पूरे 66 वर्ष 1 माह 13 दिनों बाद अब ठंडी पड़ी होगी मुखर्जी की चिता की आग !

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* जब मुखर्जी कश्मीर में खेल रहे थे ‘ख़ून की होली’

* तब नेहरू ब्रिटेन में मना रहे थे ‘जश्न की दीवाली’

विशेष टिप्पणी : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 6 अगस्त, 2019 (युवाPRESS)। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अगस्त महीने को अगस्त क्रांति के रूप में स्थापित किया, क्योंकि यही वह महीना था, जब गांधीजी के नेतृत्व में भारत ने अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्रता की अंतिम परिणामदायी लड़ाई का सूत्रपात किया था। वह दिन था 9 अगस्त, 1942 का, जब भारत ने ‘अंग्रेजों, भारत छोड़ो’ आंदोलन आरंभ किया और स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही यह आंदोलन समाप्त हुआ। इसीलिए भारत के 1942 के बाद के इतिहास में अगस्त का महीना अगस्त क्रांति के रूप में स्थापित हो गया।

ठीक 77 वर्ष बाद भारत में एक और अगस्त क्रांति हुई है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की जोड़ी ने 5 अगस्त, 2019 को जम्मू-कश्मीर राज्य पुनर्गठन विधेयक प्रस्तुत कर इस अगस्त क्रांति का सूत्रपात किया है। इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर का भारत में 72 वर्षों के बाद वास्तविक विलय हो गया। जम्मू-कश्मीर अब धारा 370 से मुक्त हो चुका है। वह भारत के अन्य 31 राज्यों की तरह 32वाँ राज्य है, तो लद्दाख भी भारतीय राज्यों की सूची में 33वें राज्य के रूप में जुड़ गया है। अब जम्मू-कश्मीर हर आम भारतीय की पहुँच में है।

भारतीय दर्शन शास्त्र के अनुसार कोई व्यक्ति किसी अधूरी इच्छा या अधूरे संकल्प के साथ देहत्याग करता है, तो उसकी आत्मा को शांति नहीं मिलती। भारतीय दर्शन शास्त्र के इस वाक्य में यदि सच्चाई है, तो आज हम यह दावे के साथ कह सकते हैं कि पूरे 66 वर्ष 1 माह और 13 दिनों बाद यानी 5 अगस्त 2019 को डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी की आत्मा को शांति मिल गई होगी। उनकी चिता की धधकती आग अब ठंडी पड़ गई होगी, क्योंकि मुखर्जी ने 23 जुलाई, 1953 को श्रीनगर में शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली सरकार के बनाए गए एक कारागार में देहत्याग किया था, तब उनका संकल्प ‘‘एक देश में दो विधान, दो निशान और दो प्रधान, नहीं चलेगा- नही चलेगा’’ पूरा नहीं हुआ था। 5 अगस्त को मुखर्जी के बलिदान को पूरे 66 वर्ष 1 माह और 13 दिन हुए, जब भारत सरकार यानी मोदी-शाह की जोड़ी ने मुखर्जी का यह नारा साकार किया। ऐसे में कहा जा सकता है कि मुखर्जी की चिता को मुखाग्नि भले 66 साल पहले दे दी गई थी, परंतु उनकी चिता की आग अब ठंडी पड़ी होगी, उनकी आत्मा को अब जाकर शांति मिली होगी।

