VIDEO : बूढ़े माता-पिता की उपेक्षा करने वाली संतानों को सबक देती है प्रकृति, जानिए कैसे ?

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रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 2 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। पहली अक्टूबर को ही दुनिया ने अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस मनाया। इस अवसर पर कहीं वृद्धों को सम्मानित किया गया तो कहीं लोगों ने वृद्धाश्रमों में जाकर वृद्धों के साथ तस्वीरें खिंचवाई, परंतु क्या ईश्वर तुल्य माता-पिता का परित्याग कर देने वाली संतानों के लिये कोई धिक्कार रैली नहीं निकाली जानी चाहिये थी ? ऐसा कुछ भी नहीं हुआ और जैसे-तैसे यह दिन भी दावों प्रति दावों के साथ बीत गया। इसके अगले दिन यानी बुधवार को हमें एक अदभुत वीडियो प्राप्त हुआ, जो माता-पिता द्वारा किये गये उपकारों को विस्मृत करके उनसे उल्टे सवाल पूछने वाली संतानों कि ‘आपने मेरे लिये किया ही क्या है ?’ को सटीक प्रत्युत्तर प्रकृति से मिल रहा है। इस वीडियो को हम आगे देखेंगे, परंतु उससे पहले हम आपके समक्ष वृद्धजनों की वर्तमान स्थिति का एक रेखा चित्र प्रस्तुत करेंगे, जो कदाचित किसी एक संतान में भी अपने माता-पिता को सम्मान देने के संस्कारों का बीजारोपण कर पाया, तो हम समझेंगे कि हमारा प्रयास सफल हुआ।

वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या चिंताजनक

सरकारें अपना कर्तव्य निभा रही हैं और उनके समाज कल्याण विभाग वृद्धों को हर संभव सुविधा उपलब्ध कराने के लिये रहने खाने से लेकर पेंशन देने तक की व्यवस्था कर रहे हैं। कुछ सामाजिक संस्थाएँ भी संतानों से उपेक्षित वृद्धजनों के लिये वृद्धाश्रम और ओल्ड एज़ होम्स का संचालन करती हैं, परंतु यह कटु सत्य है कि वृद्धाश्रमों से इतर भी लाखों की संख्या में वृद्ध अपने ही घरों में एकल जीवन जी रहे हैं। उनकी संतानें अन्य शहरों में अथवा विदेशों में रह रही हैं। इसी प्रकार लाखों की संख्या में ऐसे भी वृद्ध हैं, जो अपने घरों में परिवार के साथ रहते हुए उनकी ओर से दी जाने वाली प्रताड़नाओं को सह रहे हैं। 21वीं सदी में वर्तमान पीढ़ी जो स्वयं को आधुनिक, विकसित सुशिक्षित कहती है, क्या उसके लिये यह शर्मसार करने वाली बात नहीं कि उसी पीढ़ी के बुजुर्ग प्रताड़ित हैं, उपेक्षित हैं और यहाँ तक कि त्यकित हैं, जो वृद्धाश्रमों में जीवन गुजारने के लिये मजबूर हैं।

अगले 30 साल में युवा भारत हो जाएगा बूढ़ा

एक अध्ययन के अनुसार 2050 तक भारत की जन संख्या 170 करोड़ तक पहुँच जाएगी और चीन को जन संख्या के मामले में पीछे छोड़ देगी। इसके परिणाम स्वरूप इन 31 वर्षों में भारत में बच्चों की संख्या (15 वर्ष से कम उम्र के) 20 प्रतिशत कम हो जाएगी और 65 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों की संख्या तीन गुना बढ़ जाएगी। वैश्विक स्तर पर जन सांख्यिकीय डेटा उपलब्ध कराने वाली पीआरबी के अनुसार 2050 तक बच्चों की वर्तमान वृद्धि दर 28 प्रतिशत से घट कर 19 प्रतिशत रह जाएगी और इसके मुकाबले 65 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों की वृद्धि दर 6 प्रतिशत से बढ़ कर 13 प्रतिशत हो जाएगी। ऐसे में इन वृद्धों को सँभालना सरकारों के लिये एक बड़ी चुनौती बन जाएगा और अंततः सरकार को भी संतानों पर दबाव बनाने की जरूरत पड़ेगी, ताकि वृद्ध जनों की उनके घर में ही अच्छे से देखभाल हो सके। इसके अतिरिक्त अन्य कोई और चारा नहीं रहेगा।

