यह आदमी जिस डिब्बे में बैठा था, वह काफी हद तक खाली था। रोते-चिल्लाते उस आदमी के सामने बैठी एक वृद्ध महिला ने उससे पूछा कि भैया, क्या तकलीफ है? वह यात्री बोला, मैंने उल्टी दिशा में जा रही ग़लत ट्रेन पकड़ ली है। वृद्धा बोली कि तो मैं तेरी मदद करती हूँ। ट्रेन की चेन खींचती हूँ। ट्रेन रुक जाएगी। तू उतर जाना और तेरे गंतव्य की ओर जाने वाली ट्रेन पकड़ लेना।

वृद्धा के लाख समझाने के बावजूद वह आदमी ग़लत ट्रेन से उतरने को तैयार नहीं हुआ। वह कहने लगा, ‘इस चालू डिब्बे में कितनी सारी सुविधाएँ हैं। डिब्बा खाली है। मैं आराम से बैठ कर-सो कर यात्रा कर सकूँगा। मुझे जो सही ट्रेन पकड़नी है, उसमें क्या मालूम भीड़ हुई तो?’ बस इसी कारण वह आदमी ग़लत गंतव्य की ओर ले जा रही होने के बावजूद उस ट्रेन को छोड़ने को राज़ी नहीं था।

यह कोई वास्तविक या सत्य घटना नहीं है, अपितु केवल एक दृष्टांत है, जो हम सब पर लागू होता है। यह दृष्टांत दिया महान आध्यात्मिक संत स्वामी तद्रूपानंदजी ने। अहमदाबाद में जीएमडीसी कन्वेंशन हॉल में कैडिला फार्मास्युटिकल्स की ओर से इंद्रवदन मोदी और शीलाबेन मोदी की पुण्य स्मृति में आयोजित 7 दिवसीय अष्टावक्र गीता चिंतन सत्र में स्वामी तद्रूपानंद यह दृष्टांत सुना कर संसार के उन सभी लोगों को इंगित करते हुए कहते हैं कि हमारी भी यही दशा है। हमारा गंतव्य आत्मा रूपी स्टेशन है, परंतु हमने ट्रेन वह पकड़ी है, जो संसार की ओर ले जाती है। ग़लत ट्रेन पकड़ने के बावजूद हम संसार रूपी स्टेशन की ओर ले जा रही ट्रेन से उतरना नहीं चाहते, क्योंकि हमें संसार में उपलब्ध भोगों और सुविधाओं का जो मोह है, छोड़ने को हम तैयार नहीं हैं।

क्यों हमें छोड़नी ही पड़ेगी यह ग़लत ट्रेन एक दिन ?

स्वामी तद्रूपानंद ने राजा जनक और अष्टावक्र के संवाद ग्रंथ अष्टावक्र गीता के विभिन्न श्लोकों को उद्घृत करते हुए कहा कि वास्तव में संसार है ही नहीं। ऐसा भी नहीं है कि वह असत्य है, परंतु यह बात डंके की चोट पर कही जा सकती है कि वह सत्य तो तनिक भी नहीं है, क्योंकि संसार हमें केवल जागृत अवस्था में ही अनुभूत होता है। यदि वह सत्य हो, तो गहरी नींद में भी संसार अभिव्यक्त होना चाहिए, जबकि गहरी नींद में हमारे लिए पूरा संसार विलुप्त हो जाता है। ऐसे में संसार को अनिवर्चनीय या मिथ्या की संज्ञा दी जा सकती है, जो एक काल में अनुभूत होता, जबकि दूसरे काल में विलुप्त हो जाता है। संसार यदि है, तो केवल और केवल अधिष्ठान आत्मा पर आरोप है। जैसे ही अधिष्ठान आत्मा का ज्ञान होता है, संसार रूपी आरोप विलुप्त हो जाता है। इसके समर्थन में वर्षों से जो उदाहरण प्रचलित हैं, उसी को दोहराते हुए स्वामी तद्रूपानंद कहते हैं कि जिस प्रकार अंधेरे में रस्सी में सर्प की भ्रांति होती है, ठीक उसी तरह अज्ञान रूपी अंधकार में संसार की भ्रांति होती है और जैसे ही ज्ञान रूपी प्रकाश उपलब्ध होता है, वैसे ही रस्सी में से सर्प और व्यक्ति के चित्त में से संसार विलुप्त हो जाता है। यद्यपि आत्मा को जान लेने वाला व्यक्ति संसार छोड़ कर कहीं नहीं जाता, परंतु वह ऐसा व्यक्ति बन जाता है, जो यह अच्छी तरह समझ चुका होता है कि संसार केवल कल्पना और मिथ्या है और संसार में रह कर वह लोगों के साथ हर व्यवहार करता है, लेकिन निर्लिप्त रह कर। ऐसा संभव है और यह युक्ति शास्त्र-श्रुति और गुरु किसी भी व्यक्ति को भली-भाँति समझा सकते हैं। मनुष्य सहित सभी प्राणियों और समग्र सृष्टि की उत्पत्ति का एकमात्र कारण अधिष्ठान आत्मा, ब्रह्म या ईश्वर है और संसार उसी ईश्वर के कार्य रूप में दिखाई देता है, जो वास्तव में है नहीं। यदि हर वस्तु की उत्पत्ति आत्मा में से हुई है, तो उसका विलय भी आत्मा में ही होना निश्चित है, क्योंकि यह सर्वमान्य सिद्धांत है कि जो वस्तु जहाँ से उत्पन्न होती है, अंत में उसी में विलीन होती है। इसीलिए यदि हमारी उत्पत्ति आत्मा में से हुई है, तो एक न एक दिन हमें उसी ट्रेन को पकड़ना होगा, जो आत्मा रूपी स्टेशन की ओर ले जाएगी। वह दिन कब और कैसे आएगा, यह प्रत्ये व्यक्ति को स्वयं तय करना है।

