सटीक विश्लेषण : बनासकाँठा का बम, पोरबंदर-पाटण का पंच और कच्छ का करंट किसे देगा झटका ?

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विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

लोकसभा चुनाव 2019 के लिए आज पाँचवें चरण में 7 राज्यों की 51 सीटों के लिए मतदान हो रहा है, परंतु हम बात आपको 13 दिन पीछे तीसरे चरण की ओर लिए चलते हैं, जब 15 राज्यों की 117 सीटों के लिए मतदान हुआ था। इसी चरण में गुजरात की सभी 26 लोकसभा सीटों के लिए मतदान हुआ था और गुजरात ने 23 अप्रैल को अपने इतिहास का अब तक का सबसे ऊँचा 64.11 प्रतिशत मतदान का रिकॉर्ड दर्ज कराया था।

चुनाव आयोग (EC) की ओर से आज जारी किए गए तीसरे चरण के मतदान के अंतिम अधिकृत आँकड़ों ने हमें फिर एक बार गुजरात में गत 23 अप्रैल को हुए मतदान के प्रतिशत का सटीक विश्लेषण करने और परिणाम की ओर इशारा करने की प्रेरणा दी है। गुजरात में 1967 के बाद पहली बार यानी 52 वर्षों बाद मतदान का नया रिकॉर्ड स्थापित हुआ है। मतदान प्रतिशत में 2014 के मुकाबले 0.79 प्रतिशत वृद्धि हुई है, वहीं इस वृद्धि में राज्य की 26 में से 18 लोकसभा सीटों के मतदाताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जहाँ 2014 की अपेक्षा मतदान बढ़ा है।

वलसाड का वट मोदी पर मुहर ? अमरेली का आलस्य धानाणी को फलेगा ?

लोकसभा चुनाव 2019 में बढ़-चढ़ कर भाग लेने के मामले में वलसाड़ का वट रहा, जबकि अमरेली ने आलस्य दिखाया। 23 अप्रैल को हुए मतदान में गुजरात में वलसाड लोकसभा सीट पर सर्वाधिक 75.21 प्रतिशत मतदान हुआ, तो अमरेली ने आलस्य दिखाते हुए सबसे कम 55.75 प्रतिशत मतदान ही किया। केन्द्र और राज्य की राजनीति के लिए वलसाड तथा अमरेली दोनों ही अत्यंत महत्वपूर्ण सीट है। वलसाड इसलिए महत्वपूर्ण सीट है, क्योंकि पिछले कई चुनावों से यह मिथक और परम्परा बनी हुई है कि जो पार्टी वलसाड सीट जीतती है, उसी पार्टी का व्यक्ति केन्द्र में प्रधानमंत्री बनता है। वलसाड ने इस बार 2014 के मुकाबले 1.21 प्रतिशत अधिक मतदान किया है। क्या इसका यह मतलब निकाला जाए कि वलसाड ने फिर एक बार भाजपा को जिता कर प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी के नाम पर मुहर लगा दी है ? यह भी संभव है कि बढ़ा हुआ मतदान कांग्रेस के पक्ष में गया हो, परंतु क्या कांग्रेस इस 1.21 प्रतिशत बढ़े मतदान से वलसाड सीट जीत कर राहुल गांधी के नाम पर प्रधानमंत्री पद की मुहर लगवाने में सफल हो पाएगी ? अब अमरेली की बात करते हैं। अमरेली सीट गुजरात की राजनीति में कांग्रेस और विधानसभा में विपक्ष के नेता परेश धानाणी दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। अमरेली के मतदाताओं ने 2014 की मोदी लहर में भी आलस्य दिखाया था, फिर भी जीत भाजपा की हुई थी। हालाँकि 2019 में भी सबसे कम मतदान का रिकॉर्ड अमरेली के नाम दर्ज हुआ है, परंतु 2014 के मुकाबले अमरेली में 1.54 प्रतिशत मतदान बढ़ा है। यह बढ़ा हुआ मतदान क्या यह दर्शाता है कि लोगों ने गुजरात के कद्दावर कांग्रेस नेता परेश धानाणी के पक्ष में जम कर वोटिंग की ? वैसे कम मतदान में कांग्रेस जीतती है। 2014 में तो मोदी लहर थी। कदाचित इसलिए कम मतदान के बावजूद भाजपा जीत गई, परंतु 2019 में कोई लहर दिखाई नहीं दे रही थी। ऐसे में कम मतदान परेश धानाणी के लिए जीत का रास्ता खोलेगा या फिर बढ़ा हुआ मतदान भाजपा की जीत बरकरार रखेगा ? इन सभी सवालों के जवाब 23 मई को ही मिलेंगे।

बनासकाँठा की छलांग का क्या मतलब ?

