MV Act : क्या है संविधान की 7वीं अनुसूची, जो इन ‘बेकाबू’ राज्यों पर लगाएगी लगाम ?

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रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 3 सितंबर, 2019 (युवाPRESS)। केन्द्र सरकार द्वारा संसद में पारित संशोधित मोटर व्हीकल एक्ट-2019 देश भर में 1 सितंबर से लागू हो गया। इसमें यातायात नियमों का उल्लंघन करने वाले वाहन चालकों से वसूल किया जाने वाला दंड 5 से 10 गुना तक बढ़ाया गया है। चूँकि केन्द्र सरकार ने इस संशोधित मोटर व्हीकल एक्ट को लागू करने या नहीं करने का अधिकार राज्यों को दिया है। इसलिये इस अधिकार के चलते तीन राज्य इस कानून को लागू करने में टाल-मटोल कर रहे हैं। हालाँकि उन्हें यह नियम लागू करना ही पड़ेगा, क्योंकि केन्द्र सरकार के पास ऐसा संवैधानिक अधिकार है, जिसके माध्यम से वह इन राज्यों को यह नियम लागू करने पर विवश कर सकती है। उसे संविधान की 7वीं अनुसूची में यह अधिकार मिला है। कौन हैं वह राज्य, जो इस कानून को लागू नहीं कर रहे हैं ? और क्यों उन्हें इसे लागू करना ही होगा ? इसी विषय पर हम यहाँ प्रकाश डालने का प्रयास करेंगे।

देश भर में लागू हुआ संशोधित मोटर व्हीकल एक्ट-2019

केन्द्र सरकार ने पिछले महीने समाप्त हुए संसद के प्रथम सत्र में संशोधित मोटर व्हीकल एक्ट-2019 पारित किया था। इसे राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद केन्द्र सरकार ने एक परिपत्र जारी कर 1 सितंबर 2019 से देश भर में संशोधित मोटर व्हीकल एक्ट-2019 लागू करने का ऐलान किया था, जो कि अब लागू हो चुका है। इसमें यातायात के नियमों का उल्लंघन करने वाले वाहन चालकों से वसूल किया जाने वाला दंड 5 से 10 गुना तक बढ़ा दिया गया है। वहीं सड़क दुर्घटनाओं के मौके पर घायलों की मदद करने वाले लोगों को प्रोत्साहित करने के लिये उन्हें पुलिस कार्यवाही में रियायतें देने के प्रावधान किये गये हैं। केन्द्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की ओर से इस कानून को लागू किया गया है। मंत्रालय के अनुसार संशोधित कानून में 63 उपबंध ऐसे हैं, जो यातायात नियमों के उल्लंघन पर जुर्माने से जुड़े हैं। यह ऐसे अनुबंध हैं, जिन्हें लागू करने के लिये केन्द्रीय मोटर व्हीकल रूल्स-1989 में किसी प्रकार के बदलाव की जरूरत नहीं है।

तीन राज्यों ने MV Act लागू करने से किया इनकार

देश के तीन राज्यों ने मोदी सरकार के संशोधित मोटर व्हीकल एक्ट-2019 को लागू करने से इनकार किया है। इनमें एक भाजपा शासित राज्य है, जबकि दो नॉन बीजेपी (NON BJP) राज्य हैं। भाजपा शासित राज्य हिमाचल प्रदेश है, जबकि नॉन बीजेपी राज्य मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल हैं। इन दो राज्यों ने इसे लागू तो नहीं किया, इससे उलट इस एक्ट को लेकर विरोध भी शुरू कर दिया है। मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार का तर्क है कि वह इस संशोधित कानून में किये गये भारी भरकम जुर्माने के प्रावधानों से सहमत नहीं है, जबकि कमलनाथ के पड़ोसी राज्य राजस्थान में गहलोत सरकार ने इसी कानून को लागू कर दिया है। हालाँकि गहलोत सरकार के परिवहन मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास ने स्पष्टता की है कि उन्होंने कानून लागू जरूर किया है, परंतु वह जुर्माने की रकम की समीक्षा करेंगे। मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल की सरकारों ने जो दलीलें दी हैं, उन्हें सुनकर किसी को भी हँसी आ सकती है। उनका कहना है कि इस एक्ट से सड़क दुर्घटनाएँ बढ़ेंगी। जुर्माने की रकम इतनी होनी चाहिये कि लोग उसे भर सकें। भारी जुर्माना लागू होने के बाद यदि पुलिस वाला किसी वाहन को रोकेगा तो उसे लगेगा कि 2000 रुपये का चालान हो जाएगा, इतने भारी जुर्माने से बचने के लिये वह गाड़ी तेजी से भगाएगा, ऐसे में दुर्घटनाएँ कम होने की बजाय बढ़ जाएँगी। इस प्रकार इस एक्ट से दुर्घटनाएँ रोकने का उद्देश्य पूरा नहीं होगा। पश्चिम बंगाल की ममता बैनर्जी सरकार ने भी केन्द्र सरकार के इस नियम को लागू नहीं किया है और उसका भी तर्क है कि इस एक्ट में जुर्माने की राशि इतनी ज्यादा है कि वह आम आदमी की पहुँच से बाहर है। दूसरी ओर राजस्थान के मंत्री प्रताप सिंह के बयान ने ही मध्य प्रदेश की कांग्रेस सरकार के तर्क को धता बता दिया। उन्होंने कहा कि ज्यादा जुर्माने का दुर्घटनाओं से कोई संबंध नहीं है। उधर हिमाचल प्रदेश में इस एक्ट को लागू करने के लिये सरकार की ओर से कोई परिपत्र जारी नहीं किया गया है। इस संबंध एक अधिकारी ने बयान जारी करके कहा कि यातायात विभाग को नये मोटर व्हीकल एक्ट से जुड़े कई सवाल प्राप्त हुए हैं, इसलिये सरकार ने फिलहाल नये नियम को लागू नहीं किया है।

टाल-मटोल करने वाले राज्यों को लागू करना ही होगा MV Act

विशेषज्ञों का कहना है कि सभी राज्यों को संशोधित मोटर व्हीकल एक्ट लागू करना ही होगा। इस मामले में राज्यों के पास बहुत फ्लेक्सिबिलिटी नहीं हैं। क्योंकि यह भारतीय संविधान की 7वीं अनुसूची में आता है। इस हिसाब से भारत की संसद राज्यों के अधिकारों को परिभाषित कर सकती है। जब कुछ राज्य इसे लागू करने में टाल-मटोल कर रहे हैं, उन्हें राजस्व के नुकसान पर ऑडिटर्स को जवाब देना पड़ सकता है।

क्या कहती है संविधान की 7वीं अनुसूची ?

भारतीय संविधान में राज्य सरकारों तथा केन्द्र सरकार के बीच मुद्दों अथवा अधिकारों के बँटवारे के लिये विभिन्न अनुसूचियाँ परिभाषित की गई हैं। इनमें से 7वीं अनुसूची राज्यों व संघ के बीच के अधिकारों को उल्लिखित करती है।

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