जन्म दिवस विशेष : ऐसा है विश्व की द्वितीय महिला अंतरिक्ष यात्री सुनीता का गाँव

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अहमदाबाद, 19, सितंबर 2019 (युवाPRESS)। दो दशक पहले झुलासण विश्व विख्यात नहीं था। यह केवल गुजरात में मेहसाणा जिले की कडी तहसील का एक गाँव भर था। झुलासण को लोग वहाँ स्थित डोला माता मंदिर सहित विभिन्न धार्मिक स्थलों के कारण जानते थे। इससे अधिक इस गाँव की कोई ऐसी विशिष्ट पहचान नहीं थी, जो इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति दिला सके, परंतु जून-1998 में झुलासण के लिए ऐसा दिन लेकर आया, जब उसे कडी, मेहसाणा, गुजरात या भारत ही नहीं, अपितु पूरे विश्व में प्रसिद्धि मिली और इस प्रसिद्धि का कारण थीं सुनीता विलियम्स।

सुनीता विलियम्स भारतीय नागरिक नहीं हैं। वे तो अमेरिकी नागरिक हैं। इसके बावजूद जून-1998 में जब अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी National Aeronautics and Space Administration यानी NASA ने सुनीता विलियम्स का अंतरिक्ष यात्री के रूप में चयन किया। बस नासा के इस चयन ने झुलासण को भी चर्चा में ला दिया, क्योंकि सुनीता भारतीय मूल की महिला हैं। उनके पिता डॉ. दीपक पंड्या की जड़ें झुलासण से जुड़ी हुई थीं। डॉ. दीपक पंड्या का जन्म इसी झुलासण गाँव में हुआ था, जो बाद में अमेरिका चले गए और वहीं सुनीता विलियम्स का जन्म हुआ। जब सुनीता को अंतरिक्ष में जाने वाले नासा के यात्रियों की सूची में शामिल किया गया, तब पूरी दुनिया के लिए झुलासण आकर्षण का केन्द्र बन गया।

सुनीता विलियम्स का आज 54वाँ जन्म दिन है। इसीलिए आज हम सुनीता और उनके मूल गाँव झुलासण को याद कर रहे हैं। अंतरिक्ष में जाने वाली दूसरी महिला सुनीता लिन पंड्या विलियम्स का जन्म 19 सितम्बर, 1965 को अमेरिका में ओहियो राज्य में यूक्लिड नगर स्थित क्लीवलैंड में हुआ था। सुनीता का बचपन से ही सपना था उड़न परी बनने का। वे खुले आकाश में उड़ना चाहती थीं। इन्हीं सपनों के साथ सुनीता ने मैसाचुसेट्स से हाई स्कूल की पढ़ाई पूरी की और उसके बाद संयुक्त राष्ट्र की नौसैनिक अकादमी से फिजिकल साइन्स में बीएस से स्नातक किया। 1995 में सुनीता ने फ़्लोरिडा इंस्टीट्यूट ऑफ़ टैक्नोलॉजी (FIorida Institute of Technology) यानी FIT से इंजीनियरिंग मैनेजमेंट में एम.एस. किया।

नौसेना से ढूँढा नासा का मार्ग

इस बीच सुनीता का मन तो न केवल गगन में, अपितु उसके पार यानी अंतरिक्ष में भी उड़ान भरने के सपनों से सराबोर था। इसी कारण उन्होंने 1987 में अमेरिकी नौसैनिक अकादमी में दाखिला लिया था। सुनीता ने सैन्य कैरियर का कठिन रास्ता इसलिए चुना, क्योंकि उन्हें नासा तक पहुँचना था। 1987 में अमेरिकी नौसैनिक अकामदी ने उन्हें नेवी का दायित्व सौंपा। विलक्षण बुद्धि प्रतिभा की धनी सुनीता ने ऐसा प्रशंसनीय कार्य किया कि उन्हें छह महीनों के बाद ही बेज़िक डाइविंग ऑफिसर बना दिया गया। पाँच वर्ष 1992 में सुनीता को मियामी के ‘हरिकैन एण्ड रिलीफ ऑपरेशन’ में प्रभारी की बड़ी भूमिका दी गई, जो उन्होंने बख़ूबी निभाई। अमेरिकी नौसेना में रहते हुए सुनीता विलियम्स अब तक 30 हजार घण्टों की उड़ान कर चुकी थीं और 30 अलग-अलग प्रकार के एयरक्राफ्ट उड़ा चुकी थीं। अमेरिकी नौसेना में एक महिला के शानदार साहस किसी से छिपे नहीं रहे और नासा की नज़र सुनीता पर पड़ ही गई।

