जानिए ‘जनता के आँकड़ों’ में क्यों और कैसे फिट नहीं बैठ सकता महाराष्ट्र का नया ‘सरदार’ ?

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* फडणवीस : CM के रूप में पहली पसंद, जीत का प्रतिशत 70

* उद्धव : CM के रूप में अंतिम पसंद, जीत का प्रतिशत 45

* शिवसेना के राजहठ ने ‘शूद्र’ कर दिया ‘शुद्ध’ जनादेश को

* कांग्रेस-एनसीपी थीं विपक्ष की हक़दार, पर बनेंगी सत्ता में भागीदार

विशेष टिप्पणी : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 26 नवम्बर, 2019 (युवाPRESS)। महाराष्ट्र में एक महीने और 2 दिनों से चल रही राजनीतिक उठापटक के पश्चात् अब शिवसेना (SS), राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा-NCP) और कांग्रेस (CONGRESS) की मिलीजुली सरकार बनने का मार्ग प्रशस्त हो गया है। तीनों दलों के बीच बनी सहमति के अनुसार शिवसेना नेता उद्धव ठाकरे महाराष्ट्र के नए मुख्यमंत्री बनेंगे। निवर्तमान मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस के त्यागपत्र के पश्चात् अब महाराष्ट्र की जनता को नया ‘सरदार’ मिलेगा, परंतु प्रश्न यह उठता है कि जनता के आँकड़ों में यह नया सरदार फिट बैठ सकता है ? उत्तर है, ‘कदापि नहीं’।

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2019 के लिए गत 21 अक्टूबर को मतदान हुआ था और 24 अक्टूबर को जनता का आदेश सबके सामने था। यह अत्यंत शुद्ध जनादेश था, जिसमें जनता ने चुनाव से पूर्व हुए भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी-BJP) और शिवसेना गठबंधन को 161 सीटें दी थीं, जो बहुमत के आँकड़े 145 से 16 सीटें अधिक थीं। इसका अर्थ यह हुआ कि महाराष्ट्र की जनता ने तत्कालीन मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस के नेतृत्व में पूर्ण विश्वास व्यक्त किया और शिवसेना के साथ मिल कर अगले पाँच वर्ष तक शासन करने का जनादेश दिया, परंतु इसके बाद शिवसेना का जो राजहठ जागा, उसने महाराष्ट्र की जनता द्वारा दिए गए शुद्ध जनादेश को शूद्र कर दिया।

क्यों फडणवीस ही थे मुख्यमंत्री पद के अधिकारी ?

इस प्रश्न के उत्तर में जाने के लिए मतदान से पहले महाराष्ट्र में हुए चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों से लेकर मतदान और परिणाम के बाद उभरे आँकड़ों पर ध्यान देना होगा। मतदान से पूर्व हुए अधिकांश सर्वेक्षणों में मुख्यमंत्री के रूप में पहली पसंद देवेन्द्र फडणवीस ही थे, क्योंकि उन्होंने पिछले पाँच वर्षों से राज्य में एक स्थिरता के साथ श्रेष्ठ शासन देने का प्रयास किया था। उनके कामकाज से जनता प्रभावित थी। इतना ही नहीं, जनता को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह सहित सभी नेताओं द्वारा की जा रही इस उद्घोषणा पर विश्वास था कि यदि भाजपा-शिवसेना गठबंधन को बहुमत मिला, तो फडणवीस ही अगले पाँच वर्षों के लिए मुख्यमंत्री होंगे। इसीलिए जनता ने इस गठबंधन के तहत भाजपा के हिस्से में आई 150 सीटों में से 105 सीटों पर उसे जीत दिलाई। इस लिहाज़ से भाजपा की जीत का प्रतिशत 70 से अधिक रहा। इसका अर्थ यह हुआ कि भाजपा ने जिन सीटों पर चुनाव लड़ा, उनमें से 70 प्रतिशत सीटें जीतीं। भाजपा को राज्य में सर्वाधिक 25.75 प्रतिशत के आसपास वोट मिले। ऐसे में फडणवीस को ही मुख्यमंत्री पद के मूल अधिकारी माने जाने में कोई संकोच या अनुचित बात नहीं है।

