महामारी की कड़वी सच्चाई

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रोजी व रोटी के सपने लेकर कभी बड़े शहर गए थे। जिस शहर ने इन्हें अपनाया था, इन्हें रोजी व रोटी दी थी, आज उसी शहर ने Lockdown में ठुकरा दिया। दो वक्त की रोटी के लिए परिवार को छोड़ने वाले मजदूरों की वापसी दर्द और पीड़ा से भरी हुई है। Lockdown के बाद मालिक से ठुकराए इन श्रमिकों के पास जब परिवार का पेट भरने के लिए जेब में पैसा नहीं बचा तो सरकार के भरोसे न बैठकर घर वापसी के लिए अपने बूते पर सफर कर रहे हैं। सैकड़ों किमी का सफर तय करने में कई बार भूखा ही बच्चों के साथ सोना पड़ा। लेकिन परिवार के साथ सुख की दो रोटी खाने इन श्रमिकों ने इस पीड़ा को नजर अंदाज कर दिया। शनिवार को शहर में आए अलग-अलग श्रमिकों ने अपनी आपबीती सुनाते हुए कहा कि इस Lockdown से अच्छा तो हम मर जाते वह ज्यादा अच्छा होता।

साइकिल पर जाते किसी भी युवक से पूछा जाता है कि वे कैसे परिवार सहित सैंकड़ों किलोमीटर का सफर करेंगे तो वे धीमी आवाज में कहते है, परिवार की जिंदगी बचानी है, भूखे पेट थोड़ी गुजारा होता है।

सरकार की ओर से चाहे मजदूरों के लिए Special Trains चला दी है लेकिन अभी भी हजारों की संख्या में वैसे लोग है जो Registration करवाने के लिए लाइनों में धक्के खा रहे है। किस्मत के मारे इन मजदूरों के छोटे परिवारों की हालत सबसे दयनीय है। कड़ी धूप में साइकिल पर लदे सामान के उपर गहरी नींद में सोए बच्चे को लेकर युवक अपने राज्य की ओर जा रहे है।

धनबाद के तेलमच्चो पुल के पास एक महिला चिलचिलाती धूप में दो बच्चों को कंधे पर बिठाकर गंतव्य की ओर निकली। इस दौरान महिला के हाथ में सामान का थैला भी दिखा। पूछने पर महिला ने सिर्फ इतना बताया कि हम मजदूर हैं, हमारी मजबूरी है, सरकार क्या कर लेगी। जो करना है खुद करना होगा। महिला ने बताया कि वो तेतुलमारी ईंट भट्‌ठा में काम करती थी। Lockdown की वजह से राशन और रुपए खत्म हो गए। भूखे रहने की नौबत आई है। इस वजह से वो अपने घर बंगाल के पुरुलिया जा रही है।लगातार पैदल चलने से मजदूरों के पैरों में छाले पड़ गए हैं।

एक ट्रक में 60 मर्दों के बीच एक महिला यात्रा को विवश है। 3-4 छोटे बच्चों के साथ यह मां 4 दिनों से ट्रक पर यात्रा कर रही है। वह कहती है- मुंबई में पति के साथ रहकर मजदूरी करते थे। नौकरी चली गई। रोटी मिलना मुश्किल हो गया। इस तरह यात्रा करने को विवश हूं।

बिहार के बेगूसराय की रहने वाली 62 वर्षीय कलावती पिछले 6 वर्षों से पश्चिम बंगाल के डानकुनी में रहकर एक Hotel में काम करती थी। Lockdown में Hotel बंद हो गया। पेट भरना मुश्किल हो गया। गांव के लिए पैदल ही निकल पड़ी। 200 Km पैदल चल चुकी हैं। पैरों में छाले पड़ गए हैं।

सरकार को इन मजदूरों की हालत देखते हुए इनके लिए उचित प्रबंद करने चाहिए  जैसे नगरपालिका के हिसाब से इन राहगीरों के लिए खाने और पानी की व्यवस्था करनी चाहिए। थोड़ी थोड़ी दूरी पर पानी के टैंकर खड़े करने चाहिए और साथ में खाने के लिए बिस्किट, फल, रोटी आदि के पैकेट बना कर रखने चाहिए तांकि जो राहगीर है वह अपनी भूख मिटा सकें। इन मजदूरों की हालत के लिए कहीं न कहीं हम सब ही ज़िम्मेदार हैं इसके लिए सरकार को राज्य सरकारों को साथ मिलकर  प्रबंद करने ही चाहिए।

योजनाओं का लाभ तब ही है जब इन प्रवासी मज़दूरों को भूख के कारण नहीं मरना पड़ेगा।

यह एक कड़वी सच्चाई है कि महामारी है इसलिए हजारों किलोमीटर पैदल चल रहे हैं मजदूर, चुनावी रैली होती तो बस भी फ्री होती और नाश्ता भी ।

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