और नासा ने पहचान ली सुनीता की प्रतिभा

नासा ने जून-1998 में सुनीता विलियम्स का अंतरिक्ष यात्री के रूप में चयन किया। 16 अप्रैल, 2007 को सुनीता का सपना पूरा हुआ, जब वे अंतरिक्ष में पहुँचीं। इतना ही नहीं, उन्होंने अंतरिक्ष में 22 घण्टे 27 मिनट स्पेस वॉक कर अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री कैथरीन रयान कार्डेल थर्नटन का 21 घण्टों का स्पेस वॉक का रिकॉर्ड भी तोड़ दिया। इसके अलावा सुनीता विलियम्स ने अमेरिकी मूल की ही महिला अंतरिक्ष यात्री शैनन ल्यूसिड के अंतरिक्ष में 188 दिन और 4 घंटे रहने के रिकॉर्ड को 192 दिन रह कर तोड़ा। इसके साथ ही सुनीता अंतरिक्ष में सबसे अधिक समय तक रहने वाली पहली महिला बन गईं। सुनीता विलियम्स हाल में सोसाइटी ऑफ एक्सपेरिमेंटल टेस्ट पायलेट्स (Society of Experimental Test Pilots), सोसाइटी ऑफ फ्लाइट टेस्ट इंजीनियर्स (Society of Flight Test Engineers) और अमेरिकी हेलीकॉप्टर एसोसिएशन (Helicopter Association of America ) जैसी संस्थाओं से भी जुड़ी हुई हैं।

गुजरात और भारत को है सुनीता पर गर्व

सुनीता विलियम्स की अंतरिक्ष उपलब्धियों पर गुजरात और पूरे भारत को गर्व है। इसीलिए 2008 में भारत सरकार ने सुनीता को विज्ञान एवं अभियांत्रिकी के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया। सुनीता को 2 नेवी कमेंडेशन मेडल, नेवी एंड मैरीन कॉर्प एचीवमेंट मेडल, ह्यूमैनिटेरियन सर्विस मेडल से भी सम्मानित किया गया है। अंतरिक्ष की दुनिया में 192 दिन बिताने वाली सुनीता विलयम्स भले ही अमेरिका में जन्मी हैं, परंतु उनकी जड़ें भारत से जुड़ी है। आज हम आपको सुनीता के उन्हीं जड़ों तक यानी उनके पैतृक गाँव झूलासण ले चलते हैं, जहाँ उनके पिता डॉक्ट दीपक पंड्या का जन्म हुआ। सुनीता के पिता डॉक्टर दीपक एन. पंड्या एक जाने-माने तंत्रिका विज्ञानी (एम.डी) हैं। डॉ. दीपक पंड्या का जन्म 6 दिसंबर, 1932 को झूलासण में हुआ था। उन्होंने 1957 में गुजरात विश्वविद्यालय से एम.डी. (डॉक्टर ऑफ मेडीसिन) की पढ़ाई पूरी की और उसके बाद जूनागढ़ अस्पताल में काम करने लगे। 1958 में डॉ. दीपक पंड्या अमेरिका चले गए और क्लीवलैंड, ओहियो में मेडिसिन में अपनी इंटर्नशिप और रेज़ीडेंसी प्रशिक्षण किया। 1964 में पंड्या केस वेस्टर्न रिजर्व में एनाटॉमी विभाग में पोस्टडॉक्टरल फेलो के रूप में शामिल हुए और 1966 में बोस्टन चले गए। पंड्या बोस्टन वेटरनस एडमिनिस्ट्रेशन मेडिकल सेंटर में एपहैसिया रिसर्च सेंटर, और बोस्टन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन में एनाटॉमी और न्यूरोलॉजी विभाग में सहायक प्रोफेसर के रूप में नियुक्त हुए। डॉ. दीपक पंड्या आज एक सफल डॉक्टर हैं, परंतु उनकी जड़ें आज भी झुलासण गाँव से जुड़ी हुई हैं, जो पूरे देश को गौरवान्वित करती हैं।

