अंग्रेजी कानूनों के पेंच में फँसा देश : 21वीं सदी में 19वीं सदी के कानून से चल रही डाक सेवा

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रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 18 जुलाई 2019 (युवाpress)। पीएम नरेन्द्र मोदी की सरकार NEW  INDIA  के मार्ग पर आगे बढ़ रही है और DIGITAL  INDIA, STARTUP INDIA  के नारे दे रही है, वहीं दूसरी तरफ देश कुछ ऐसे बुजुर्ग कानूनों का बोझ अपने कंधों पर ढो रहा है, जो सदियों पुराने हैं। जैसे कि हमारे यहाँ आज जो डाक सेवा चल रही है, वह 1898 यानी 19वीं सदी के कानून के हिसाब से चल रही है। इतना ही नहीं, भारतीय रेलवे बोर्ड 1905 यानी 20वीं सदी के कानून के हिसाब से चल रहा है। ऐसे तो कई उदाहरण हैं, परंतु अच्छी बात यह है कि वर्तमान मोदी सरकार ने ऐसे बुजुर्ग कानूनों को रिटायरमेंट देने का काम शुरू किया है।

58 कानूनों को खत्म करने के विधेयक को मंजूरी

2014 से केन्द्र की सत्ता में आरूढ़ मोदी सरकार ने देश के 1,824 पुराने कानूनों को खत्म करने का बीड़ा उठाया है। इसके लिये मोदी सरकार के मंत्रिमंडल ने निरसन और संशोधन विधेयक 2019 को मंजूरी दे दी है। इस विधेयक को संसदीय मंजूरी मिलने के बाद अपनी प्रासंगिकता खो चुके इन कानूनों का अस्तित्व खत्म हो जाएगा। मोदी सरकार ने जिन 1,824 कानूनों को खत्म करने का बीड़ा उठाया है, उनमें से 1200 कानूनों को पहली सरकार के दौरान खत्म किया जा चुका है। दूसरे भाग में कुल 137 कानूनों को खत्म किया जाना है, जिनमें से 58 कानून इस विधेयक की संसदीय मंजूरी के साथ खत्म हो जाएँगे।

पहले टर्म में 1200 पुराने कानून खत्म कर चुकी मोदी सरकार

सरकारी सूत्रों की मानें तो जो कानून खत्म किये जा रहे हैं, उनमें से अधिकांश कानून अंग्रेजी शासन काल के और 19वीं तथा 20वीं सदी के हैं। सरकारी सूत्रों के अनुसार खत्म किये जाने वाले अधिकांश कानून ऐसे हैं जो अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं। प्रमुख कानूनों में संशोधन लागू किये जाने के साथ ही यह पुराने कानून अब किसी काम के नहीं रहे। मात्र कानून की किताबों में ही इनका स्वतंत्र रूप में अस्तित्व रखना बेमानी हो गया है और यह अब केवल कानूनी व्यवस्था को बाधित करने का ही काम कर रहे हैं। इसलिये सरकार ने इन्हें खत्म करने का निर्णय किया था। मोदी सरकार ने 2014 में सत्ता में आने के बाद ही पुराने कानूनों को खत्म करने के लिये एक दो सदस्यीय समिति का गठन किया था। समिति ने खत्म किये जाने वाले कानूनों की सिफारिश करते समय केन्द्र और राज्य सरकारों से भी बात की थी। इसके बाद सरकार ने अपने पहले टर्म में 1950 से लेकर 2001 के बीच बने ऐसे 1200 कानूनों को खत्म किया, जो विभिन्न प्रमुख कानूनों में संशोधन के बाद अप्रासंगिक हो गये थे। अब सरकार अपने दूसरे टर्म में जिन 58 अप्रासंगिक कानूनों को खत्म करने जा रही है, उनमें गंगा चुंगी कानून-1867 शामिल है, जिसके तहत गंगा सहित विभिन्न नदियों में चलने वाली नौकाओं तथा स्टीमरों पर अधिकतम 12 आना यानी 75 पैसे चुंगी वसूली जाती थी। इसके अलावा हैकनी कैरिज एक्ट-1979 भी खत्म किया जाएगा, जिसके तहत घोड़ा गाड़ियों का नियमन और नियंत्रण किया जाता था। इसी प्रकार ब्रिटिश शासन के विरुद्ध नाटकों के माध्यम से किये जाने वाले विरोध प्रदर्शन को रोकने के लिये ब्रिटिश शासन ने ड्रामैटिक परफॉर्मेंस एक्ट-1876 बनाया था, इसे भी अब खत्म किया जा रहा है।

12 साल पहले की गई थी पुराने कानूनों को बदलने की सिफारिश

वैसे प्रशासनिक विधि समीक्षा आयोग (कमीशन ऑन रिव्यू ऑफ एडमिनिस्ट्रेटिव लॉ) तो 12 साल पहले ही 1300 पुराने और अनुपयोगी हो चुके कानूनों को बदलने की सिफारिश कर चुका है, परंतु इसके बावजूद सरकारी कानूनों की सूची में दर्जनों पुराने कानून मौजूद हैं और लागू हैं।

  • राजधानी दिल्ली को ही लीजिए। कितनी बदल चुकी है दिलवालों की दिल्ली, फिर भी 1958 का रेंट कंट्रोल एक्ट अभी तक गले की फाँस बना हुआ है।
  • कुष्ठ रोग लाइलाज नहीं रहा, परंतु अभी भी इसे आधार बनाकर जीवनसाथी से तलाक लिया जा सकता है। क्योंकि देश में अभी भी 1869 में बना तलाक का कानून लागू है।
  • देश की डाक सेवा 21वीं सदी में भी 1898 यानी 19वीं सदी के कानून के हिसाब से ही चल रही है।
  • ऑस्ट्रेलिया की जितनी कुल आबादी है, भारत में उतनी आबादी ट्रेनों में यात्रा करती है, मगर भारतीय रेलवे बोर्ड 1905 में बने कानून के तहत चलता है।
  • देश में 1880 का काजी एक्ट आज भी लागू है और 1879 का लीगल प्रैक्टीशनर्स एक्ट भी लागू है।
  • किसानों के कर्ज से जुड़ा कानून 1884 का है और फैक्ट्रीज एक्ट 1948 का।
  • गंगा के पुल पर चुंगी आज भी 1867 के कानून के तहत लगती है और सरकारी इमारतें 1899 के कानून के तहत आती हैं।
  • हद तो यह है कि आधुनिक रेस्टोरेंट्स पर भी 1867 का सराय कानून लागू होता है जो यात्रियों को पानी पिलाने के लिये बना था। पुराने कानूनों की कथा और प्रथा बहुत लंबी है, क्योंकि भारत की सरकारें उठा-पटक की राजनीति, चुनावी राजनीति और आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति से ऊपर उठकर सोच ही नहीं पाती हैं। ऐसे में सही समय पर कानूनों की समीक्षा नहीं हो पाती है और बुजुर्ग कानून आज की जनरेशन के कंधों पर बोझ बढ़ाते रहते हैं।
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