‘चंदा मामा’ के यहाँ ‘विक्रम’ करेगा ऐसा काम, जो अब तक कोई नहीं कर पाया

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रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 2 सितंबर, 2019 (युवाPRESS)। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केन्द्र (ISRO) का MISSION MOON-2 यानी चंद्रयान-2 एक के बाद एक सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता जा रहा है। सफल प्रक्षेपण के बाद चंद्रयान-2 सफलतापूर्वक पृथ्वी की कक्षा से बाहर निकल कर चांद की कक्षा में प्रवेश कर गया और अब चांद से 100 कि.मी. दूर चंद्रयान-2 के मॉड्यूल से विक्रम लैण्डर भी सफलतापूर्वक अलग हो गया है। इसरो ने ट्वीट करके इसकी पुष्टि की है। इसी के साथ विक्रम ने चंदा मामा के घर पहुँचने के लिये अपनी यात्रा शुरू कर दी है। 7 सितंबर को विक्रम चंदा मामा के दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैण्डिंग करेगा। इसरो की मानें तो विक्रम वो काम करने वाला है, जो दुनिया में अभी तक किसी ने नहीं किया है, यानी कि विक्रम चांद से धरती की वास्तविक दूरी का पता लगाएगा।

इसरो के अनुसार विक्रम लैण्डर भारतीय समयानुसार 2 सितंबर सोमवार को दोपहर 1.35 बजे चंद्रयान-2 से सफलतापूर्वक अलग हो गया। अलग होने के साथ ही विक्रम ने चंदा मामा के यहाँ पहुँचने की अपनी यात्रा शुरू कर दी है। वह 7 सितंबर को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैण्डिंग करेगा। इसके 4 घण्टे बाद विक्रम लैण्डर से प्रज्ञान रोवर बाहर आएगा, जो चंद्रमा की सतह पर 14 दिन में कुल 500 मीटर की दूरी तय करेगा और वहाँ विभिन्न प्रयोग करेगा। इस बीच जैसे ही विक्रम चांद की सतह पर पहुँचेगा, वैसे ही चांद और धरती की वास्तविक दूरी का पता चल जाएगा। जो कि अभी तक दुनिया के लिये एक अबूझ पहेली बनी हुई है।

कैसे पता चलेगी धरती और चांद की दूरी ?

वैसे तो एक अनुमान के मुताबिक धरती और चांद के बीच की दूरी 384,400 किलोमीटर है, परंतु इस दावे को लेकर कई तरह की भ्रांतियाँ भी हैं। इसलिये अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने भारतीय चंद्रयान-2 के साथ अपना एक लूनर लेज़र रेट्रोरेफ्लेक्टर एरे भेजा है, जो वैज्ञानिकों को चंद्रमा की पृथ्वी से वास्तविक दूरी का पता लगाएगा। नासा के एक शीर्ष अधिकारी लोरी ग्लेज़ के कथनानुसार ‘वह चंद्रमा की सतह पर अधिक से अधिक लेज़र रेट्रोरेफ्लेक्टर एरे भेजना चाहते हैं, जो एक प्रकार के परिष्कृत शीशे होते हैं और जो पृथ्वी से भेजी गई लेज़र लाइट के सिग्नल को वापस भेजते हैं।’ वैज्ञानिकों के मुताबिक इन लेज़र लाइट्स के वापस पृथ्वी पर आने से लैंडर के वास्तविक स्थान का पता लग जाएगा। इस प्रकार पृथ्वी से चंद्रमा की वास्तविक दूरी का सटीक आकलन किया जा सकेगा। अभी तक चंद्रमा की सतह पर इस प्रकार के 5 उपकरण पहले से उपलब्ध हैं, परंतु उनमें कुछ गड़बड़ियों के कारण चंद्रमा और धरती के बीच की वास्तविक दूरी का पता नहीं लगाया जा सका। इटली के भौतिक विज्ञानी डेल एंजेलो के अनुसार चंद्रमा की सतह पर मौजूद रेट्रोरेफ्लेक्टर काफी बड़े हैं, परंतु चंद्रयान-2 के साथ भेजा गया रेट्रोरेफ्लेक्टर लेज़र की कम किरणों को बरबाद करता है। इसी कारण अब चंद्रमा की सतह का सटीक माप लिया जा सकेगा। इसके अलावा जब प्रज्ञान रोवर चंद्रमा की सतह पर भ्रमण करेगा तो उसकी ज़मीन की ऊँचाई का भी पता चलेगा। इस प्रकार कहा जा सकता है कि भारतीय विक्रम लैण्डर वह काम करने जा रहा है, जो दुनिया में अभी तक कोई नहीं कर पाया है।

