जब शास्त्री ने भरी ‘जय किसान’ के साथ ‘ जय जवान’ की हुंकार, तो ध्वस्त हो गया नापाक ‘जिब्राल्टर’

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आलेख : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 2 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। ‘हर काम की अपनी एक गरिमा है और हर काम को अपनी पूरी क्षमता से करने में ही संतोष मिलता है।’ यह हम नहीं कह रहे। यह संदेश दिया था देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने। दृढ़ संकल्प और सरलता के प्रतीक भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अग्रगण्य सेनानी और देश के द्वितीय पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की आज 115वीं जन्म जयंती है। शास्त्री ने ब्रिटिश भारत ही नहीं, अपितु स्वतंत्र भारत में भी कई महत्वपूर्ण कार्य किए हैं। ‘जय जवान जय किसान’ का नारा देने वाले शास्त्री ने महिला उत्थान के लिए भी कई सराहनीय कार्य किए थे। आइए जानते हैं लाल बहादुर शास्त्री के भारत निर्माण की महान गाथा।

लाल बहादुर शास्त्री का लड़ैता नाम था ‘नन्हे’

लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर, 1904 को उत्तर प्रदेश में चंदौली के मुग़लसराय में मुंशी शारदा प्रसाद श्रीवास्तव और उनकी धर्मपत्नी रामदुलारी श्रीवास्तव के यहाँ हुआ था। उनके पिता एक प्राथमिक विद्यालय के अध्यापक थे। शास्त्री घर में सबसे छोटे थे, इसलिए उनकी माता ने उन्हें प्यार से ‘नन्हें’ दुलारा नाम दिया था। शास्त्री जब 8 महीने के थे, तब ही उनके पिता का स्वर्गवास हो गया था। माता रामदुलारी उन्हें लेकर अपने पिता यानी शास्त्री के नाना हज़ारीलाल के घर उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर चलीं गईं थी। शास्त्री ने अपनी प्राथमिक शिक्षा ननिहाल में ही रह कर पूरी की। इसके बाद हरिश्चन्द्र हाई स्कूल और काशी विद्यापीठ में आगे की पढ़ाई की। लाल बहादुर शास्त्री ने काशी विद्यापीठ से संस्कृत की पढ़ाई पूरी की और उन्हें यहीं से ‘शास्त्री’ की उपाधि मिली। इसके बाद उन्होंने श्रीवास्तव उपनाम को हटा दिया और अपने नाम के आगे शास्त्री लिखने लगे। 1928 में उनका विवाह मिर्ज़ापुर के ही रहने वाले गणेशप्रसाद की पुत्री ललिता से हुआ। ललिता शास्त्री से उनकी 6 सन्तानें हुईं। इनमें दो पुत्रियाँ, कुसुम व सुमन और चार पुत्र, हरिकृष्ण, अनिल, सुनील और अशोक थे।

1920 में राष्ट्र सेवा का व्रत लिया

शिक्षा समाप्त करने के बाद 1920 में वे भारत सेवक संघ से जुड़े और देश सेवा का व्रत लेते हुए यहीं से अपने राजनैतिक जीवन की शुरुआत की। शास्त्रीजी सच्चे गाँधीवादी थे, जिन्होंने अपना सारा जीवन सादगी से बिताया और उसे गरीबों की सेवा में लगाया। भारतीय स्वाधीनता संग्राम के सभी महत्वपूर्ण कार्यक्रमों व आन्दोलनों में उनकी सक्रिय भागीदारी रही। इसके परिणामस्वरूप उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा। उन्होंने 1921 में असहयोग आंदोलन, 1930 में दांडी मार्च और 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 8 अगस्त, 1942 की रात जब बम्बई (अब मुम्बई) से अँग्रेजों को “भारत छोड़ो” व भारतीयों को “करो या मरो” का आदेश जारी किया गया, उस समय 9 अगस्त, 1942 को इलाहाबाद में उपस्थित शास्त्री ने ‘करो या मरो’ के नारे को बड़ी चतुराई से “मरो नहीं, मारो!” में बदल दिया था और अप्रत्याशित रूप से क्रांति की अग्नि को पूरे देश में प्रचण्ड रूप दिया था। शास्त्री ने 11 दिन तक भूमिगत रहते हुए इस आन्दोलन को चलाया था, परंतु 19 अगस्त, 1942 को शास्त्री को गिरफ़्तार कर लिया गया था। एक लंबी लड़ाई के बाद 15 अगस्त, 1947 को भारत ब्रिटिश शासन की गुल़ामी से मुक्त हुआ था।

स्वतंत्रता के बाद उत्तर प्रदेश के संसदीय सचिव बने

भारत की स्वतंत्रता के बाद शास्त्री को उत्तर प्रदेश के संसदीय सचिव के रूप में नियुक्त किया गया। गोविंद वल्लभ पंत के मन्त्रिमण्डल में उन्हें पुलिस एवं परिवहन मंत्रालय सौंपा गया था। परिवहन मंत्री के कार्यकाल में उन्होंने प्रथम बार महिला संवाहकों (कण्डक्टर्स) की नियुक्ति की थी। उनका यह कदम महिला उत्थान के लिए बहुत कारगर साबित हुआ था। इसके बाद पुलिस मंत्री बनने के बाद उन्होंने भीड़ को नियंत्रित करने के लिये लाठीचार्ज की पुरानी परम्परा की जगह पानी की बौछार का प्रयोग आरम्भ किया था।

