ज़रा याद करो क़ुर्बानी : जब ‘अमदावादियों’ ने अंग्रेजी हुक़ूमत को हिला कर रख दिया…

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* आज जो हम SUNDAY ENJOY करते हैं, उसकी नींव 77 साल पहले पड़ी थी

* महात्मा गांधी ने किया ‘अंग्रेजों, भारत छोड़ो’ आंदोलन का सूत्रपात

* अहमदाबाद ने भी बढ़-चढ़ कर लिया हिस्सा, 13 युवकों ने दिया बलिदान

आलेख : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 9 अगस्त, 2019 (युवाPRESS)। हमारे देश में सभी सरकारी प्रतिष्ठान और आवश्यक सेवाओं को छोड़ कर सभी निजी संस्थान रविवार को बंद रहते हैं। आम जनजीवन सण्डे को एंजॉय डे मानता है और शनिवार को कार्य स्थल छोड़ते समय लोगों के मन में रविवार की छुट्टी को लेकर भारी उत्साह होता है। कोई होटल में जाता है, कोई फास्टफूड मंगवाता है, किसी का फिल्म देखने का कार्यक्रम होता है, तो कोई छह दिनों बाद मिली छुट्टी के दिन रविवार को आराम फरमाता है।

आज का भारत जिस सण्डे को एंजॉय डे के रूप में मनाता है, परंतु आज की पीढ़ी नहीं जानती होगी कि इस सण्डे को यदि हम एंजॉय कर पा रहे हैं, तो उसके पीछे सैकड़ों बलिदानियों और हजारों-लाखों स्वतंत्रता सेनानियों का ख़ून-पसीना लगा है। आज से ठीक 77 साल पहले भी वह दिन रविवार का ही था, जब देश की आज़ादी के लिए लड़ रहे रणबांकुरों ने स्वतंत्र भारत की स्थापना की नींव रखी थी। वह दिन था 9 अगस्त, 1942 रविवार का। इसी दिन महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारत ने 200 वर्षों से अंग्रेजों से आज़ादी के लिए ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का सूत्रपात किया था। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के लम्बे इतिहास में भारत छोड़ो आंदोलन अंतिम और ऐतिहासिक आंदोलन था, जिसने अंग्रेजी साम्राज्य की चूलें हिला दीं और स्वतंत्र भारत की नींव रखी। अंग्रेजों के विरुद्ध भारत की इस निर्णायक लड़ाई को अगस्त क्रांति के रूप में भी याद किया जाता है।

अंग्रेजों के विश्वासघात का जबर्दश्त प्रतिकार

प्रथम विश्व युद्ध में अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी की सहमति पर भारत ने ब्रिटेन का साथ दिया। महात्मा गांधी सहित सैकड़ों दीवानों को लगता था कि ब्रिटिश शासक इसके बदले में भारत को आज़ाद कर देंगे, परंतु अंग्रेजों ने विश्वासघात किया और 8 अगस्त, 1942 की रात तत्कालीन बम्बई में आयोजित कांग्रेस महाधिवेशन में गांधीजी ने ‘करो या मरो’ का नारा देते हुए ‘अंग्रेजों, भारत छोड़ो’ आंदोलन करने का आदेश जारी किया। 9 अगस्त, 1942 रविवार को देश भर में आंदोलन आरंभ हुआ, परंतु अंग्रेज सरकार ने महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, सरोजिनी नायडू जैसे प्रमुख नेताओं को सुबह 6 बजे ही दिल्ली स्थित बिड़ला हाउस से गिरफ्तार कर लिया। कांग्रेस कार्य समिति के सभी सदस्य गिरफ्तार हो चुके थे और अंग्रेजों ने कांग्रेस को अवैध संगठन घोषित कर दिया था। इसके बाद पूरे देश में राष्ट्रभक्ति का ज्वार उमड़ा और जगह-जगह अंग्रेजों के विरुद्ध विरोध प्रदर्शन शुरू हुए। सरकारी संपत्तियों में तोड़फोड़ के साथ ही आंदोलन ने कई हिस्सों में हिंसक रूप भी धारण किया, परंतु महात्मा गांधी के नेतृत्व में यह आंदोलन चलता रहा। अंतत: ब्रिटिश शासकों को एहसास हो गया कि अब भारत स्वतंत्रता से कम पर मानेगा नहीं और पूरे 5 वर्ष 7 दिन बाद 15 अगस्त, 1947 को पीड़ादायक विभाजन के साथ भारत को स्वतंत्रता मिल गई।

