नारी क्रांति की ‘प्रीतम’ थीं ‘अमृता’, जिन्होंने विभाजन के ‘लहू’ से वारिस शाह को ललकारा…

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* देश की प्रसिद्ध व प्रथम पंजाबी कवियत्री अमृता प्रीतम की 100वीं जयंती पर विशेष

आलेख : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 31 अगस्त, 2019 (युवाPRESS)। अमृता प्रीतम…. अधिक समय नहीं बीता उन्हें भारतीय भूमि से विदा हुए। अभी 13 वर्ष और 10 महीने पहले तक यह महान आत्मा हमारे बीच थीं, परंतु जीवन के अटल सत्य यानी मृत्यु ने उन्हें 31 अक्टूबर, 2005 को हमसे छीन लिया। यह वह दिन था, जब अमृता प्रीतम के नश्वर शरीर ने भारत की धरती को अलविदा कहा, परंतु भारतीय दर्शन के अनुसार व्यक्ति का देह अवश्य इस धरती से चला जाता है, परंतु उसका आत्मा कभी नहीं मरता। इस दृष्टिकोण से सोचें, तो अमृता प्रीतम आज भी हमारे बीच विद्यमान हैं। वे अपने पीछे अपनी महान रचनाओं को छोड़ कर गई हैं, जिनके माध्यम से वे अनंतकाल तक जीवंत रहेंगी।

आज हम अमृता प्रीतम को इसलिए याद कर रहे हैं, क्योंकि आज से ठीक 100 वर्ष पहले वह 31 अगस्त का ही दिन था, जब अमृता प्रीतम जैसे महान अस्तित्व का भारत में अवतरण हुआ था। 31 अगस्त, 1919 को अखंड भारत के पंजाब (वर्तमान भारत के भी पंजाब) में गुजराँवाला में अमृता प्रीतम का जन्म हुआ था।

अमृता प्रीतम की आज 100वीं जयंती है और इस उपलक्ष्य में विश्व विख्यात सर्च इंजन GOOGLE भी NOODLE बना कर अमृता प्रीतम को न केवल स्मरण कर रहा है, अपितु उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि भी दे रहा है। अमृता प्रीतम कोई साधारण व्यक्ति नहीं थीं। उन्होंने उस काल खंड (1919-2005) में अपना जीवन जिया, जिसमें स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर पीड़ाजनक विभाजन, स्वतंत्रता और नए भारत के निर्माण जैसे कई घटनाक्रम हुए, परंतु अमृता प्रीतम कदाचित अपने जीवन में भारत-पाकिस्तान बँटवारे के दर्द को कभी नहीं भूली होंगी, जिसमें सर्वाधिक ख़ूनख़राबा अमृता प्रीतम के राज्य पंजाब में हुआ था। इसीलिए अमृता प्रीतम ने विभाजन की पीड़ा से उठी चीत्कार से पंजाब के प्रसिद्ध कवि और एक हीर के रोने पर हीर-रांझा जैसी गाथा लिख डालने वाले वारिस शाह को कब्र से उठ कर पंजाब की बेटियों की लाज बचाने के लिए ललकारा था।

कौन थीं अमृता प्रीतम ?

आइए अब हम आपको बताते हैं कि यह अमृता प्रीतम कौन थीं ? अमृता प्रीतम ऐतिहासिक और आधुनिक भारत के कालखंड के बीच एक मज़बूत कड़ी थीं। वह कोई स्वतंत्रता सेनानी या क्रांतिकारी नहीं थीं, परंतु उन्होंने अपनी कलम से जो क्रांति की, उसे पूरे देश को नतमस्तक कर दिया। 100 वर्ष पहले पंजाब के गुजराँवाला में जन्मीं अमृता का बचपन तत्कालीन अखंड भारत के लाहौर (अब पाकिस्तान) में बीता और शिक्षा भी वहीं हुईं, परंतु अमृता की कलम की जादूगरी बचपन से ही दिखाई देने लगी, जब उन्होंने किशोरावस्था में कविताएँ, कहानियाँ और निबंध लिखना शुरू किया। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा और अपने 86 वर्ष के जीवनकाल में 100 पुस्तकें लिख डालीं, जिनमें सबसे अधिक चर्चित आत्मकथा ‘रसीदी टिकट’ भी शामिल है। अमृता को अपने अंतिम दिनों में भारत का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मविभूषण प्राप्त हुआ। इससे पहले वे साहित्य अकादमी से अलंकृत हो चुकी थीं। 1957 में साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1958 में पंजाब सरकार के भाषा विभाग द्वारा पुरस्कार, 1988 में बल्गारिया वैरोव पुरस्कार (अंतरराष्ट्रीय) और 1982 में सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कार ज्ञानपीठ से सम्मानित अमृता प्रीतम स्वतंत्र भारत में राज्यसभा की सदस्य भी रहीं। उन्होंने कई कृतियाँ, उपन्यास, आत्मकथा, कहानी संग्रह, कविता संग्रह, गद्य कृतियाँ लिखीं और सदा के लिए अमर हो गईं।