‘कश्मीर पर कलंक’ के विरुद्ध पहली आवाज़ बने मुखर्जी

जम्मू-कश्मीर से जिस धारा 370 को हटाए जाने के बाद पूरा देश जश्न में डूबा है, वह धारा 70 वर्ष पूर्व 17 अक्टूबर, 1949 को भारतीय संविधान का हिस्सा बनी थी। इस धारा के सभी विवादास्पद प्रावधानों में एक प्रावधान यह भी था कि शेष भारत का कोई भी नागरिक जम्मू-कश्मीर में भारत सरकार से परमिट लिए बिना नहीं जा सकता था। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की ‘कश्मीर पर कलंक’ समान इस सबसे बड़ी भूल के विरुद्ध पहली आवाज़ उठाई थी श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने। उन्होंने उस समय धारा 370 पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा था, “नेहरू जी ने ही ये बार-बार ऐलान किया है कि जम्मू व कश्मीर राज्य का भारत में 100% विलय हो चुका है, फिर भी यह देखकर हैरानी होती है कि इस राज्य में कोई भारत सरकार से परमिट लिए बिना दाखिल नहीं हो सकता। मैं नही समझता कि भारत सरकार को यह हक़ है कि वह किसी को भी भारतीय संघ के किसी हिस्से में जाने से रोक सके क्योंकि खुद नेहरू ऐसा कहते हैं कि इस संघ में जम्मू व कश्मीर भी शामिल है।” मुखर्जी ने विरोध का यह सुर स्वतंत्र भारत के प्रथम नेहरू मंत्रिमंडल के एक सदस्य के रूप में उठाया था और इसकी कीमत उन्हें जान गँवा कर चुकानी पड़ी। मुखर्जी ने कश्मीर को भारत का अविभाज्य अंग बनाने को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया और छेड़ दिया मिशन कश्मीर।

और सर पर कफन बांध कर निकल पड़े मुखर्जी

डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने सबसे पहले नेहरू मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दिया। उन्होंने सबसे पहले जम्मू की प्रजा परिषद् पार्टी के साथ मिल कर आंदोलन छेड़ा। इसके बाद वे पहले हिन्दू महासभा में शामिल हुए, फिर 21 अक्टूबर, 1951 को दिल्ली में भारतीय जनसंघ (वर्तमान भारतीय जनता पार्टी) की स्थापना की। जनसंघ में मुखर्जी के साथ बलराज मधोक, अटल बिहारी वाजपेयी, प्रेमनाथ डोगरा, मौलि चंद्र शर्मा जैसे दिग्गज नेता शामिल थे। जनसंघ की स्थापना के साथ मुखर्जी ने धारा 370 के विरुद्ध आंदोलन तेज कर दिया और 8 मई, 1953 को भारत सरकार से परमिट लिए बिना वे कश्मीर के लिए रवाना हो गए। मुखर्जी सुबह 6.30 बजे दिल्ली रेलवे स्टेशन से पैसेंजर ट्रेन में सवार होकर अपने अग्निपथ के लिए निकल पड़े। उनके साथ बलराज मधोक, वाजपेयी, टेकचंद, गुरुदत्त वैध और कुछ पत्रकार भी थे। रास्ते में जगह-जगह मुखर्जी का लोग ज़ोरदार अभिवादन कर रहे थे। जगह-जगह मुखर्जी की झलक पाने के लिए लोगों का सैलाब उमड़ रहा था। जब ट्रेन जालंधर पहुँची, तो मुखर्जी ने बलराज मधोक को वापस भेज दिया और अमृतसर के लिए दूसरी ट्रेन पकड़ी।

शेख अब्दुल्ला की साज़िश में फँसे मुखर्जी !