गुजरात यदि लोकसभा चुनाव 2019 में अब तक का सबसे ऊँचा 64.11 प्रतिशत मतदान कर पाया, तो उसमें सबसे बड़ी भूमिका बनासकाँठा की रही, जहाँ 64.67 प्रतिशत मतदान हुआ। यह मतदान प्रतिशत यद्यपि बहुत भारी नहीं है, परंतु इसमें 2014 के मुकाबले यह 6.39 प्रतिशत की वृद्धि भारी छलांग है। ऐसे में स्पष्ट है कि बनासकाँठा के लोग एक निश्चय के साथ इस बार घरों से मतदान के लिए निकले होंगे। अब यह निश्चय किसके पक्ष में रहा होगा, यह कह पाना थोड़ा मुश्किल जरूर है, परंतु नाममुकिन नहीं है। जिस तरह गुजरात में विधानसभा चुनाव 2017 की तरह लोकसभा चुनाव 2019 में मोदी और भाजपा विरोधी कोई माहौल नहीं था, उसे देखते हुए ये तो पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि लोग बड़ी संख्या में कांग्रेस को वोट करने के लिए निकले होंगे। फिर भी सही स्थिति तो 23 मई को ही पता चलेगी।

पोरबंदर और पाटण किसे देंगे पटखनी ?

बनासकाँठा के बाद पोरबंदर और पाटण ऐसी सीटें हैं, जहाँ मतदान प्रतिशत में अच्छी-खासी वृद्धि हुई है। पोरबंदर में मतदान वैसे 56.79 प्रतिशत ही रहा, परंतु यह 2014 की मोदी लहर के मुकाबले 4.48 प्रतिशत अधिक है। इसी प्रकार पाटण में 62.05 प्रतिशत मतदान हुआ, जो 2014 के मुकाबले 3.71 प्रतिशत अधिक है। ऐसे में प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि पोरबंदर और पाटण के मतदाताओं ने किसे पटखनी देने के लिए मतदान के प्रतिशत में वृद्धि की है ? क्या सौराष्ट्र का पोरबंदर और उत्तर गुजरात का पाटण 2017 की तर्ज पर कांग्रेस के पक्ष में वोट देने निकला या फिर 2014 की तर्ज पर मोदी को प्रधानमंत्री बनाए रखने के लिए मतदान केन्द्र पहुँचा ?

कच्छ की कठिनाई किस पर पड़ेगी भारी ?

अब बात करते हैं रण प्रदेश और सूखाग्रस्त कच्छ लोकसभा सीट की। कच्छ में इस बार 58.22 प्रतिशत मतदान हुआ है। 2014 के मुकाबले मतदान प्रतिशत में गिरावट के मामले में 3.22 प्रतिशत के साथ कच्छ सबसे ऊपर है। मतदान प्रतिशत में इतनी बड़ी गिरावट दर्शाती है कि अकाल और पानी की तंगी से दो-चार हो रहे कच्छ के लोग कितनी कठिनाई का सामना कर रहे हैं और मतदान के प्रतिशत उनकी उदासीनता इसी कठिनाई की अभिव्यक्ति है। ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि कच्छ की यह कठिनाई किस पर भारी पड़ेगी। कम मतदान का मतलब तो सीधा यही होता है कि कच्छ की जनता ने इस बार अपना सांसद भाजपाई की जगह कांग्रेसी रखना पसंद किया हो सकता है। देखते हैं 23 मई को क्या होता है?

राज्य की प्रत्येक लोकसभा सीट पर हुए मतदान के अंतिम अधिकृत आँकड़े निम्नानुसार हैं :

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