झुलासण : मुस्लिम देवी से सुनीता विलियम्स तक

गुजरात की राजधानी गांधीनगर से करीब 20 किलोमीटर दूर स्थित झूलासण गाँव अति प्रचीन है और कभी इस गाँव की चर्चा वहाँ एक मंदिर में पूजी जाने वाली एक मुस्लिम महिला के लिए होती थी। झुलासण में स्थित डोला माता का मंदिर कदाचित दुनिया का एकमात्र मंदिर होगा, जहाँ किसी मुस्लिम महिला की देवी के रूप में पूजा की जाती है। झूलासण गाँव में एक भी मुस्लिम परिवार निवास नहीं करता, परंतु गाँव में एक प्रसिद्ध डोला माता का मंदिर है। इस मंदिर से जुड़ा इतिहास एक मुस्लिम महिला की वीरता को दर्शाता है, जिसने अपने प्राणों की आहूति देकर झुलासण गाँव के लोगों की रक्षा की थी। यह घटना लगभग 800 वर्ष पहले हुई थी। ऐसी मान्यता है कि झुलासण पर जब लुटेरों ने आक्रमण किया, तब वहाँ से गुज़र रही डोला नामक एक मुस्लिम महिला ने बड़ी बहादुरी से उन लुटेरों का सामना किया और झुलासण गाँव की रक्षा करते हुए अपने प्राणों का बलिदान दे दिया।

डोला का पार्थिव शरीर पुष्प में परिवर्तित हो गया

ऐसा माना जाता है कि जिस समय डोला अंतिम साँस ले रही थीं। उनका शरीर एक पुष्प में परिवर्तित हो गया। यह देख गाँव के लोग अचंभित हो गए। गाँव वालों ने उसी स्थान पर एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया, जहाँ डोला वीरगति को प्राप्त हुईं थी। इसके बाद से झुलासण गाँव में डोला माता की पूजा होने लगी। इस मंदिर की विशेषता यह भी है कि इसमें कोई मूर्ति नहीं है, अपितु एक पत्थर के यंत्र पर साड़ी डाल कर उसकी ही डोला देवी के रूप में पूजा की जाती है। हिन्दू भक्‍तों की यह मान्‍यता है कि डोला माता से माँगी गई हर इच्छा पूरी होती है। इतना ही नहीं जब सुनीता विलियम्स अपनी अंतरिक्ष यात्रा के लिए रवाना हुईं, तो उनकी सुरक्षा के लिए गाँव वालों ने डोला माता के मंदिर में एक अखंड ज्योति जलाई और डोला माता से सुनीता विलियम्‍स के अंतरिक्ष से सुकुशल वापस लौटने की प्रार्थना की। यह अखंड ज्योति लगभग 4 महीने प्रज्वलित रही। जब यह बात सुनीता को पता चली, तो सितंबर, 2007 में पहली बार भारत भ्रमण को आईं सुनीता सबसे पहले अपने पैतृक गाँव झूलासण पहुँचीं और अपने पुरखों की आराध्य देवी डोला माता के दर्शन किए थे। गाँव वालों ने सुनीता को ‘कोहिनूर, डायमंड ऑफ झुलासण’ की उपाधि भी दी थी।

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