कैसी थी अहमदाबाद की 9 अगस्त, 1942 की सुबह ?

तत्कालीन बृहन्मुंबई राज्य के हिस्से गुजरात में भारत छोड़ो आंदोलन का केन्द्र आर्थिक राजधानी अहमदाबाद था। अहमदाबाद में 9 अगस्त को सुबह से ही माहौल गर्म था। जगह-जगह जुलूस निकलने शुरू हो गए। पुलिस ने आंदोलनकारियों पर लाठीवार से लेकर गोलीबारी तक हर कदम उठाए। पूरे शहर में बंद की स्थिति थी। मिल-कारखाने, व्यवसायिक प्रतिष्ठान, सरकारी-गैर सरकारी कार्यालय हर जगह पर विद्यार्थियों ने बंद करवा दिया। उस समय अहमदाबाद में सिर्फ चार कॉलेज थे। गुजरात कॉलेज, एच. एल. कॉलेज ऑफ कॉमर्स, एल. डी. आर्ट्स कॉलेज एवं सर एल. ए. शाह लॉ कॉलेज। छोटे-बड़े 30 से 35 विद्यालय थे। छात्रों के आंदोलन का नेतृत्व कर रहा था राष्ट्रीय विद्यार्थी मंडल। दूसरी तरफ पुलिस ने भद्र स्थित कांग्रेस हाउस को सील कर गणेश वासुदेव मावळंकर सहित प्रमुख नेताओं की सामूहिक धरपकड़ की।

बेकाबू अहमदाबाद, उमाकांत प्रथम शहीद, लगा कर्फ्यू

अहमदाबाद की स्थिति बेकाबू होते देख ब्रिटिश शासकों ने दोपहर बाद पुलिस की मदद में सेना को बुला लिया। मांडवी की पोल, आस्टोडिया, रायपुर, खाडिया, गांधी रोड जैसे क्षेत्रों में स्थिति पर नियंत्रण पाना मुश्किल हो रहा था। शाम करीब पांच बजे खाडिया डाक घर के पास आंदोलनकारियों का बड़ा जुलूस निकला। पुलिस ने इन पर गोलीबारी की, जिसमें युवक उमाकांत कडिया शहीद हो गए। कडिया इस आंदोलन में अहमदाबाद के प्रथम शहीद के रूप में नाम दर्ज करवा कर इस दुनिया से अलविदा हो गए। वे तत्कालीन राइफल एसोसिएशन के सचिव थे। शाम सात बजे तो शहर में कर्फ्यू लगाने की घोषणा कर दी गई।

