परम मोक्षदायिनी है भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा : 50 लाख श्रद्धालुओं के शामिल होने की संभावना

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* चार धामों में प्रथम पुरी में 10 दिन तक चलता है रथयात्रा का उत्सव

रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद 2 जुलाई 2019 (YUVAPRESS)। देश की चार दिशाओं में स्थित हैं चार धाम। इनमें एक मात्र शिव मंदिर है और तीन विष्णु मंदिर। पूर्व के ओडिशा में स्थित पुरी भगवान विष्णु के 24 अवतारों में से एक भगवान कृष्ण के जगन्नाथ स्वरूप का तीर्थ धाम है। दूसरा धाम उत्तर दिशा में स्थित भगवान बद्रीनाथ का मंदिर है, यह भी भगवान विष्णु के बद्रीनाथ स्वरूप का मंदिर है। तृतीय धाम पश्चिम के गुजरात में स्थित द्वारिकाधीश मंदिर है और चतुर्थ धाम दक्षिण में रामेश्वर तीर्थ है, जो चार धाम में एक मात्र शिव मंदिर है।

भारत की सनातन-वैदिक (हिंदू) संत परंपरा

भारत की सनातन-वैदिक (हिंदू) संत परंपरा इन्हीं चार मठों पर आधारित है। आदि शंकराचार्य द्वारा धार्मिक एकजुटता और व्यवस्था के लिये चार मठों की परंपरा शुरू की गई है। इन मठों की स्थापना के साथ उनके मठाधीशों की भी नियुक्ति की गई है, जो शंकराचार्य कहलाते हैं। जो व्यक्ति इन में से किसी भी मठ के अंतर्गत संन्यास लेता है, वह उसी संप्रदाय पद्धति की साधना करता है। ओडिशा का जगन्नाथ पुरी मंदिर गोवर्धन मठ के अंतर्गत आता है। इसके अंतर्गत दीक्षा लेने वाला व्यक्ति आरण्य संप्रदाय का संन्यासी कहलाता है। बद्रीनाथ मंदिर ज्योतिर्मठ में आता है, ज्योतिर्मठ के अंतर्गत दीक्षा लेने वाला संन्यासी गिरि, पर्वत और सागर संप्रदाय का कहलाता है। पश्चिम का द्वारिकाधीश मंदिर शारदा मठ या कालिका मठ कहलाता है। इस मठ के अंतर्गत संन्यास लेने वाला व्यक्ति तीर्थ और आश्रम संप्रदाय के विशेषण से पहचाना जाता है। रामेश्वरम मंदिर वेदांत ज्ञानमठ कहलाता है। इसके अंतर्गत दीक्षा लेने वाला संन्यासी सरस्वती, भारती तथा पुरी संप्रदाय विशेषण से पहचाना जाता है।

मोक्ष दायिनी है भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा

हम बात कर रहे हैं जगन्नाथ मंदिर की, जो बंगाल की खाड़ी के पूर्वी छोर पर बसी परम पवित्र नगरी पुरी में स्थित है। पुरी तटवर्ती राज्य ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर से थोड़ी ही दूरी पर है। वर्तमान ओडिशा प्राचीनकाल में उत्कल प्रदेश के नाम से पहचाना जाता था। ब्रह्मपुराण के अनुसार जगन्नाथ पुरी क्षेत्र में यदि कोई व्यक्ति प्राण त्यागता है तो वह निश्चित ही मोक्ष को प्राप्त कर लेता है। भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा में शामिल होकर जो व्यक्ति रथ को खींचता है, उसे 100 यज्ञों का पुण्य प्राप्त होता है। पौराणिक कथा के अनुसार राजा इंद्रद्युम्न भगवान जगन्नाथ को शबर राजा से यहाँ लेकर आए थे। इसके बाद 12वीं सदी में चोलगंगदेव तथा अनंगभीमदेव ने 65 मीटर ऊँचे मंदिर का निर्माण कराया था। मंदिर में स्थापित मूर्तियाँ काष्ट की (नीम की लकड़ी से बनी हुई) हैं। इन्हें हर 14 से 15 वर्ष में बदल दिया जाता है।

रथयात्रा की तैयारी अक्षय तृतीया के दिन से प्रारंभ होती है। भगवान श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा के रथों को तैयार करने से रथयात्रा की तैयारी शुरू होती है। भगवान जगन्नाथ का रथ नंदीघोष कहलाता है, जो 45.6 फीट ऊँचा होता है।

तालध्वज नामक रथ में भगवान बलभद्र सवार होते हैं, जो 45 फीट ऊँचा होता है। दर्पदलन नामक रथ 44.6 फीट ऊँचा होता है, इसमें देवी सुभद्रा सवार होती हैं। यह रथ गुंडीचा माता के मंदिर तक रथों की यात्रा निकालते हैं, यहाँ पहुँचकर भगवान बड़े भाई और बहन सुभद्रा के साथ विश्राम करते हैं। इसलिये इस रथयात्रा को गुण्डीय यात्रा भी कहते हैं।

