भगवान महावीर जयंती पर उनके संदेशों को हमेशा क्यों याद रखना चाहिए?

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Bhagwan mahavir jayanti 2018

नई दिल्ली: आज भगवान महावीर जयंती (Mahavir Jayanti) है। भगवान महावीर का जन्म लगभग 599 ईसा वर्ष पूर्व एक हुआ था। इनका जन्म स्थान उस समय के वैशााली के गणतंत्र राज्य क्षत्रिय कुण्डलपुर में हुआ था। इन्होने तीस वर्ष की छोटी सी आयु में ही अपना घर त्यागकर राज वैभव से विरक्त हो गये थे। इसके बाद इन्होने संन्यास धारण कर लिया और आत्मकल्याण के मार्ग पर निकल गये थे। भगवान महावीर ने 12 वर्ष तक कठिन तपस्या किया इसके बाद इनको ज्ञान की प्राप्ती हुई और इसके बाद लोगों के कल्याण के लिए ज्ञान का प्रसारण करने लगे।

Mahavir jayanti 2018

जैन धर्म में भगवान महावीर को 24वें तीर्थकर के रूप में पूजा जाता है। इनके बचपन का नाम वर्धमान था। महावीर ने हमेशा लोगों को अहिंसा का संदेश दिया है। भगवान महावीर ने एक बार अपने संदेश में कहा था कि जीवों की रक्षा करना मात्र अहिंसा नहीं बल्कि किसी को हमारी आवश्यकता हो और हम उसकी मदद करें वह अहिंसा है और ठीक इसके विपरीत यदि हम आवश्यकता के लिए सक्षम होते हुए भी उसकी मदद न करें हिंसा कहलाता है। आओं मिलकर इस Mahavir Jayanti पर उनके इन संदेशों को याद करें।

भगवान महावीर जयंती (Mahavir Jayanti) पर इनके द्वारा तीन सिद्धांत दिऐ गये थे जिसके अनुसार अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकान्त को अपने जीवन में रखना चाहिए यदि आप अपने जीवन को सुखीमय बनाना चाहते हो। आज के युवा इस तनाव भरी जिंदगी में भागमभाग के कारण सुकून को खोते जा रहे हैं। इसलिए हमें भागवान महावीर द्वारा दिये गये उपदेश को हमेशा याद रखना चाहिए। भगवान महावीर की अहिंसा केवल शारीरिक और बाहरी नहीं था बल्कि मानसिक और भीतर के मन से जुड़ा हुआ था। इसलिए कहा जा सकता है कि जहां से अन्य दर्शनों की अहिंसा शुरू होती है वहां से जैन धर्म की अहिंसा शुरू होती है।

यदि आप अपने जीवन में उचाइयों को प्राप्त करना चाहते हों तो भगवान महावीर के अनुसार मन, कर्म और वचन को हमेशा याद रखना चाहिए। भगवान महावीर ने साधु, शाध्वी, श्रावक और श्राविका नामक चार तीर्थों की स्थापना किया था इसलिए इन्को तीर्थकर भी कहा जाता है। तीर्थ का अर्थ लौकिक तीर्थों से नहीं है बल्कि अहिंसा और सत्य की साधना द्वारा अपनी आत्मा को तीर्थ बनाने से है। भगवान महावीर जी के जयंती के दिन जैन मंदिरों में महावीर जी की मुर्तियों का अभिषेक किया जाता है और जैन धर्म के अनुयायी बढ़चढ़कर इसमें भाग लेते हैं।

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