अमृता की नारी क्रांति और वारिस शाह को ललकार

आज हम आपको अमृता प्रीतम के विराट व्यक्तित्व में से उस पहलू के बारे में बताएँगे, जो उन्हें नारी क्रांतिकारी सिद्ध करती हैं। नारी शक्ति के प्रति अमृता की तीव्र विचारधारा एक इंटरव्यू में कही गई उनकी इस बात से समझी जा सकती है, जिसमें उन्होंने कहा था, ‘स्त्री की शक्ति से इनकार करने वाला आदमी स्वयं की अवेचतना से इनकार करता है।’ नारी शक्ति पर इस तरह की टिप्पणी करने का साहस अमृता ही कर सकती थीं, क्योंकि उन्होंने विभाजन की पीड़ा को झेला था। 1947 में जब भारत और पाकिस्तान का बँटवारा हो रहा था, तब लाखों लोग भारत से पाकिस्तान और पाकिस्तान से भारत आवागमन कर रहे थे, परंतु यह कोई साधावरण आवागमन नहीं था, बल्कि लहूलुहान कर देने वाला घटनाक्रम था, जिसमें पाकिस्तान की तरफ से लाखों लोगों को मार कर उनकी लाशों को ट्रेनों में भेजा जा रहा था। पाकिस्तान से भारत आ रही बेटियों के साथ बलात्कार हो रहे थे। विभाजन की सबसे अधिक पीड़ा पंजाब की हजारों बेटियों ने सही थी और इसी बात ने अमृता प्रीतम को झकझोर दिया था। विभाजन की वेदना को अमृता ने अपनी एक कविता के माध्यम से व्यक्त किया और पंजाब के प्रसिद्ध कवि वारिस शाह को कब्र से उठ कर पंजाब की बेटियों की रक्षा करने के लिए ललकारा।

यह थी वह कविता

अज्ज आखाँ वारिस शाह नूँ कित्थों क़बरां विच्चों बोल
ते अज्ज किताब-ए-इश्क़ दा कोई अगला वरका फोल
इक रोई सी धी पंजाब दी तू लिख-लिख मारे वैन
अज्ज लक्खां धीयाँ रोंदियाँ तैनू वारिस शाह नु कैन
उठ दर्दमंदां देआ दर्देया उठ तक्क अपना पंजाब
अज्ज बेले लाशां बिछियाँ ते लहू दी भरी चनाब

अर्थात्

आज मैं आज मैं वारिस शाह से कहती हूँ, अपनी क़ब्र से बोल,
और इश्क़ की किताब का कोई नया पन्ना खोल,
पंजाब की एक ही बेटी (हीर) के रोने पर तूने पूरी गाथा लिख डाली थी,
देख, आज पंजाब की लाखों रोती बेटियाँ तुझे बुला रही हैं,
उठ ! दर्दमंदों को आवाज़ देने वाले ! और अपना पंजाब देख,
खेतों में लाशें बिछी हुईं हैं और चेनाब लहू से भरी बहती है

पिंजर की शोषित, पर आत्मविश्वास से भरपूर पूरो

स्वच्छंद विचार, जो कल्पना को पोषते थे, उन्हें अमृता ने जीवंत किया था। वे एक लेखिका ही नहीं, अपितु नारी अस्तित्व की अवधारणा का एक उत्कृष्ट उदाहरण थीं। उनके उपन्यास भी इन्हीं अवधारणाओं के प्रतिबिंब हैं। अमृता के मशहूर उपन्यास ‘पिंजर’ की पात्र पूरो को उन्होंने शोषित, परंतु आत्मविश्वास से भरपूर दिखाया। इस उपन्यास पर फिल्म भी बन चुकी है, जिसका ‘गाना चरखा चलाती माँ…’ उनकी पंजाबी कविता का रूपांतरण है। इसमें भी एक लड़की की विदाई की मार्मिक कहानी है।