भगवान के रथ को गरुड़ध्वज या कपिल ध्वज भी कहते हैं। यह लाल और पीले रंग का होता है। इस रथ पर ध्वज होता है, जिसे त्रिलोक्य वाहिनी कहा जाता है। बलभद्र का रथ तलध्वज भी कहलाता है। यह लाल और हरे रंग के कपड़े तथा 763 लकड़ी के टुकड़ों से बना होता है।

देवी सुभद्रा का रथ पद्मध्वज भी कहलाता है, जो लाल और काले रंग के कपड़े तथा लकड़ियों के 593 टुकड़ों से बनता है। अक्षय तृतीया के दिन से रथ बनाने की शुरुआत होती है, जिसमें 200 से अधिक कारीगर दिन-रात काम करते हैं।

गुंडीचा मंदिर में विश्राम करते हैं भगवान

हर वर्ष अषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को भगवान की रथयात्रा का आयोजन होता है, जो इस वर्ष 4 जुलाई को है। चूँकि भगवान निज मंदिर से निकलकर गुंडीचा माता के मंदिर पहुँचते हैं, इसलिये एक दिन पहले ही गुंडीचा माता मंदिर की अच्छे से सफाई की जाती है, जिसे गुंडीचा मार्जन कहा जाता है। मंदिर की सफाई के लिये इंद्रद्युम्न सरोवर से जल लाया जाता है। रथयात्रा में सबसे आगे भगवान बलभद्र का रथ होता है, इसके बाद माता सुभद्रा और अंत में भगवान जगन्नाथ का रथ चलता है।

बालीगाँव के तुलसीवन से भगवान के लिये आती है तुलसी

भगवान जगन्नाथ के श्रृंगार के लिये तुलसी पुरी से 28 कि.मी. दूर स्थित बालीगाँव के तुलसीवन से लाई जाती है। हालाँकि इस वर्ष ओडिशा में आए फानी तूफान से यह गाँव पूरी तरह से तबाह हो चुका है। यहाँ अभी तक बिजली की सप्लाई भी चालू नहीं हो पाई है। इस गाँव की आजीविका चलाने वाले नारियल के पेड़ जमींदोज़ हो चुके हैं। धान की फसल भी नष्ट हो चुकी है। गाँव के लगभग 200 घरों में से एक भी घर ऐसा नहीं है, जो फानी तूफान से प्रभावित न हुआ हो। इसके बावजूद यह सारी परिस्थितियाँ एक तरफ हैं और ग्रामजनों की भगवान जगन्नाथ के प्रति आस्था एक तरफ है। शरीर पर मात्र घुटनों तक धोती पहनने वाले इस गाँव के एक नागरिक ने बताया कि उसके 45 नारियल के पेड़ और 3.5 एकड़ में फैली धान की फसल फानी ने बर्बाद कर दी। इसके बावजूद सभी ग्रामजन भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा में शामिल होने के लिये अवश्य जाएँगे। यह बालीगाँव धार्मिक स्थल दासियापीठ के लिये भी प्रसिद्ध है।

पुरी के होटलों में बुकिंग हाउसफुल

पर्यटन निगम के एक अधिकारी ने बताया कि 10 दिन का रथयात्रा उत्सव राज्य प्रशासन के लिये राजकीय उत्सव होता है। इस रथयात्रा के दौरान पुरी में देश-विदेश से 50 लाख लोगों के आने की संभावना है। भगवान के स्वर्ण श्रृंगार के दिन ही 10 लाख से अधिक लोग यहाँ पहुँच जाते हैं। पूरे पुरी नगर में 1300 से अधिक होटल हैं, जिनमें सारे कमरे एक महीने पहले से ही एडवांस में बुक हो चुके हैं। फानी से पहले पुरी में 15 हजार पर्यटक आए थे जिन्हें प्रशासन ने सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाया था। रथयात्रा में ओडिशा के अलावा पश्चिम बंगाल, बिहार, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र आदि से भी बड़ी संख्या में लोग आते हैं। इसके अलावा फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी, इटली और बांग्लादेश आदि देशों से भी लोग हर साल रथयात्रा में शामिल होने के लिये आते हैं। राज्य सरकार की ओर से रथयात्रा उत्सव को शांतिपूर्ण ढंग से सम्पन्न कराने के लिये बुनियादी सुविधाओं की सारी तैयारियाँ पूरी कर ली गई हैं। दूसरी तरफ जगन्नाथ टेंपल ऑफिस की ओर से रथयात्रा की सभी तैयारियाँ कर ली गई हैं।

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