मोदी सरकार 2.0 : इस दमदार ‘चौकड़ी’ के समक्ष है कई ‘चक्रव्यूह’ भेदने की ‘चुनौती’

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* गृह मंत्री अमित शाह : कश्मीर को वास्तव में भारत का अभिन्न अंग बनाना मुख्य लक्ष्य

* विदेश मंत्री जयशंकर : ‘प्रथम ग्रासे मक्षिका’, ट्रम्प को रिझाने की करनी होगी मशक्कत

* रक्षा मंत्री राजनाथ : चीन-पाकिस्तान से सावधान रहते हुए सेना की सुसज्जता की तैयारी

* वित्त मंत्री निर्मला : घटी विकास दर-बढ़ी बेरोजगारी, बजट से सुधारने होंगे बिगड़े हालात

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 1 जून, 2019 (युवाप्रेस.कॉम)। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में मोदी सरकार 2.0 ने औपचारिक रूप से शुक्रवार को मंत्रिमंडल की पहली बैठक के साथ ही कार्यारंभ कर दिया था, परंतु मंत्रिमंडल में शामिल किए गए मंत्री अब एक-एक करके अपने मंत्रालय में कार्यभार संभालेंगे और कार्यारंभ करेंगे।

वैसे तो जिस मंत्रिमंडल का नेतृत्व नरेन्द्र मोदी जैसे प्रधानमंत्री कर रहे हों, उसके प्रत्येक सदस्य का कार्य विशेष और महत्वपूर्ण हो जाता है, परंतु इसके बावजूद अगले पाँच वर्षों तक पूरे देश की निगाहें मंत्रिमंडल की उस चौकड़ी पर रहने वाली है, जिस पर मोदी ने न केवल बहुत बड़ा विश्वास व्यक्त करते हुए उन्हें यह अत्यंत महत्वपूर्ण और बड़ा उत्तरदायित्व दिया है, अपितु इस चौकड़ी के समक्ष सात द्वारों वाले नहीं, अपितु अनेक अनेक द्वारों वाले अनेक चक्रव्यूहों को भेदने की चुनौती है। इस चौकड़ी में शामिल मंत्रियों के नाम हैं गृह मंत्री अमित शाह, विदेश मंत्री एस. जयशंकर, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन। इस चौकड़ी पर घर से लेकर सीमा और अर्थ से लेकर विदेश तक भारत की स्थिति में सुधार लाने का उत्तरदायित्व है। आइए, एक-एक कर

अमित शाह

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के शपथ लेने का क्रम भले ही 3 रखा, परंतु गृह मंत्रालय देकर उन्हें अपने आप ही मंत्रिमंडल में नंबर 2 का स्थान दे दिया। शाह को गृह मंत्रालय देने के पीछे मोदी की सोची-समझी रणनीति है। भाजपा ने अपने संकल्प पत्र में जो वायदे किए हैं, उनमें कुछ वायदे ऐसे हैं, जिन्हें पूरा करने के लिए शाह जैसे मजबूत गृह मंत्री की आवश्यकता थी। इन वायदों में कश्मीर से धारा 370 और अनुच्छेद 35ए हटाना शामिल है। ये दोनों ऐसी धाराएँ हैं, जो भारत के अभिन्न अंग कहलाने वाले कश्मीर को भारत का वास्तविक अभिन्न अंग बनने से रोकती हैं। शाह ने पूरे चुनावी अभियान के दौरान इन दोनों धाराओं को हटाने का जोर-शोर से वादा दोहराया है और साथ ही साथ शाह के वादे के विरुद्ध तथाकथित कश्मीर एवं कश्मीरी हितैषी नेताओं फारूक़ अब्दुल्ला, ओमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती के राष्ट्र विरोधी बयान भी सामने आए। ऐसे में शाह के समक्ष कश्मीर और कश्मीरियों के हितों की रक्षा करते हुए लोगों को यह समझाने की कवायद करनी होगी कि 370 और 35ए को हटाना कश्मीर के हित में है। इनके हटने से कश्मीर भारत के विकास की मुख्य धारा से जुड़ेगा और उसका भी विकास होगा। इतना ही नहीं, शाह के समक्ष नेशनल सिटिज़न चार्ट (NRC) का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है, जिसे शाह पूरे देश में लागू करने की बात कह चुके हैं। इसके अलावा भी शाह के समक्ष पश्चिम बंगाल में बांग्लादेशियों की घुसपैठ, रोहिंग्या मुसलमानों की समस्या, नक्सलवाद की समस्या भी सुलझाने की बड़ी चुनौती रहेगी। साथ ही उन्हें मोदी सरकार 1 में हुए मॉब लिंचिंग, गोरक्षकों की हिंसा जैसी घटनाओं के प्रति भी सावधान रहना होगा।