चरखा चलाती माँ
धागा बनाती माँ
बुनती है सपनों के खेस री
समझ ना पाऊँ मैं
किसको बताऊँ मैं
मैया छुड़ाती क्यूँ देस री
बेटों को देती है महल अटरिया
बेटी को देता परदेस री
जग में जनम क्यूँ लेती है बेटी
आई क्यूँ विदाई वाली रात री
मेरी सेज हाजिर है पर जूते और कमीज़ की तरह…

अमृता की नारी शक्ति का अर्थ स्वच्छंदता नहीं था

अमृता अपनी रचनाओं में नारी शक्ति को उद्घृत करती थीं, परंतु उनकी नारी शक्ति का अर्थ स्वच्छंदता नहीं, अपितु स्वायत्तता और स्वतंत्रता था। अमृता केवल महिलाओं के लिए समानता चाहती थीं। सिर्फ उतना अधिकार, जितना एक पुरुष को मिला हुआ है। इसलिए उन्होंने अर्धनारीश्वर का उल्लेख करते हुए कहा था कि एक स्त्री और पुरुष के साथ होने से ही सृष्टि का निर्माण होता है। वह दैहिक समझ से ऊपर आत्मिक मिलन का आख्यान करती थीं। इसलिए तो उन्होंने लिखा…

मेरी सेज हाजिर है
पर जूते और कमीज़ की तरह
तू अपना बदन भी उतार दे
उधर मूढ़े पर रख दे
कोई खास बात नहीं
बस अपने-अपने देश का रिवाज़ है…

प्रीतम की प्रीत, साहिर का साया और इमरोज़ की इनायत

अमृता के साथ प्रीतम शब्द 1935 में जुड़ा, जब अमृता ने लाहौर के अनारकली बाज़ार के प्रसिद्ध होज़ियरी मर्चेंट के पुत्र प्रीतम सिंह से विवाह किया, परंतु इसी बीच अमृता 1944 में नए शायर के रूप में उभर रहे साहिर लुधियानवी से मिलीं। लाहौर और दिल्ली के बीच स्थित प्रीत नगर में हुई इस मुलाक़ात ने अमृता और प्रीतम के बीच प्रेम के बीजारोपण किए। इसी प्रीत नगर में पहली ही मुलाक़ात में अमृता और साहिर के बीच प्यार हो गया, परंतु यह प्रेम कहानी उस दिशा में चल पड़ी, जिसका न कोई ओर था न छोर। यद्यपि दोनों की मोहब्बतों की बॉलीवुड में ख़ूब चर्चाएँ हुईं, परंतु ज़माने को न अमृता और न ही साहिर यह समझा सके कि उनका प्यार ज़माने से अलहदा था। इश्क की पहले से खिंची लकीरों से जुदा था। चाय का एक झूठा कप, जली हुई सिगरेट के टुकड़े, कुछ किस्से, कुछ यादें और ढेर सारे खुतूत। साहिर और अमृता की मोहब्बत की ये कुल जमा-पूंजी थी।

