कर्मयोगी मोदी : वह शपथ, जिसके बाद जगी सेवा की अलख 1,31,480 घण्टों से जारी है…

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विशेष टिप्पणी : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 7 अक्टूबर, 2001 (युवाPRESS)। श्रीमद् भगवद गीता में कई प्रकार कई प्रकार के कर्म बताए गए हैं, सकाम कर्म, निष्काम कर्म, अकर्म और विकर्म। सकाम कर्म अर्थात् किसी भी परिणाम (फल) की इच्छा से किया जाने वाला कर्म, जो आज आधुनिक आपाधापी से भरे युग में 99 प्रतिशत लोग करते हैं। निष्काम कर्म अर्थात् कामना से रहित कर्म। ऐसा कर्म, जो लोककल्याणार्थ किया जाता है। यह बहुत ही सरल भी है और कठिन भी। बस, व्यक्ति के मन पर निर्भर करता। ऐसा नहीं है कि निष्काम कर्म का कोई फल नहीं मिलता, अपितु सर्वोत्तम फल निष्काम कर्म से ही मिलता है और वह फल होता है अंत:करण यानी चित्त की शुद्धि। इसके बाद आता है अकर्म। इसकी व्याख्या निष्काम कर्म से मिलती-जुलती है, बल्कि यूँ कहें कि निष्काम भाव से कर्म करते हुए एक स्थिति ऐसी आती है, जब व्यक्ति हर कर्म करते हुए भी अकर्मी बनी जाता है। वह कर्म करता दिखाई देता है, परंतु भीतर से वह अकर्ता ही रहता है। अब विकर्म यानी वह कर्म, जो शास्त्र निषिद्ध हैं। शास्त्र निषिद्ध कर्म करने वालों को विकर्मी कहा जाता है।

इन चारों प्रकार के कर्मों में व्यक्ति कर्म तो करता ही है, परंतु हर कर्म व्यक्ति को कर्मयोगी नहीं बनाता। पहले तो कर्मयोगी की व्याख्या बताते हैं। कर्मयोग अर्थात् ऐसा कर्म, जो ईश्वर से योग कराए। जैसा कि भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है, केवल और केवल निष्काम कर्म करने वाला व्यक्ति ही अंतत: अकर्मी बनते हुए कर्मयोग को प्राप्त होता है अर्थात् कर्मयोगी कहलाता है। गीता में कृष्ण के कहे इस उपदेश का अर्थघटन आज के युग में अलग-अलग पद्धतियों से किया जाता है, परंतु कृष्ण की कर्मयोगी की व्याख्या न कभी बदली है और न कभी बदलेगी। आज के स्वार्थपरक युग में भी जो निष्काम भाव से कर्म करेगा, वही कर्मयोगी कहलाएगा। यद्यपि कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति के कर्म के बारे में कोई अवधारणा नहीं बांध सकता कि उस व्यक्ति का कर्म निष्काम कर्म ही है। यह तो निष्काम कर्म करने वाला व्यक्ति स्वयं ही समझ सकता है कि वह जो कर्म कर रहा है, वह वास्तव में निष्काम कर्म है या नहीं। यदि है, तो वह अवश्य ही कर्मयोगी कहलाने का अधिकारी है। कर्मयोगी होने के मापन का तराज़ू हर व्यक्ति के भीतर ही होता है। इसके बावजूद कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं, जो किसी व्यक्ति के कर्म को देख कर उसके कर्मयोगी होने या न होने का अनुमान लगा लेते हैं। जिन्हें सही परख होती है, वह एक सच्चे कर्मयोगी को पहचान लेते हैं और उसके हर कर्म को (फिर भले वह सांसारिक व्यवहार में सकाम कर्म-सा दिखाई दे) निष्काम भाव से किया हुआ कर्म ही समझते हैं।