एस. जयशंकर

भारतीय विदेश सेवा (IFS) के अधिकारी एस. जयशंकर भारत सरकार में लम्बी और सफल सेवा दे चुके हैं। मनमोहन सरकार में वे देश के विदेश सचिव थे। इतना ही नहीं, मनमोहन के पसंदीदा अधिकारी भी थे, तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी एस. जयशंकर की एक अधिकारी के रूप में धारदार विदेश नीति से परिचित और प्रभावित थे। इसीलिए मोदी ने अपने दूसरे कार्यकाल में एस. जयशंकर को न केवल सीधे सरकार में ले लिया, अपितु केबिनेट मंत्री और वह भी विदेश मंत्री बना कर बड़ी जिम्मेदारी दी है। चीन के साथ डोकलाम विवाद हल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले जयशंकर की कूटनीतिक सूझबूझ की कसौटी करते हुए पीएम मोदी ने सुषमा स्वराज की जगह जयशंकर को यदि विदेश मंत्री बनाया है, तो जयशंकर के समक्ष सबसे पहली चुनौती अमेरिका और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की तरफ से आई है। ट्रम्प भारत और प्रधानमंत्री मोदी की टैरिफ पॉलिसी से रुष्ट हैं। ट्रम्प ने शुक्रवार को ही कहा कि भारत को जनरलाइज़्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंसेज़ (GSP) से बाहर करने का निर्णय 5 जून से लागू हो जाएगा, क्योंकि भारत ने अपने बाजार में अमेरिका को समान व उचित पहुँच उपलब्ध करवाने का भरोसा नहीं दिया है। ट्रम्प ने गत 4 मार्च को ही भारत को जीएसपी से बाहर करने का ऐलान किया था। इसके लिए 60 दिन का नोटिस पीरिडय तय किया गया था, जो 3 मई को समाप्त हो चुका है। जीएसपी के तहत भारत जो उत्पाद अमेरिका भेजता है, उन पर वहाँ आयात शुल्क नहीं लगता, परंतु ट्रम्प के इस निर्णय से अब शुल्क लगेगा। जयशंकर के समक्ष अब रुष्ट अमेरिका को रिझाना सबसे पहली और बड़ी चुनौती है, तो उन्हें चीन और पाकिस्तान की कूटनीतिक चालबाजियों से भी पार पाना होगा। इसके अलावा भी विदेश मंत्री के रूप में जयशंकर के विदेश अधिकारी के अनुभव भारत और मोदी के लिए उपयोगी साबित हो सकते हैं।

राजनाथ सिंह

मोदी सरकार में नंबर 3 राजनाथ सिंह पिछले पाँच वर्षों के दौरान गृह मंत्री के रूप में देश के भीतर और सीमाओं पर देश विरोधी शक्तियों के विरुद्ध लगातार एक्शन में दिखे। अब राजनाथ सिंह को रक्षा मंत्रालय की कमान सौंपी गई है। राजनाथ के समक्ष देश की तीनों सेनाओं को मजबूत, सुदृढ़ और आधुनिक बनाने की चुनौती है, वहीं चीन और पाकिस्तान की सीमाओं पर होने वाली हलचलों का अनुकूल जवाब देने की रणनीति के साथ काम करने की भी चुनौती है। राजनाथ सिंह को अपनी पूर्वाधिकारी निर्मला सीतारमन की ओर से सेना के आधुनिकीकरण से जुड़े किए गए कई कार्यों, कई रक्षा सौंदों की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का काम करना होगा, तो साथ ही राफेल डील का मुद्दा अभी भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है और यदि कोर्ट का कोई निर्णय प्रतिकूल आया, तो उस स्थिति में विपक्ष के लिए राफेल फिर एक बार गर्म मुद्दा बन सकता है। ऐसे में निर्मला सीतारमन ने जिस तरह राफेल पर कांग्रेस और राहुल गांधी के हर हमले का माकूल जवाब दिया, राजनाथ को भी ऐसी ही आक्रमक रणनीति अपनानी होगी।

निर्मला सीतारमन

इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री होने के साथ-साथ देश की पहली महिला वित्त मंत्री रह चुकी हैं, परंतु निर्मला सीतारमन देश की प्रथम पूर्णकालिक महिला वित्त मंत्री बनाई गई हैं। इससे पहले निर्मला मोदी सरकार 1 में भी देश की पहली पूर्णकालिक रक्षा मंत्री बनी थीं। इससे पूर्व वाणिज्य मंत्रालय और उसके बाद रक्षा मंत्रालय का जिम्मा संभाल चुकीं निर्मला के समक्ष वित्त मंत्री के रूप में चुनौतियाँ कम नहीं हैं, बल्कि चुनौतियों का अंबार है। नए मंत्रिमंडल की पहली ही बैठक में 2019 की प्रथम तिमाही में विकास दर में भारी गिरावट और बेरोजगारी दर 45 साल के सबसे उच्चतम् स्तर पर पहुँचने के आँकड़ों ने निर्मला को आगामी समय में कड़ी कसौटी में डाल दिया है। देश की अर्थ व्यवस्था को पटरी पर लाने और बेरोजगारी सहित कई आर्थिक मुद्दों पर देश को आगे बढ़ाने का काम अब निर्मला सीतारमन को करना होगा। उन्हें कम समय में फिर एक बार देश के लिए ऐसा पूर्ण बजट प्रस्तुत करना होगा, जो अर्थ व्यवस्था को गति दे, उद्योग-धंधों को आगे बढ़ाए और बेरोजगारी सहित कई आर्थिक मुद्दों पर देश की स्थिति में सुधार करे।

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