जब मुखर्जी ने धारा 370 के विरुद्ध आंदोलन छेड़ा, तब जम्मू-कश्मीर लगभग एक स्वतंत्र राज्य था। उसका अपना संविधान था। मुख्यमंत्री (शेख अब्दुल्ला) को वज़ीर-ए-आज़म (प्रधानमंत्री) कहा जाता था। जम्मू-कश्मीर भारत की सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधिकार क्षेत्र में नहीं आता था। धारा 370 के रूप में मिले इन्हीं विशेष स्वायत्तताओं का दुरुपयोग करते हुए शेख अब्दुल्ला ने मुखर्जी के विरुद्ध एक बड़ी साज़िश पहले ही रच दी थी। दरअसल हुआ यूँ कि जब मुखर्जी ने जालंधर से अमृतसर के लिए ट्रेन पकड़ी, तब ट्रेन में सवार एक बुज़ुर्ग व्यक्ति ने खुद को गुरदासपुर का डिप्टी कमिश्नर बताया और कहा, ‘पंजाब सरकार ने फ़ैसला किया है कि आपको पठानकोट न पहुंचने दिया जाए। मैं अपनी सरकार से निर्देश का इंतज़ार कर रहा हूँ कि आपको कहाँ गिरफ्तार किया जाए?’ आश्चर्य की बात यह थी कि वह सरकारी अधिकारी निर्देश का इंतज़ार करता रह गया। मुखर्जी को न अमृतसर और न ही पठान कोट में गिरफ्तार किया गया। गुरदासपुर का वह डिप्टी कमिश्नर उस समय अत्यंत आश्चर्यचकित रह गया, जब उसे यह निर्देश मिला कि मुखर्जी व उनके सहयोगियों को आगे बढ़ने दिया जाए और बिना परमिट जम्मू-कश्मीर में प्रवेश करने दिया जाए। बस, यहीं से शेख अब्दुल्ला की साज़िश की शुरुआत हुई।

शेख अब्दुल्ला ने पहले ही लिख दी थी गिरफ़्तारी की स्क्रिप्ट

आज कश्मीर को अपनी जागीर समझने की जो दो बड़े नेता हिमाक़त कर रहे हैं, उनके बाप-दादा ही मुखर्जी की जान के दुश्मन बने हुए थे। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं फारूक़ अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला की। फारूक़ के पिता व उमर के दादा शेख अब्दुल्ला ने एक सोची-समझी साज़िश के तहत मुखर्जी को कश्मीर में बिना परमिट प्रवेश करने दिया। शेख अब्दुल्ला का ही यह षड्यंत्र था कि मुखर्जी को भारतीय संविधान और सुप्रीम कोर्ट के दायरे से निकल कर जम्मू-कश्मीर आ जाने दिया जाए। मुखर्जी का अगला पड़ाव रावी नदी पर बसे माधोपुर की सीमा के पास चेकपोस्ट था। पंजाब और जम्मू-कश्मीर की सीमा को बनाते हुए बहने वाली रावी नदी के आर-पार जाने के लिए सड़क वाला एक पुल था और पंजाब तथा जम्मू-कश्मीर की सीमाएँ इस पुल के बीचों-बीच थी। जैसे ही मुखर्जी की जीप इस पुल पर बीचों-बीच पहुंची, उन्होंने अपने सामने जम्मू-कश्मीर पुलिस की जीप को देखा। पुलिस की जीप से खुद को कठुआ पुलिस अधीक्षक (SP) बताने वाला एक पुलिस अधिकारी उतरा। उसने जम्मू-कश्मीर के मुख्य सचिव का 10 मई, 1953 का एक आदेश सौंपा, जिसमें मुखर्जी के जम्मू-कश्मीर प्रवेश पर प्रतिबंध की बात लिखी हुई थी। इसके बाद कठुआ एसपी ने मुखर्जी की गिरफ्तारी का आदेश भी जेब से निकाला, जिसमें जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन पुलिस महानिरीक्षक पृथ्वीनंदन सिंह के 10 मई, 1953 को किए गए हस्ताक्षर थे। इस आदेश में कहा गया था कि डॉ. मुखर्जी ने ऐसी गतिविधि की है, कर रहे हैं या करने वाले हैं, जो सार्वजनिक सुरक्षा व शांति के विरुद्ध है। अत: उन्हें गिरफ्तार करने का आदेश दिया जाता है।