कर्म की यह व्याख्या यहाँ इसलिए दी गई है, क्योंकि आज भारत के राजनीतिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण दिवस है। वैसे तो 7 अक्टूबर को लाखों घटनाएँ घटी होंगी, परंतु 18 वर्ष पूर्व देश की राजधानी दिल्ली से 930 किलोमीटर दूर गुजरात की राजधानी गांधीनगर में जो घटना घटी थी, वह कोई साधारण घटना नहीं थी। उस दिन एक राजनीतिक दल के एक साधारण कार्यकर्ता ने जो शपथ ली थी, उसे लेकर किसी को उस समय अनुमान तक नहीं था कि एक साधारण राजनीतिक दल का एक साधारण राजनीतिक कार्यकर्ता अपनी उस शपथ को सेवा की अखंड अलख बना लेगा। उस साधारण कार्यकर्ता का नाम है नरेन्द्र मोदी। वह 7 अक्टूबर, 2001 रविवार का ही दिन था, जब नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी-BJP) की सांगठनिक यात्रा करते हुए गांधीनगर में ‘हूँ नरेन्द्र दामोदरदास मोदी…’ के उद्गार के साथ गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में पद एवं गोपनीयता की शपथ ग्रहण की थी और संगठक से शासक के रूप में अपनी यात्रा का शुभारंभ किया था। संगठन में रह कर केवल संगठन के लिए कार्य करना होता है, परंतु शासक के रूप में जनता की सेवा ही मुख्य उद्देश्य बन जाता है।

कठिन परिस्थितियों में संभाली गुजरात की बागडोर

26 जनवरी, 2001 को गुजरात को शक्तिशाली भूकंप ने झकझोर दिया था। कच्छ से लेकर अहमदाबाद तक विनाश के दृश्य थे। प्रकृति के इस प्रकोप से निपटना किसी भी सरकार के लिए अत्यंत कठिन कार्य था। जब भूकंप आया, तब केशूभाई पटेल मुख्यमंत्री थे। पटेल के शासन-प्रशासन को लेकर जनता में पहले ही असंतोष था, जो उसने अक्टूबर-2000 में हुए छह महानगर पालिका चुनावों में भाजपा को हरा कर व्यक्त कर दिया था। भूकंप के बाद पुनर्वास को लेकर भी राज्य की केशूभाई पटेल सरकार लगातार घिरती जा रही थी और पार्टी का जनाधार खिसक रहा था। ऐसे में भाजपा हाईकमान ने अपने सबसे मज़बूत गढ़ गुजरात में पार्टी को पुन: सुदृढ़ करने के उद्देश्य से केशूभाई पटेल के स्थान पर नरेन्द्र मोदी को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाने का निर्णय किया। 4 अक्टूबर, 2001 को मोदी को गुजरात भाजपा विधायक दल ने अपना नेता निर्वाचित किया और 7 अक्टूबर, 2001 को मोदी ने कठिन परिस्थितियों में गुजरात के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। मोदी के सामने भूकंप पुनर्वास सहित बड़ी शासनिक चुनौतियाँ थीं, तो जनता के बीच पार्टी संगठन में पुन: विश्वास पैदा करने की चुनौतियाँ थीं। मोदी ने गुजरात की सत्ता संभालते ही इन चुनौतियों से एक-एक कर निपटना आरंभ किया।

6,574 दिनों से जारी सेवा की अलख

नरेन्द्र मोदी ने 7 अक्टूबर, 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेकर जन सेवा की जो अलख जगाई, वह गोधरा कांड, उसके बाद हुए दंगों से लेकर पार्टी के आंतरिक विरोधों जैसे अनेक ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों-पड़ावों को पार करते हुए इतनी प्रज्वलित हुई कि मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने गुजरात विधानसभा के तीन चुनाव 2002, 2007 और 2012 में विजय प्राप्त की। मोदी ने गुजरात में 13 वर्षों तक मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया और विकास को अपना मंत्र बनाया, परंतु उनका यह विकास मंत्र गुजरात तक सीमित या संकीर्ण नहीं रहा। एक छोटे-से राज्य के मुख्यमंत्री होते हुए भी मोदी ने सदैव अपने विकास मंत्र को ‘भारत के लिए गुजरात का विकास’ का स्वरूप दिया। इस विकास वाक्य में मोदी का भारत की सेवा करने का संकल्प स्पष्ट रूप से झलकता था और अंतत: 26 मई, 2014 को मोदी का यह संकल्प भी साकार हुआ, जब उन्होंने 13 वर्ष पूर्व ‘हूँ नरेन्द्र दामोदरदास मोदी…’ के उद्गार के साथ ली गई शपथ को ‘मैं नरेन्द्र दामोदारदास मोदी’ के उद्गार के साथ प्रधानमंत्री के रूप में दोहराया। मोदी ने फिर 30 मई, 2019 को दोबारा प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। आज जब 7 अक्टूबर, 2019 है, तो स्पष्ट है कि मोदी के एक शासक के रूप में 18 वर्ष पूर्ण हुए हैं और यदि दिनों में हिसाब लगाएँ, तो वे गुजरात के मुख्यमंत्री से लेकर भारत के प्रधानमंत्री के रूप में 6,574 दिनों से जनता की सेवा में लगे हुए हैं।