जनक क्यों स्वयं को ही नमस्कार करते हैं ?

स्वामी तद्रूपानंद ने अष्टावक्र गीता के 11वें श्लोक ‘अहो अहं नमो महां विनाशो यस्य नास्ति मे। ब्रह्मादिस्तंबपर्यन्तम् जगन्नाशेगऽपि तिष्ठत:।।’ को उद्घृत किया अर्थात् इस श्लोक में जनकजी कहते हैं, ‘अहो! (धन्य हूँ), ब्रह्मा से लेकर तृण (तिनके) तक के जगत का नाश होने पर भी जो ‘मैं’ बचता है (रहता है), उस मैं यानी मेरा (कदापि) विनाश नहीं होता। (ऐसे) मुझको नमस्कार हो।’ इसी प्रकार स्वामी तद्रूपानंद ने 12वें श्लोक ‘अहो अहं नमो मह्यमेकोऽहं देहवानपि। क्वचिन्न गन्ता नागन्ता व्याप्य विश्वमवस्थित:।।’ को भी उद्घृत किया। इस श्लोक में जनकजी कहते हैं, ‘अहो ! (आश्चर्य है कि) मुझे ‘मैं’ को (‘अहं को, जो अवस्थात्रय है) नमस्कार हो : देहधारी होने के बावजूद भी मैं एक हूँ, (अद्वितीय हूँ, देह को धारण करने के बावजूद देह से अन्य और एक हूँ), (‘मैं’) कहीं जाता या आता नहीं हूँ। (परंतु) विश्व को व्याप्त करके रहता हूँ।’इन दोनों श्लोक पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं स्वामी तद्रूपानंद कहते हैं कि संसार का प्रत्येक मनुष्य स्वयं ही एक बहुत बड़ी शक्ति है, यदि वह स्वयं को पहचान ले, स्वयं से साक्षात्कार कर ले। वह अपने मूल रूप को यदि पहचान ले, तो उसके लिए या तो पूरा विश्व उसका होगा या पूरे विश्व में उसका कुछ नहीं होगा। जनकजी कहते हैं कि उनसे भिन्न कोई जीव, जगत और ईश्वर है ही नहीं। जनकजी कहते हैं, ‘समग्र विश्व में मैं ही मैं हूँ। मेरे अतिरिक्त कुछ नहीं है। मैं महान हूँ और इसीलिए मैं स्वयं को ही नमस्कार करता हूँ।’ जनकजी का यह कोई अहंकार नहीं है, क्योंकि जिसमें अहंकार होता है, उस देह का तो वह आत्मा रूपी अग्नि से अग्निदाह कर चुके हैं। जनकजी की यह उच्च कोटि की दृष्टि यह दर्शाती है कि प्रत्येक व्यक्ति के भीतर स्थित चैतन्य अधिष्ठान आत्मा को यदि जान लिया जाए, तो फिर व्यक्ति के लिए स्वयं से अलग कोई-कुछ नहीं होता। उसे किसी जीव, जगत और ईश्वर को नमस्कार करने की आवश्यकता नहीं रहती, क्योंकि वह इन तीनों से परे स्वयं को ही नमस्कार करके समग्र सृष्टि-ब्रह्मांड और ईश्वर को स्वतः ही नमस्कार करने में सक्षम होता है।
(गुरु अर्पण)

नोट : अहमदाबाद के युनिवर्सिटी क्षेत्र में आयोजित अष्टावक्र गीता चिंतन सत्र अभी दो दिन और चलेगा। इसका समापन 31 मार्च रविवार को होगा। समय है सायं 5.00 से 7.00 बजे। यदि आप स्वयं को जानना चाहते हैं, यदि आप अपने शरीर से ऊपर उठ कर स्वयं को जानना चाहते हैं, यदि आपके मन में यह प्रश्न उठता है कि आप वास्तव में हैं कौन, तो ऐसे अनेक प्रकार के प्रश्नों के उत्तर इस कार्यक्रम में मिलेंगे और ऐसे प्रश्नकर्ताओं को इस कार्यक्रम में अवश्य शामिल होना चाहिए।

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