और वह इंजेक्शन मुखर्जी को मौत की नींद सुला गया

मुखर्जी को गिरफ़्तार कर लिया गया और श्रीनगर शहर से काफी दूर एक वीरान इलाके में स्थित मकान में क़ैद कर दिया गया। दो छोटे-छोटे कमरों में गुरुदत्त वैध तथा टेकचंद को रखा गया। शेख अब्दुल्ला ने आदेश दे रखा था कि मुखर्जी को कोई अतिरिक्त सुविधा तब तक न दी जाए, जब तक कि वे स्वयं आदेश न दें। जेल में मुखर्जी के रिश्तेदारों को मिलने नहीं दिया गया। 22 जून, 1953 को श्यामाप्रसाद मुखर्जी की तबीयत बिगड़ी। शेख सरकार के अत्याचार की इंतेहा तब हो गई, जब मुखर्जी को एम्बुलैंस की बजाए एक टैक्सी से किसी निजी नर्सिंग होम नहीं, बल्कि राजकीय अस्पताल के स्त्री प्रसूति वॉर्ड में भरती कराया गया। मुखर्जी के जीवन के अंतिन दिन उनकी सेवा में जो नर्स के अनुसार 23 जून को एक डॉक्टर ने उसके (नर्स के) हाथ में एक इंजेक्शन थमाया और जाते-जाते कह गया कि मुखर्जी जागें, तो उन्हें इंजेक्शन दे देना। उस डॉक्टर ने एम्प्यूल नर्स के पास छोड़ दिया। कुछ देर बाद मुखर्जी जागे, तो नर्स ने वह इंजेक्शन उन्हें लगाया। यह इंजेक्शन लगते ही मुखर्जी दर्द से उछल पड़े और पूरी शक्ति से चीखे, ‘जल जाता है, हमको जल रहा है।’ मुखर्जी की चीख से घबराई नर्स डॉक्टर से बात करने के लिए टेलीफोन की तरफ दौड़ी, परंतु तब तक मुखर्जी मौत की नींद सो चुके थे।

नेहरू की असंवेदनशीलता सवालों के घेरे में

नेहरू और मुखर्जी के बीच मतभेद का कारण कश्मीर और धारा 370 थे, परंतु मुखर्जी के इस पूरे आंदोलन के दौरान एक प्रधानमंत्री के रूप में जवाहरलाल नेहरू ने असंवेदनशीलता का जो परिचय दिया, उससे मुखर्जी के परिजन ही नहीं, अपितु पूरा देश आहत और आक्रोशित था। जब मुखर्जी श्रीनगर की काल कोठरी में दुर्दिनों से गुज़र रहे थे, उसी दौरान 24 मई, 1953 को नेहरू और डॉ. कैलाशनात काटजू आराम फरमाने श्रीनगर पहुँचे थे। भारत माँ का एक लाल कश्मीर के भारत में वास्तविक विलय के लिए जीवन और मौत को दाँव पर लगा रहा था, वहीं नेहरू के लिए कश्मीर केवल आरामगाह था। श्रीनगर दौरे के दौरान भी नेहरू ने मुखर्जी से कोई मुलाकात नहीं की और न हीं उनकी कुशलक्षेम पूछने की जहमत उठाई। इतना ही नहीं, जब कश्मीर में ‘‘एक देश में दो विधान, दो निशान और दो प्रधान, नहीं चलेगा- नही चलेगा’’ की अवधारणा को साकार करने के लिए मुखर्जी अंतिम साँसें ले रहे थे, उस दिन नेहरू भारत में नहीं, अपितु लंदन में थे। मुखर्जी कश्मीर में ख़ून की होली खेल रहे थे और नेहरू ब्रिटेन की महारानी एलिज़ाबेथ द्विदीय की ताजपोशी के जश्न में दीवाली मना रहे थे। मुखर्जी के रहस्यमय निधन के बाद जब नेहरू ब्रिटेन से भारत आए, तब भी उन्होंने बॉम्बे हवाई अड्डे पर मुखर्जी के निधन पर कोई प्रतिक्रिया देना उचित नहीं समझा। नेहरू की इस असंवेदनशीलता ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया।

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