माँ भारती को समर्पित रहे 1,31,480 घण्टे

नरेन्द्र मोदी को यहाँ आधुनिक कर्मयोगी कहने का साहस कर रहा हूँ, क्योंकि वे अपने जीवन का हर क्षण माँ भारती को समर्पित करके ही कर्म करते आए हैं, फिर चाहे वे संगठन में हों या सरकार में। बात जहाँ तक संगठन की है, तो मोदी ने एक सीमित दायरे में रह कर जनता की सेवा करने का प्रयास किया, परंतु यदि सत्ता की बात करें, तो उन्होंने जनादेश प्राप्त कर अधिकार के साथ जनता और राष्ट्र की सेवा का यज्ञ आरंभ किया। मोदी के बारे में अक्सर कहा जाता है कि वे केवल 4 घण्टों की नींद लेते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि शेष 18 घण्टे वे कार्य करते हैं, परंतु कौन-से कार्य ? उनके कई साक्षात्कारों में यह बात स्पष्ट रूप से उभर कर आती है कि मोदी जब तक जागते हैं, तब तक जनता और देश की सेवा का ही चिंतन करते हैं। लोकसभा चुनाव 2019 से पहले बॉलीवुड अभिनेता अक्षय कुमार ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का अराजनीतिक साक्षात्कार लेने के बाद एक इंटरव्यू में कहा था, ‘नरेन्द्र मोदी एक ऐसे व्यक्ति हैं, जो जितने समय जागते हैं, उतने समय केवल और केवल भारत यानी देश का ही चिंतन करते हैं। उनके मन में कोई और विचार आता ही नहीं है।’ मोदी यदि 24 में से 4 घण्टे ही नींद लेते हैं, तो इसका अर्थ यह हुआ कि एक शासक के रूप में मोदी 5,574 दिनों में केवल 26,296 घण्टे ही सोए और 1,31,480 घण्टे उन्होंने केवल और केवल कार्य ही किया। मोदी की यह अत्यंत व्यस्त और जटिल कार्यशैली आज कर्म का पर्याय बन चुकी है। मोदी को यहाँ कर्मयोगी इसलिए भी कहा जा सकता है, क्योंकि जनता के प्रतिनिधि के रूप में सार्वजनिक जीवन में आने से पहले या बाद भी, उन्होंने कभी-भी अपने व्यक्तिगत हित या पारिवारिक हित के लिए कोई कार्य नहीं किया। यहाँ तक कि मोदी ने पूरे देश को ही अपना परिवार बना लिया और सेवा की अलख को अखंड बनाए रखा। मोदी को राजनीतिक चश्मे से देखने वाले या अन्य विरोधी भले ही उनके किसी भी कार्य के पीछे उनकी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा को देखते हों, परंतु इस बात पर तो सभी सहमत हैं कि मोदी का कोई भी कार्य उनके अपने लिए नहीं होता। उनके हर कार्य में सर्वोपरि देश होता है। मोदी के एक शासक के रूप में आज 18 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर युवाPRESS भी यही शुभकामनाएँ व्यक्त करता है कि नरेन्द्र मोदी चिरकाल तक राष्ट्र की सेवा करते रहें।

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