उद्धव न रेस में, न लोकप्रियता और न जीत में थे आगे

चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में जब जनता से यह पूछा गया था कि शिवसेना ने उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहेंगे ? अधिकांश सर्वेक्षणों में उद्धव को मुख्यमंत्री के रूप में देखने की इच्छा रखने वालों का प्रतिशत 10 से ऊपर नहीं गया। उद्धव की लोकप्रियता तो एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार से भी कई गुना नीचे थी। वैसे उद्धव मुख्यमंत्री पद की रेस में नहीं थे, परंतु चुनाव परिणामों के आँकड़ों के अनुसार शिवसेना ने भी चुनावी मैदान में कोई बड़ा झंडा नहीं गाड़ा। गठबंधन के तहत शिवसेना अपने हिस्से में आई 124 सीटों में से केवल 56 सीटें जीत सकी अर्थात् शिवसेना ने जिन सीटों पर चुनाव लड़ा, उनममें से केवल 45 प्रतिशत सीटों पर जीत दर्ज की। शिवसेना को केवल 16.41 प्रतिशत वोट ही हासिल हुए। भाजपा के साथ गठबंधन होने के बावज़ूद शिवसेना चुनावी विरोधियों कांग्रेस-एनसीपी को कड़ी टक्कर नहीं दे सकी, जिसका फायदा एनसीपी-कांग्रेस को हुआ और नुकसान भाजपा को। इन आँकड़ों से स्पष्ट है कि शिवसेना की परस्पर विरोधी विचारधारा वाले राजनीतिक दलों एनसीपी-कांग्रेस के साथ मिल कर बनाई जा रही सरकार और मुख्यमंत्री के रूप में उद्धव ठाकरे जनता के आँकड़ों में फिट नहीं बैठ सकते।

केवल 30% वोट पाकर एनसीपी-कांग्रेस सत्ता की भागीदार

महाराष्ट्र में मतदान वाले दिन जनता के सामने दो विकल्प थे। एक तरफ थे मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस और उनके नेतृत्व वाला भाजपा-शिवसेना गठबंधन, तो दूसरी तरफ था एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन। जनता ने जब भाजपा-शिवसेना गठबंधन को स्पष्ट बहुमत दिया, तो इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन को विपक्ष में बैठने का जनादेश मिला है, परंतु एकमात्र शिवसेना के राजहठ ने विपक्ष की हक़दार एनसीपी-कांग्रेस को सत्ता में भागीदार बना दिया। चुनाव परिणामों के आँकड़ों यानी जनता के आँकड़ों पर ध्यान दें, तो सबसे बड़ा लाभ कांग्रेस को हुआ है, क्योंकि वह चौथे नंबर की पार्टी होने के बावज़ूद सत्ता पक्ष में आ गई है। एनसीपी से गठबंधन के तहत कांग्रेस ने अपने हिस्से में आई 145 सीटों में से केवल 44 सीटों पर जीत दर्ज की। अर्थात् कांग्रेस केवल 29 प्रतिशत सीटें ही जीत सकी। उसे वोट भी केवल 15.87 प्रतिशत ही मिले। एनसीपी की स्थिति कांग्रेस अच्छी रही, जिसने गठबंधन के अंतर्गत अपने हिस्से में आई 123 में से 54 सीटें जीतीं और उसकी जीत का प्रतिशत 54 रहा। यद्यपि एनसीपी को भी 16.71 प्रतिशत ही वोट मिले हैं। ये आँकड़े स्पष्ट रूप से कहते हैं कि महाराष्ट्र की जनता के शुद्ध जनादेश को शिवसेना के राजहठ ने शूद्र बना दिया और राज्य को एक अनचाही गठबंधन सरकार और अनचाहे मुख्यमंत्री झेलने के लिए विवश कर दिया।

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