प्रीतम को छोड़ा, पर साहिर ने नहीं दिया साथ

अमृता-साहिर के इश्क़ को बॉलीवुड की सबसे बड़ी लव स्टोरीज में से एक कहा जाता है, परंतु प्रीतम से मुक्त अमृता और साहिर के इश्क की राह में कई रोड़े थे। 1947 से पहले एक समय था, जब दोनों लाहौर में रहा करते थे। फिर विभाजन के बाद अमृता दिल्ली आ गईं और साहिर मुंबई में रहने लगे। अमृता ने साहिर के लिए 1960 में पति प्रीतम से संबंध विच्छेद कर लिया, तो दूसरी तरफ साहिर ने अमृता को चित्त में संजोए कई गीत, शेर और गज़लें लिखीं। अमृता ने भी अपनी आत्मकथा ‘रसीदी टिकट’ में खुल कर साहिर से इश्क़ का इज़हार किया, परंतु साहिर कभी अमृता को पूरी तरह अपनाने को तैयार न हो सके। इधर 1960 में अमृता ने साहिर के इश्क़ के लिए पति प्रीतम से नाता तोड़ा, उधर साहिर गायिका सुधा मल्होत्रा पर फ़िदा हो गए। कहते हैं कि साहिर महिलाओं के साथ किसी भी स्थायी बंधन में बंधने से डरते थे, जिसकी मुख्य वज़ह उनकी माँ सरदार बेग़म थीं, जिन्होंने उन्हें बड़ी मेहनत से पाल-पोष कर बड़ा किया था। कदाचित इसीलिए साहिर ने कभी विवाह नहीं किया और अमृता-साहिर का इश्क़ भी निकाह के अंजाम तक नहीं पहुँचा।

अंतिम समय में इमरोज़ बने सहारा

अमृता के जीवन में एक और महत्वपूर्ण पात्र था इमरोज़ का, जो लम्बे वक्त तक अमृता के साथी रहे थे। पेशे से पेंटर इमरोज़ और अमृता लम्बे वक्त तक एक-दूसरे से जुड़े रहे थे। 1964 में जब अमृता साहिर से मिलने मुंबई पहुँचीं, तब इमरोज़ उनके साथ थे। अमृता को ग़ैर मर्द के साथ देख कर साहिर का शायर दिल सिहर उठा और उन्होंने लिखा,

महफिल से उठकर जाने वालों
तुम लोगों पर क्या इल्जाम
तुम आबाद घरों के वासी
मैं आवारा और बदनाम।

यह वही साहिर थे, जो अमृता को अपनाने को तैयार नहीं थे। साहिर से सारी उम्मीदें टूटने के बाद इमरोज़ ही अमृता के लिए इनायत बन गए। दोनों ने साथ रहने के फैसला किया और दोनों पहले दिन से ही एक ही छत के नीचे अलग-अलग कमरों में रहे। जब इमरोज ने कहा कि वह अमृता के साथ रहना चाहते हैं, तो अमृता ने कहा, ‘पूरी दुनिया घूम आओ। फिर भी तुम्हें लगे कि साथ रहना है, तो मैं यहीं तुम्हारा इंतजार करती मिलूँगी।’ कहा जाता है कि तब कमरे में सात चक्कर लगाने के बाद इमरोज़ ने कहा कि घूम ली दुनिया, मुझे अभी भी तुम्हारे ही साथ रहना है। अमृता रात के समय शांति में लिखती थीं, तब धीरे से इमरोज़ चाय रख जाते। यह क्रम बरसों तक चला। इमरोज़ जब भी उन्हें स्कूटर पर ले जाते थे और अमृता की उंगलियाँ हमेशा उनकी पीठ पर कुछ न कुछ लिखती रहती थीं…और यह बात इमरोज़ भी जानते थे कि लिखा हुआ शब्द साहिर ही है। जब उन्हें राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया, तो इमरोज़ हर दिन उनके साथ संसद भवन जाते थे और बाहर बैठ कर उनका घंटों इंतजार करते थे। अक्सर लोग समझते थे कि इमरोज़ उनके ड्राइवर हैं। अमृता का आख़िरी वक्त तकलीफ में गुज़रा। उन्हें चलने-फिरने में तकलीफ होती थी तब उन्हें नहलाना, खिलाना, घुमाना जैसे तमाम रोजमर्रा के काम इमरोज किया करते थे। 31 अक्टूबर, 2005 को अमृता ने आखिरी साँस ली, लेकिन इमरोज का कहना था कि अमृता उन्हें छोड़कर नहीं जा सकती वह अब भी उनके साथ हैं। इमरोज ने लिखा था – उसने जिस्म छोड़ा है, साथ नहीं। वो अब भी मिलती है, कभी तारों की छांव में, कभी बादलों की छांव में, कभी किरणों की रोशनी में कभी ख्यालों के उजाले में हम उसी तरह मिलकर चलते हैं चुपचाप, हमें चलते हुए देखकर फूल हमें बुला लेते हैं, हम फूलों के घेरे में बैठकर एक-दूसरे को अपना अपना कलाम सुनाते हैं उसने जिस्म छोड़ है साथ नहीं…।’

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