युद्ध के बीच ‘जय जवान जय किसान’ का नारा

1951 में  जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में वे अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव नियुक्त किये गये थे। 27 मई, 1964 को पंडित जवाहरलाल नेहरू का अचानक देहावसान हो जाने के बाद शास्त्री को 9 जून, 1964 को भारत का प्रधानमंत्री बनाया गया था। प्रधानमंत्री बनने के एक वर्ष बाद ही यानी 1965 में भारत और पाकिस्तान का युद्ध शुरू हो गया था। उस समय पाकिस्तान 1962 में भारत-चीन युद्ध में भारत की हार के कारण भारत को एक कमजोर राष्ट्र मान रहा था। इसी सोच के साथ पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति ने भारत के कश्मीर पर कब्ज़ा करने के उद्देश्य से ऑपरेशन जिब्राल्टर (Operation Gibraltar) शुरू किया था, जिसके तहत उसने अचानक सायं 7.30 बजे भारतीय सेना की कम्यूनिकेशन लाइन को ध्वस्त करने के लिए हवाई हमला किया था। भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति ने भी तत्काल आपात बैठक बुलाई, जिसमें तीनों रक्षा अंग और प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री शामिल थे। बैठक में विचार-विमर्श हुआ। तीनों रक्षा अंगों के प्रमुखों ने शास्त्री से पूछा, “सर ! क्या हुक्म है ?” शास्त्रीजी ने एक वाक्य में उत्तर दिया। “आप देश की रक्षा कीजिये और मुझे बताइये कि हमें क्या करना है ?” शास्त्रीजी ने इस युद्ध में नेहरू के मुकाबले राष्ट्र को उत्तम नेतृत्व प्रदान किया और ‘जय जवान-जय किसान’ का नारा दिया। इससे भारत की जनता का मनोबल बढ़ा और सारा देश एकजुट हो गया, जिसकी कल्पना पाकिस्तान ने सपने में भी नहीं की थी। पाकिस्तान अपने मंसूबों में विफल हो गया। कश्मीरी किसानों और गुज्जर चरवाहों ने ही उसकी घुसपैठ की सूचना भारतीय सैनिकों को दी थी।

सीमा पार कर आक्रमण करने का दिया आदेश

तत्कानील प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने भारतीय सेना को पंजाब में अंतरराष्ट्रीय सीमा को पार करने और पाकिस्तान में दो तरफा हमला करने का आदेश दिया था। 6 सितंबर, 1965 को भारतीय सेना की 15वीं पैदल सैन्य इकाई ने द्वितीय विश्व युद्ध के अनुभवी मेजर जनरल प्रसाद के नेतृत्व में इच्छोगिल नहर के पश्चिमी किनारे पर पाकिस्तान के हमले का डट कर सामना किया था। इस हमले में मेजर जनरल प्रसाद के काफिले पर भी भीषण हमला हुआ था, जिससे उन्हें अपना वाहन छोड़ कर पीछे हटना पड़ा था। भारतीय थलसेना ने दुगुनी शक्ति से प्रत्याक्रमण करके बरकी गाँव के समीप नहर को पार करने में सफलता पाई और भारतीय सेना की जवाबी कार्रवाई देख पाकिस्तानियों के होश उड़ गये थे। अयूब खान का ऑपरेशन जिब्राल्टर भारतीय सैनिकों के जवाबी हमले में तिनके की तरह उड़ गया था। इस अप्रत्याशित आक्रमण से घबरा कर अमेरिका ने अपने नागरिकों को लाहौर से निकालने के लिये कुछ समय के लिये युद्धविराम की अपील भी की थी।

पाकिस्तान विवश हो गया ताश्कंद समझौते के लिए

अन्ततः रूस और अमरिका की मिलीभगत से शास्त्री पर ज़ोर डाला गया। उन्हें एक सोची समझी साज़िश के तहत रूस के ताशकंद में बुलाया गया। उनकी पत्नी को भी उनके साथ जाने से रोक दिया गया था। ताशकंद में जब समझौता वार्ता हुई तो शास्त्री की एक ही जिद थी कि उन्हें बाकी सब शर्तें मंजूर हैं, परंतु जीती हुई ज़मीन पाकिस्तान को लौटाना हरगिज़ मंजूर नहीं। काफी जद्दोजहद के बाद शास्त्री पर अन्तर्राष्ट्रीय दबाव बना कर ताशक़ंद समझौते के दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करा लिये गये थे। उन्होंने यह कहते हुए हस्ताक्षर किये थे कि ‘मैं हस्ताक्षर जरूर कर रहा हूँ, परंतु यह ज़मीन कोई दूसरा प्रधानमंत्री ही लौटायेगा,  मैं नहीं। पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब ख़ान के साथ युद्ध विराम के समझौते पर हस्ताक्षर करने के कुछ घण्टे बाद ही 11 जनवरी 1966 की रात उनकी संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु हो गयी। उनकी मृत्यु आज भी रहस्य बनी हुई है कि क्या वाकई शास्त्री की मौत हृदयाघात के कारण हुई थी ? या उन्हें विष दिया गया था ? शास्त्री को उनकी सादगी, देशभक्ति और ईमानदारी के लिये आज भी पूरा भारत श्रद्धापूर्वक याद करता है। 1966 में उन्हें मरणोपरान्त भारत रत्न पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया था।

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