नवरात्रे में माँ दुर्गा का सातवाँ दिन व सातवाँ रूप – माता कालरात्रि

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Durga Saptshati

नई दिल्ली: हिन्दू धर्म में नवरात्रों का बहुत बड़ा महत्व माना गया है। लेकिन आज भी कुछ हिन्दू इस बात से अनजान है कि वर्ष में दो बार नवरात्रे यानि की चैत्र नवरात्रे (Chaitra ) और शरादिये (Sharadiye) नवरात्रे के अलावा भी दो और नवरात्रे होते हैं, जिनमें से एक को वसंत नवरात्रे (Vasant Navratre) और दुसरे को गुप्त नवरात्रे (Gupt Navratre) कहा जाता है। इनमें से पहला गुप्त नवरात्रे आशाद शुल्क पक्ष में आता है और दुसरे गुप्त नवरात्रे माघ के महीने की शुल्क पक्ष में आता है।  नवरात्री के नौ दिनों में दुर्गा माँ के नौ अवतारों की पूजा की जाती है। जिसमें पूजा करते समय दुर्गा सप्तशती का पाठ भी किया जाता है। यह दुर्गा सप्तशती (Durga Saptshati) का पाठ और कवच करने से इसका फल प्राप्त होता है। तो कुछ भक्त अपनी श्रधा अनुसार माता रानीके आगे अखंड जोत भी जागते है और सेवा करते है। माता की अखंड जोत लगातार नौ दिनों तक जलाई जाती है।

आज 24 मार्च 2018 शनिवार को सप्त नवरात्रा (Durga Saptshati) है। यह सातवाँ नवरात्र दुगा माँ का सातवाँ रूप कालरात्रि का होता है। सभी प्राणियों का दुःख हरने वाली, रात्रिभय, जन्तुभय दूर करने वाली, काल की भी रात्रि विनाशिका है। इन्हें माता कालरात्रि के साथ सरद माँ काली भी कहा जाता है।

इनकी पूजा करने से तेज बड़ता है, पापों से मुक्ति होती है, दुःख, क्लेश दूर होते हैं, देवी वाक्सिद्धि ओर बुद्धि बल प्रदान होता है और राक्षस भूत-प्रेत इनसे डर कर भाग जाते हैं।

कालरात्रि माता बिखरे हुए बाल, गले में धारण की हुई मुंड माला, तीन आंखे और काले रंग के शरीर की दिखाई देती है। इनके दाहिने हाथ में वारमुद्रा विराजमान है, और इनके दुसरे हाथ अभय मुद्रा में है। बाई हाथ में लोहे का काटा और निचे वाले हाथ में खड्ग विराजमान होती दिखाई देती है।

 

माँ कालरात्रि का उपासना मंत्र है,
एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता, लम्बोष्टी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी।
वामपादोल्ल सल्लोहलता कण्टक भूषणा, वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥
जय माता दी।

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