हाथों में तिरंगा लिए किनारीवाला के सीने में लगी गोली

अगले दिन 10 अगस्त को सुबह पुलिस ने गुजरात कॉलेज परिसर और छात्रावास पर लाठीवार और गोलीबारी की। इससे पूरे शहर में रोष भडक़ उठा। इसके विरुद्ध लॉ कॉलेज से छात्रों का एक जुलूस निकला और गुजरात कॉलेज पहुंचा। विद्यार्थियों ने कॉलेज परिसर में घुसने की कोशिश की, परंतु अंग्रेज डीवायएसपी तथा पुलिस की टुकड़ी ने उन्हें रोक दिया। जुलूस में करीब एक हजार छात्र थे। अग्रिम पंक्ति में विनोद किनारीवाला सहित कुछ छात्र हाथों में तिरंगा लिए हुए थे। अंग्रेज सार्जेंट ने छात्रों के हाथ से राष्ट्र ध्वज छीनने की कोशिश की। इससे पुलिस और छात्रों में झड़प हुई। उत्तेजित छात्रों ने पुलिस पर जम कर पथराव किया। इससे गुस्साई पुलिस ने सीधे गोलीबारी शुरू कर दी। इस गोलीबारी में एक गोली विनोद किनारीवाला को लगी और वे कॉलेज परिसर में ही शहीद हो गए। गोलीबारी में कई छात्र घायल भी हुए। पुलिस के दमनचक्र और किनारीवाला की शहादत से आंदोलनकारियों का रोष और भडक़ा। 29 अगस्त को युवतियों के एक जुलूस ने अहमदाबाद महानगर पालिका भवन पर राष्ट्र ध्वज फहरा दिया।

कर्फ्यू के बीच लोगों ने छतों से लगाए नारे, बरसाए बम

9 सितंबर को आंदोलन का एक माह पूर्ण होने के अवसर पर शहर में सम्पूर्ण हड़ताल रही और जगह-जगह जुलूस निकले। पुलिस ने आंदोलनकारियों पर जमकर लाठियां बरसाईं। 15 सितंबर को छात्रों ने गुजरात कॉलेज में घुस कर जबर्दस्त तोडफ़ोड़ की। 20 सितंबर की रात खाडिया कालूपुर में छात्रों ने जुलूस निकाले। कर्फ्यू लागू होने के बाद लोगों ने छतों पर चढ़ कर अंग्रेजी शासन के खिलाफ नारे लगाए। 21 सितंबर को सरसपुर में एक कार्यक्रम रखा गया, जहां आंदोलनकारियों ने टेलीफोन के वायर तोड़े और डाक घर फूंक दिया। 25 सितंबर को आर. सी. हाईस्कूल पर राष्ट्र ध्वज फहराया गया। आंदोलन के दौरान जमकर बम धमाके किए गए। जगह-जगह सरकारी सम्पत्तियों को बम धमाकों से नुकसान पहुंचाया गया। बम बनाने का काम भी स्वयं विद्यार्थी ही करते थे। 30 सितंबर को रायपुर पिपरडी की पोल में नरहरिप्रसाद रावल और नंदलाल जोशी नामक दो युवक बम बनाते समय हुए विस्फोट में घायल हो गए, जिसमें शिहोर (भावनगर) के जोशी की तुरंत मृत्यु हो गई, जबकि कुछ दिन बाद रावल ने भी दम तोड़ दिया।

साढ़े तीन महीने बंद रहीं मांचेस्टर की मिलें

अहमदाबाद अपनी कपड़ा मिलों के कारण उस समय भारत का मांचेस्टर कहलाता था, परंतु भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान साढ़े तीन महीने मिलें बंद रही थीं। शहर की अशांत स्थिति को देखते हुए 9 अगस्त से जारी कर्फ्यू की अवधि एक सप्ताह और बढ़ा दी गई। छात्रों ने आंदोलन के दौरान माणेकचौक स्थित डाक घर को निशाना बनाया, जिसके बाद शहर के ज्यादातर डाक घर अनिश्चितकाल के लिए बंद कर दिए गए। इस दौरान रायपुर दरवाजा बाहर स्थित डाक घर को लूटने का भी प्रयास किया गया। आंदोलन के दौरान छात्रों ने तरह-तरह के कार्यक्रमों के जरिए ब्रिटिश शासकों और पुलिस की नाक में दम कर दिया। छात्रों ने आंदोलन को सफल बनाने के लिए हर संभव प्रयास किए। इस जब भनक लगी कि माणेकचौक स्थित अहमदाबाद शेयर बाजार में गुपचुप सौदे हो रहे हैं, तो छात्रों ने बाजार पर हमला कर उसे बंद करवा दिया। आंदोलन के उस दौर में शहर की स्थिति ऐसी हो गई थी कि रोजाना दोपहर 12 से 3 बजे तक बाजार बंद ही रहा करते थे। विद्यार्थी हड़ताल तो 9 अगस्त से जारी ही थी। मिलें भी उसी दिन से बंद थीं। अहमदाबाद मजदूर महाजन संघ ने 23 नवंबर से मजदूरों को काम पर लौटने की अपील की। साढ़े तीन माह बाद मिलें चलने लगीं।