उल्लेखनीय है कि 21 जुलाई-1969 को चंद्रमा की सतह पर जब अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री नील आर्मस्ट्रॉन्ग ने अपोलो-11 के माध्यम से पहला कदम रखा था, तब उन्होंने अपने पीछे सतह पर लेज़र रेट्रोरेफ्लेक्टर को छोड़ दिया था। इस लेज़र रेट्रोरेफ्लेक्टर पर पृथ्वी की ओर केन्द्रित करके दो फुट चौड़े पैनल पर 100 शीशे लगाये गये थे। बताया जाता है कि लगभग 50 साल बाद भी ये रेट्रोरेफ्लेक्टर अभी तक काम कर रहे हैं।

ऑर्बिटर से अलग होकर अब क्या कर रहा है ‘विक्रम’ ?

अब आपको बताते हैं कि ऑर्बिटर से अलग होने के बाद विक्रम लैण्डर क्या कर रहा है। दरअसल अब 20 घण्टे तक विक्रम अपने पिता यानी ऑर्बिटर के पीछे-पीछे प्रति सेकण्ड 2 किलोमीटर की गति से चलेगा। इस लैण्डर का नाम विक्रम भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक कहलाने वाले वैज्ञानिक विक्रम साराभाई के नाम पर रखा गया है। पहले इस लैण्डर को बनाने के लिये रूस से बात हुई थी, परंतु उसके इनकार करने के बाद इसकी प्रारंभिक डिजाइन को अहमदाबाद स्थित इसरो के स्पेस एप्लीकेशन सेंटर ने बनाया और बाद में इसे बेंगलुरु के यूआर राव सैटेलाइट सेंटर (यूआरएससी-URSC) ने विकसित किया। इसमें 4 पेलोड हैं। 7 सितंबर का दिन चंद्रयान-2 मिशन का सबसे मुश्किल और चुनौतीपूर्ण दिन होगा। क्योंकि इसी दिन स्वदेशी विक्रम लैंडर को चांद पर उतरना है। दरअसल 6 और 7 सितंबर की देर रात 1.30 से 1.40 बजे के दौरान विक्रम लैंडर 35 कि.मी. की ऊँचाई से चांद के दक्षिणी ध्रुव पर उतरना शुरू करेगा, इस बीच यह 200 मीटर प्रति सेकंड की गति से लैण्ड करेगा। यह इसरो के वैज्ञानिकों के लिये बेहद चुनौतीपूर्ण काम होगा।

विक्रम रात को 1.55 बजे दक्षिणी ध्रुव पर मौजूद दो क्रेटर (गड्डों) मैंजिनस-सी और सिंपेलियस-एन के बीच मौजूद मैदान पर उतरेगा। लगभग 6 कि.मी. की ऊंचाई से लैंडर 2 मीटर प्रति सेकंड की गति से चांद की सतह पर उतरेगा। यह 15 मिनट बेहद खास और तनावपूर्ण रहने वाले हैं। लैण्डिंग के लगभग दो घण्टे बाद सुबह 3.55 बजे विक्रम लैंडर का रैंप खुलेगा और इसी के जरिए 6 पहियों वाला प्रज्ञान रोवर चांद की सतह पर कदम रखेगा। सुबह 5.05 बजे प्रज्ञान रोवर का सोलर पैनल खुलेगा। इसी पैनल के माध्यम से वह ऊर्जा प्राप्त करेगा और सुबह 5.10 बजे चांद की सतह पर चलना शुरू करेगा। वह एक सेंटीमीटर प्रति सेकंड की गति से चांद की सतह पर 14 दिन तक यात्रा करेगा। इस दौरान वह 500 मीटर की दूरी तय करेगा। इसमें 2 पेलोड हैं। 27 किलो के इसी रोबोट पर पूरे मिशन की जिम्मेदारी है। यह विभिन्न वैज्ञानिक प्रयोग करेगा और वह जानकारी विक्रम लैंडर को भेजेगा। लैंडर वहां से ऑर्बिटर को डेटा भेजेगा और ऑर्बिटर वह डेटा पृथ्वी पर इसरो सेंटर में भेजेगा। इस पूरी प्रक्रिया में लगभग 15 मिनट लगेंगे। यानी प्रज्ञान से भेजी गई जानकारी धरती तक आने में लगभग 15 मिनट लगेंगे।

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