माता-पिता की सेवा के लिये संतानों पर दबाव बनाने की जरूरत

अब सवाल यह उठता है कि संतानों पर दबाव बनाने के लिये कठोर कानून लाने की जरूरत क्यों पड़े ? संतानों में ऐसे संस्कारों का पुनः बीजारोपण क्यों न किया जाए, जो भारतीय संस्कृति के मूल में हैं। भारत की प्राचीन संस्कृति में माता-पिता के लिये ‘मातृ देवो भवः’ और ‘पितृ देवो भवः’ की स्थापित परंपरा रही है। भगवान गणेश, भगवान परशुराम, श्रवण कुमार और भगवान राम के चरित्र संतानों को माता-पिता को ईश्वर तुल्य मानने की प्रेरणा देते हैं। जब महादेव के दोनों पुत्रों में भगवान कार्तिकेय (मुरुगन) और भगवान गणेश के बीच ब्रह्मांड का भ्रमण करके लौटने की शर्त लगी थी, तो कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर सवार होकर ब्रह्मांड का भ्रमण करने के लिये निकल गये थे, जबकि भगवान गणेश ने माता-पिता को ही ब्रह्मांड का स्वरूप बता कर उनका ही चक्कर लगा कर माता-पिता की महिमा को चरितार्थ किया था। भगवान परशुराम के बारे में कहा जाता है कि वे अपने पिता के आज्ञाकारी पुत्र थे, जिन्होंने महर्षि जमदग्नि के कहने पर अपनी माता की ही गर्दन काट दी थी। हालाँकि यह उनकी आज्ञा पालन की कसौटी की गई थी, बाद में उनकी माता को जीवित कर दिया गया था। श्रवणकुमार के बारे में भी सभी को पता है कि उन्होंने अपने अंध माता-पिता को कंधे पर कांवड़ में बैठा कर चार धाम की यात्रा कराई थी। जबकि भगवान राम ने भी अपने पिता और माता केकैयी की मनोकामना पूर्ण करने के लिये 14 वर्ष के वनवास को सहर्ष स्वीकार कर लिया था।

शिक्षा प्रणाली में आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता

भारतीय ज्ञान शास्त्रों में माता-पिता और पुत्र के संबंधों को बड़े ही शालीन ढंग से प्रस्तुत किया गया है, जिसमें संतान कभी भी माता-पिता के आदेश की अवमानना नहीं करती है और उनके आदेश को सहर्ष शिरोधार्य करके उसकी अनुपालना करती है। कभी भी संतान माता-पिता के साथ बहस या दलील नहीं करती हैं। जबकि आज की संतानों पर आधुनिकता और विशेष कर पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव इस तरह से हावी हो चुका है कि वे अपनी संस्कृति से अनभिज्ञ हो गये हैं। मूल भारतीय संस्कृति की अज्ञानता ही उन्हें अन्य संस्कृतियों की ओर आकर्षित करती गई और परिणाम यह है कि वह दुनिया की विभिन्न संस्कृतियों से तो परिचित हो गई, परंतु अपनी ही मूल गौरवपूर्ण संस्कृति से दूर हो गई। आवश्यकता है शिक्षा प्रणाली में आमूल-चूल परिवर्तन की और पुनः मूल भारतीय शिक्षा को प्रस्थापित करने की, जो वर्तमान और भावी पीढ़ी को जीवन जीने की कला, बड़ों का सम्मान करने और समस्त जीव सृष्टि एवं पर्यावरण के प्रति सजाग बनाने के संस्कारों का आरोपण करे, तभी पुनः देश अपना खोया हुआ गौरव वापस पा सकता है और वृद्धजन, महिलाओं आदि सभी को उनकी भूमिकानुसार सम्मानित स्थान प्राप्त हो सकता है।

मानव के सिवाय कोई जीव नहीं करता माता-पिता का अपमान

जीव सृष्टि में हर प्रजाति में माता-पिता और संतान के बीच अत्यंत भावनाशील सम्बंध देखने को मिलता है। हर प्रजाति में माता-पिता तो अपनी संतान को पाल-पोष कर उसे बड़ा करने का कर्तव्य निभाते हैं, जिसके लिये कई बार माता-पिता ऐसे-ऐसे दुस्साहस भी कर जाते हैं, जो देखने वालों को आश्चर्य में डाल देते हैं और कहने के लिये विवश कर देते हैं कि ‘ऐसा भी होता है।’ ऐसा ही एक वीडियो हमें प्राप्त हुआ है, जिसमें नर और मादा कौआ घनघोर बारिश में अपनी संतान को बारी-बारी से सुरक्षा प्रदान करते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि कौओं की यह संतान अपने माता-पिता से सवाल नहीं करेगी कि ‘आपने मेरे लिये किया ही क्या है ?’ जबकि सभी जीवों में सर्वश्रेष्ठ कहलाने वाली मानव जाति की कुछ आधुनिक संतानें ही ऐसा दुस्साहस करती हैं।

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