दीपावली पर दीप नहीं जले, बमों के हुए धमाके

इससे पूर्व शहर में प्रकाश पर्व दीपावली नहीं मनाई गई। शहर में किसी ने पटाखे नहीं छोड़े, लेकिन दीवाली के जाते ही जगह-जगह बमों के धमाके शुरू हो गए। आंदोलनकारियों ने अहमदाबाद विद्युत कम्पनी के छह सब स्टेशनों को विस्फोट से उड़ा दिया। 7 दिसंबर को दोपहर तीन बजे दाणापीठ (खमासा) स्थित दसक्रोई तहसीलदार कार्यालय को पेट्रोल छिडक़ कर फूंक दिया गया। 9 दिसंबर को आंदोलन के चार माह पूर्ण होने के दिन कई कार्यक्रम हुए, जिनमें भारी पथराव और बमबमारी की गई। इस दौरान ढाल की पोल में रहने वाले छात्र रसिकलाल जानी की पुलिस की गोली से मौत हो गई।

जारी रही शहादतें

9 जनवरी, 1943 को आंदोलन के पांच माह पूर्ण होने के अवसर पर रायपुर शामळा की पोल के पास आयोजित कार्यक्रम में पुलिस की गोलीबारी में सिटी हाईस्कूल के दसवीं कक्षा के छात्र गुणवंतलाल माणेकलाल शाह के सीने में गोली उतर गई। बदा पोल-ढाळ की पोल में रहने वाला शाह शहीद हो गया। अगले दिन 10 जनवरी को कर्फ्यू के दौरान खाडिया में सुथारवाडा की पोल में 15 वर्षीय पुष्पवदन त्रिकमलाल मेहता ने जैसे ही खिडक़ी से बाहर झांका, अंग्रेज अधिकारी ने गोली चला दी और पुष्पवदन शहीद हो गया। 9 मार्च को शामला की पोल के नुक्कड़ पर पुलिस गोलीबारी में वसंतलाल मोहनलाल रावल नामक छात्र शहीद हो गया। आंदोलन का यह सिलसिला लगातार चलता रहा। पाँच साल सात दिन बाद स्वतंत्रता पांच साल सात दिन बाद भारत में स्वतंत्रता का सूर्योदय हुआ, लेकिन इस स्वतंत्रता की पक्की नींव रखने वाले भारत छोड़ो आंदोलन में अहमदाबाद के विद्यार्थियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा, जिसे कभी नहीं भुलाया जा सकेगा। गुजरात कॉलेज परिसर में स्थापित किनारीवाला का स्मारक आज भी पुराने संस्मरणों का ताजा करता है।

ये हैं अहमदाबाद के बलिदानी :

उमाकांत मोतीभाई कडिया – 9.8.1942

विनोद जमनादास किनारीवाला – 10.8.1942

नारणभाई मोहनभाई पटेल – 25.9.1942

नानूभाई कानजीदास पटेल – 30.9.1942

नंदलाल कानजीभाई जोशी – 30.9.1942

नरहरि माणेकलाल रावल – 3.10.1942

नाथालाल सोमचंद शाह – 9.11.1942

गोरधनदास छगनलाल रामी – 29.11.1942

गुणवंतलाल माणेकलाल शाह – 9.1.1943

पुष्पवदन त्रिकमलाल मेहता – 10.1.1943

वसंतलाल मोहनलाल रावल – 9.3.1943

जयवंतीबेन संघवी – 6.4.1943

मधुकांत डाह्यालाल सोनी – 2.10.1943

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